Monday, 31 March 2014

Wednesday, 26 March 2014

सितारे ज़मीन पर ... कुछ ऐसी होगी बॉलीवुड के अंदाज़ में चुनावी लड़ाई...

यूं तो चुनावों में बॉलीवुड सितारों के उतरने का इतिहास पुराना है, लेकिन इस बार के मुकाबले तो बहुत ज़्यादा रोचक हैं। बॉलीवुड के साथी, विरोधी पार्टियों के प्रतिद्वन्दी बन कर एक दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। रुपहले पर्दे के सितारे ज़मीन पर उतरकर जनता को बहलाने में लगे है। इनके फिल्मी अंदाज़ को देखते हुए हमने यह कयास लगाने की कोशिश की है कि यह अपने प्रतिद्वदिंयों के बारे में क्या ख्याल रखते होंगे। चुनावी मौसम में फिल्मी सितारों के इस मज़ेदार फिल्मी वाद-विवाद का मज़ा आप भी उठाईए... अगर आप किसी पार्टी के समर्थक हैं तो हमारी इस चुहलबाज़ी को दिल पर मत लीजिएगा। भई यहीं तो समय हैंकि हम इनसे अपना कुछ कह लें, वरना तो बस इनकी सुननी ही हैं...


गुल पनाग (चंडीगढ़ से आप उम्मीदवार)

"ज़रा संभल के किरन जी ६० की उम्र बाली होती है, कदम लड़खड़ा न जाएँ। चुनाव के बाद इन्हीं कदमो से वापस चल के जाना है।"






किरन खेर- (चंडीगढ़ से भाजपा उम्मीदवार) 
"सिक्का सही है या गलत, उसकी पहचान खनक से होती है, पर ये तुम नहीं सुन पाओगी गुल क्योंकि तुम बहरी हो जो देश की आवाज़ नहीं सुन सकती, तुम अंधी हो क्योंकि मोदी के लिए लोगों का प्यार नहीं देख सकती और बहुत जल्दी तुम गूंगी भी हो जाओगी जब तुम्हे झाड़ू उठाने का अफ़सोस होगा"।





हेमा मालिनी (मथुरा से भाजपा उम्मीदवार)- 

"अरे गुल कहाँ से लाई हो ये बकवास डिक्शनरी, नया नौ दिन और पुराना सौ दिन… समझ गयी... मथुरा वासियों आपको तो पता है, मुझे बेफ़िजूल बात करना पसंद नहीं… बस मुझे जीतने की बहुत बुरी आदत है..... नमोः नमोः"









मुनमुन सेन (तृणमूल कांग्रेस) - 

"अरे इनको कुछ मालूम नहीं देश को दीदी चाहिए। फिर देखो कैसे बदलती है सबकी लाइफ"।

नग्मा (कांग्रेस उम्मीदवार) - 

"चुनाव में हमारी भाषा दिल की भाषा होगी.... (बाद का अभी कुछ तय नहीं है)"








जयाप्रदा (बिजनौर से रालोद उम्मीदवार)- 

"में अपना आँचल फैला के वोटों की भीख मांगती हूँ.... में एक कलाकार हूँ... पर मक्कार नहीं..."








परेश रावल (भाजपा उम्मीदवार)

"वो खड़ा है गांधी की तरह, पर झड़ जायगा आंधी कि तरह और आप के आदमी गिरेंगे माचिस की कांडी की तरह.., क्योंकि
जहां धरना है ना, वहां सत्य के लिए जगह नहीं है...... और जहां सत्य है, नमोः है, वहां धरने की ज़रूरत ही नहीं"।



राज बब्बर (कांग्रेस उम्मीदवार)- 

"ऐ आर्मी के अफसर...... ध्यान से देख लो यह भी पुरानी पत्रकार हैं....... इन्हे बड़ा जोश है अच्छे काम करने का.... और हमारी पार्टी का भी बड़ा अनुभव है बुरे काम करने का..... बोलो तुम क्या करोगे....."







शत्रुघन सिन्हा (भाजपा उम्मीदवार)  - 

"खामोश......... जली को आग कहते हैं, बुझी को राख कहते हैं, और जिस आग से बारूद बने, उसे भारतीय जनता पार्टी कहते हैं......"






रवि किशन- (कांग्रेस उम्मीदवार) 

"ई का बोलतानी पटना बाबू.... ज़िन्दगी झंडवा... फिर भी घमंडवा..."






