नीतिश सरकार ने शहीद
स्मारक का जीर्णोद्धार तो कर दिया लेकिन शहीदों के परिवारीजन वहीं के वहीं हैं...
| धमदाहा का शहीद स्मारक |
आज़ादी के परवाने
तिरंगा फहराने और अंग्रेजों के थाने को जलाने के
लिए आगे बढ़ रहे थे कि तभी अचानक ब्रितानी पुलिस
ने क्रांतिकारियों को रोकने के लिए फायरिंग का सहारा
लिया। पुलिस फायरिंग में 14 लोग शहीद
हुए और न जाने कितने लोग घायल। उनकी शहादत की
याद में मुझे खड़ा किया गया। पर विडम्बना देखिए आज भी मेरा सीना तो गर्व से तना
दिखता है, लेकिन रहनुमाओं की बेरुखी
के कारण अंग्रेजों की गोलियां खाने वाले शहीदों के परिजन बदहाली और गुमनामी की
जिंदगी जीने को मजबूर है। अगर समय रहते उन शहीदों के
परिजनों की सुध न ली गई तो आने वाले समय में उनको याद करने वाला कोई नहीं
होगा और तब शायद मैं भी खुद पर गर्व नहीं कर पाऊंगा...”।
शहीदों के परिजनों को दे दिए ताम्रपत्र और बस.. भूल गए
| शहीद बालो मार्कंडेय की बहू |
1942 में मारे गए शहीदों की
याद में और उनको सम्मानित करने के उद्देश्य से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
ने शहीदों के परिजनों को घटना के 30 साल बाद, आज़ादी की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर
ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। अब केवल ये ताम्रपत्र ही शहीदों के परिजनों की धरोहर है। ताम्रपत्र मिलने के बाद शहीदों के परिवारवालों को लगा था कि जिस तरह
सरकार ने ताम्रपत्र देकर शहीदों
की सुध ली है वैसे ही आगे चल कर सरकार शायद उन लोगों की भी सुध लेगी। लेकिन आज तक शहीदों के परिजनों को न तो किसी सरकारी योजना का लाभ मिला और न ही कोई और विशेष फायदा। उनके लिए
यह तामपत्र दूसरों को दिखाने और अपने शहीद हुए परिजनों को याद करने का जरिया भर
बनकर रह गए हैं।
उपेक्षा से दुखी हैं
शहीदों के परिवारजन, मजदूरी करके जीने को मजबूर-
धमदाहा गोली कांड
में शहीद, ढोकवा निवासी बालो मारकंडेय के परिवार की स्थिति काफी दयनीय है। बालो मारकंडेय के पुत्र सीताराम मंडल बूढ़े हो चले
है। घर में दो जवान बेटे भी हैं। परिवार
की आजीविका का साधन मजदूरी है। काम मिलता है तो घर का चूल्हा जलता है और अगर
मजदूरी नहीं मिलती तो काफी परेशानी का सामना करना पड़ता
है। सरकार के द्वारा पेंशन मिलती है लेकिन वो इतनी कम है कि पूरे घर का खर्च नहीं चल सकता।
सीताराम मारकंडेय ताम्रपत्र दिखाते हुए दुख से कहते हैं कि जब
उन्हें यह ताम्रपत्र सरकार ने भेंट किए थे तो उन्हें लगा कि उनके पिता की शहादत
बेकार नहीं गई, सरकार ने उन्हें सम्मान दिया है और शायद उनकी गरीबी दूर करने के
लिए भी कुछ करेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो कहते हैं कि सरकार को कम से कम शहीदों के
बाल-बच्चों की फिक्र करनी चाहिए थी। लेकिन सरकार ने केवल ताम्रपत्र देकर छुट्टी पा
ली और खाली ताम्रपत्र से किसी का पेट नहीं भरता। अगर सरकार को सम्मान ही करना था
तो हमारी गरीबी दूर करने का कोई उपाय करती... “ की काज
के छै ई, आय तक इ तामपत्र के खाली ढोयये रहल छियै”..