निधि रावत




Tuesday, 25 March 2014

चंडीगढ़ में कौन मारेगा चुनावी बाज़ी... हाथ मसल देगा कमल को या इन दोनों को साफ कर देगी झाड़ू या फिर कीचड़ में खिलेगा कमल... सुनिए इन पार्टियों की भाग्यविधाता, यानि वोटबैंक, यानि जनता की राय...



पूरे देश की तरह चंडीगढ़ में भी इस समय चुनावी गहमा-गहमी पूरे ज़ोरों पर हैं। हर एक दल का प्रत्याशी अपनी तरफ से जनता को लुभाने और उनके मतों को अपनी तरफ मोड़ने की भरपूर कोशिश कर रहा है। चंडीगढ़ के मैदान में पहली बार उतरी नई नवेली पार्टी ‘आप’ की प्रत्याशी गुल पनाग हो या फिर भाजपा को शहर में विजय दिलाने के लिए खासतौर से बॉलीवुड से बुलवाई गईं टैलेंटेड किरन खेर या फिर तीन बार से चंडीगढ़ की सत्ता पर काबिज होते चले आ रहे कांग्रेस के पवन बंसल, सभी अपनी तरफ से पूरा जोर लगा रहे हैं कि किसी तरह बस जनता के वोटों की चाबी उनके हाथ में आ जाए। सपा की जन्नत जहां जैसे उम्मीदवार भी हैं जिन्होंने दरअसल यहां ज़मीनी तौर पर काम तो किया है लेकिन जिनकी पार्टी अभी तक चंडीगढ़वासियों के बीच एक राष्ट्रीय पहचान नहीं स्थापित कर पाई है। हमने जब लोगों के पसंदीदा उम्मीदवारों के बारे में उनसे बात की और पूछा कि आप किसे जीतते देखना चाहते हैं, और क्यों..., तो हमें काफी ईमानदार और यथार्थवादी जवाब मिले। चंडीगढ़ की जनता ना तो किसी को पूरी तरह नकारती है और ना ही किसी को पूरी तरह स्वीकारती है लेकिन हां भाजपा और कांग्रेस का पलड़ा थोड़ा सा भारी ज़रूर दिखता है। हमने काफी लोगों से बात की। आपके लिए हम यहां एक गृहणी, एक युवा, एक अनुभवी व्यक्ति और एक व्यापारी के विचार दे रहे हैं। यह सभी, समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करते हैं। आप भी इन्हें पढ़िए और चाहे तो इनके ज़रिए चंडीगढ़ की जनता की नब्ज टटोलने की कोशिश कीजिए...





विशाल सिंह नेगी (युवा) 


देखिए चंडीगढ़ में काफी समय से कांग्रेस का शासन चल रहा है। इसलिए बदलाव होना ज़रूरी है। बहुत सारे प्रोजेक्ट्स अटके पड़े हैं। जैसे ट्रांसपोर्टेशन के लिए बहुत सारा काम यहां होना है जो अभी तक किया नहीं गया है। यहां मेट्रो के लिए भी प्रस्ताव दिया गया था लेकिन वो मामला भी कैंसल हो गया। फिर एक मेडिसिटी बनाने के बारे में भी राज्य सरकार ने प्रस्ताव दिया था, उसको भी फिलहाल पोस्टपोन कर दिया गया है।

मैं यह नहीं कहता कि काम नहीं हुए हैं लेकिन यहां का जो इन्फ्रास्ट्रक्चर है, उसके हिसाब से जिस गति से होने चाहिए थे, उस गति से नहीं हुए हैं। पवन बंसल चूंकि रेल मंत्री हैं, तो उन्होंने एक काम चंडीगढ़ के लिए ज़रूर बहुत अच्छा किया है, वो यह कि उन्होंने चंडीगढ़ तक रेलगाड़ियों की कनेक्टिविटी बहुत अच्छी कर दी है। तो रेलवे का विकास, खासतौर से यहां तो उनके कार्यकाल में काफी हुआ है। लेकिन मुद्दे और भी बहुत हैं। कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार की खबरें इतनी आम हो गई हैं, कि लोग दुखी हो चुके हैं और बदलाव चाहते हैं। भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हैं।