अपने पिता को याद
करते हुए सीताराम बताते हैं कि वो उस समय काफी छोटे थे। पता ही नहीं चला क्या हो
रहा है। बापू देश के लिए मर गए और सरकार ने खाली कागज़ भेज के किनारा कर लिया। आज
तक कोई दूसरा फायदा नहीं मिला। उनका नाम ना एपीएल लिस्ट में है ना बीपीएल लिस्ट
में। वो मुखिया से लेकर सब लोगों के पास हो आए हैं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।
उनके दोनों बेटे मजदूरी करके पेट पालते हैं। अगर सरकार वाकई सम्मान करना चाहती है
तो उसे उनको काम देने की दिशा में कोई पहल करनी चाहिए।
अब तो शहीद दिवस पर
भी याद नहीं करती सरकार, किसी मज़ाक से कम नहीं ताम्रपत्र
| शहीद लक्खी भगत के परिजन |
सरकार शहीदों को याद करने के बहाने तो लाखों रूपए खर्च कर
देती है लेकिन उनके परिजनों की स्थिति सुधारने के लिए कुछ नहीं करती। कुछ शहीदों के परिजनों को 26 जनवरी, 15 अगस्त और 25 अगस्त
को शहीद दिवस के अवसर पर निमंत्रण भेज कर रस्म अदायगी कर ली जाती है तो वहीं कुछ ऐसे भी शहीद है
जिनको प्रशासन पूरी तरह भूल चुका है। हरिणकोल निवासी शहीद लक्खी मंडल के परिजनों
का यही हाल है। उनके नाती विनोद दुखी स्वर में कहते हैं
कि सरकार के तरफ से 15 अगस्त और 26 जनवरी या शहीद दिवस पर भी बुलावा
नहीं आता है, फिर भी हमारे पिताजी शामिल हो जाते है। यह ताम्रपत्र
हम लोगों के लिए किसी मजाक से कम नहीं है। जबकि आज तक सरकार की तरफ से इस
ताम्रपत्र के अलावा कुछ नहीं मिला है तो कम से कम प्रशासन को
चाहिए कि हमें इन अवसरों पर बुलाकर तो गर्व करने का मौका दें।
विनोद यह भी बताते
हैं कि सरकारी योजना का कोई लाभ उन लोगों को
नहीं मिला है। पिछली साल पंचायत की तरफ से इंदिरा आवास मिला था ,वह भी अलग से नहीं गांव में सभी को मिल रहा था सो हमें भी मिल गया। विनोद की पत्नि
मैट्रिक पास है। विनोद ने काफी मशक्कत की पत्नि को कहीं काम मिल जाए। उसने
आंगनबाड़ी सेविका के लिए आवेदन
भी दिया था। योग्य होने के बाद भी पत्नि को नौकरी नहीं मिल सकी। विनोद बताते हैं कि पहले उम्मीद थी कि शहीद के परिजन होने के नाते कुछ मदद मिलेगी पर उसका भी कोई फायदा नही मिला। ऐसे में
हम लोग क्या उम्मीद करें। हमें सिर्फ अपने नाना पर गर्व है , जो देश के लिए शहीद हुए बाकी अगर यह कहा जाए कि सरकार ने उनकी
शहादत को सम्मान देने के लिए कुछ किया तो उसने कुछ नहीं किया।
सरकार को कब आएगी शहीदों की याद
मैं धमदाहा का शहीद स्मारकर फिर बता रहा हूं... “देश के आजाद होने के बाद सन 1947 में स्थानीय लोगों के सहयोग से मेरा यानि धमदाहा शहीद स्मारक का निर्माण हुआ था। तब मेरा स्वरुप काफी छोटा था। लेकिन हाल ही में मुझे भव्य रुप दिया गया है जिसका उद्घाटन राज्य के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने किया था। जब-जब देखने वाले मेरी तारीफ करते हैं तब- तब मुझे तकलीफ होती है। मेरा दिल यही कहता है कि काश सरकार ने मुझसे पहले उन शहीदों के परिवारवालों की सुध ली होती। लेकिन सरकार को न जाने शहीदों के परिवारवालों की याद कब आएगी। सरकार सिर्फ 15 अगस्त , 26 जनवरी और शहीद दिवस के दिन भीड़ इकट्ठा करके अपने कर्तव्यों से पीछा छुड़ा लेती है। मेरी सूरत में चार चांद तब लगेगा जब शहीदों के घर खुशियों के दीप जलेगें”।
धमदाहा गोली कांड में
शहीद हुए लोगों के नाम..
श्री निवास पाण्डे (ग्राम-बघवा)
श्री जयमंगल सिंह (ग्राम-चंदवा)
श्री योगेन्द्र
नारायण सिंह (ग्राम-पुरान्दाहा)
श्री परमेश्वर दास (ग्राम-रूपसपुर)
श्री शेख इशहाक (धमदाहा)
श्री लखी भगत ( हरिनकोल)
श्री मोती मंडल (चन्दरही)
श्री बालो मारकंडेय (ढोकवा)
श्री रामेश्वेर
पासवान ( ढोकवा)
श्री बाबू लाल मंडल (बजरहा)
श्री हेम नारायण
यादव (बरेना)
श्री भागवत महतो ( चम्पावती)
श्री बालेश्वर
पासवान (पुरान्दाहा)
श्री.कुसुम लाल आर्य (बरकोना)
धमदाहा, बिहार से बासु मित्रा
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