मैं चाहता हूं कि इस बार बीजेपी आए। माना कि उन्होंने किरन खेर को खड़ा किया है, लेकिन एक तो वो यहां की बेटी हैं और अगर यह भी मान लिया जाए कि उन्हें शायद मुम्बई में रहना पड़े, तो भी कम से कम यहां बीजेपी की जो लोकल लीडरशिप है वो तो मौजूद है। जैसे हरमोहन धवन हैं, सतपाल जैन हैं, इन लोगों ने प्रशासन में नहीं होते हुए भी बहुत अच्छा काम किया है। ज़मीनी स्तर पर काम किया है और लोगों तक इनकी पहुंच है। तो इस बात का फायदा तो बीजेपी को मिलेगा।

अब रही आप प्रत्याशी गुल पनाग की बात, तो देखिए मैं साफ बात करता हूं, वो एक मॉडल हैं, एक्टर हैं जो यहां की हैं तो लेकिन शायद उन्हें यहां के बारे में इतना पता नहीं। और फिर वो आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी हैं। जो मुझे लगता है केवल बीजेपी और कांग्रेस के वोट काटने आई हैं, क्योंकि यहां तो वो बिल्कुल नयी है। दिल्ली में तो फिर भी आप का जन्म हुआ है, लेकिन यहां उन्होंने क्या किया है..।


केके अग्रवाल (अनुभवी) 

मनो माजरा, चंडीगढ़ के निवासी के के अग्रवाल राजनीति और राजनेताओं में दिलचस्पी रखते हैं और इस बारे में खुद को अपडेट भी रखते हैं। उनकी पसंदीदा पार्टी भी बीजेपी ही है लेकिन साथ ही वो एक बात और कहते हैं। उनका मानना है कि बीजेपी ने एक बाहरी व्यक्ति यानि किरन खेर को टिकट देकर गलती कर दी। अग्रवाल जी कहते हैं कि यहां बीजेपी के लोकल अच्छे नेताओं की कमी नहीं है। यहां के नेताओं को लोग अच्छे से जानते हैं ऐसे में उन्हें और पार्टियों की देखादेखी किसी मुम्बई की अभिनेत्री को टिकट देने की क्या ज़रूरत थी। यह सच है कि किरन खेर यहीं जन्मी हैं, लेकिन सब जानते हैं वो यहां नहीं रहती। उनका घर तो मुम्बई है। यहां और वरिष्ठ बीजेपी सदस्य हैं उन्हें टिकट दिया जाता तो शायद बीजेपी के लिए ज्यादा अच्छा होता। चंडीगढ़ में सबसे ज्यादा ज़रूरत किस चीज़ की है, इस सवाल पर अग्रवाल जी का कहना था कि यहां सबसे ज्यादा क्लीन गवर्नेंस की ज़रूरत है। हर जगह भ्रष्टाचार का बोलबाला है। सरकारी दफ्तर में एक काम बिना पैसों के नहीं होता। और हम इस भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहते हैं इसलिए भी बदलाव की ज़रूरत है। 

लेकिन भ्रष्टाचार मुक्त भारत का अभियान तो आम आदमी पार्टी चला रही है, जब हमने उनसे यह कहा तो उन्होंने कहा कि देखिए, आम आदमी पार्टी विपक्ष में बैठने के लिए तो ठीक है लेकिन प्रशासन चलाने की जहां तक बात है तो उसमें वो पूरी तरह विफल हैं। जनता दिल्ली में उनको मौका देकर देख चुकी है। जब आपको सरकार चलानी ही नहीं आती, अपने कामों के लिए ही धरने पर बैठना पड़ता है तो कैसे आप सरकार में आकर भ्रष्टाचार का मुकाबला करेंगे। आपको मौका मिला था, खुद को साबित नहीं कर पाए..। तो उनको तो अभी आने में वक्त लगेगा। हमें स्टेबल सरकार चाहिए जो बीजेपी दे सकती है।


सत्यवती आचार्य (गृहणी)

एक अध्यापिका के पद से रिटायर हुईं श्रीमती सत्यवती आचार्य से जब हमने इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि उन्हें नरेन्द्र मोदी बहुत प्रभावी नेता लगते हैं जो देश की दशा और दिशा दोनों बदल सकते हैं। गुजरात एक विकास मॉडल की तरह उभरा है और वो पूरे देश में ऐसा ही विकास देखना चाहती हैं इसलिए इस बार उनकी पसंद बीजेपी है। श्रीमती आचार्य कांग्रेस के पवन बंसल की भी तारीफ करती हैं। वो कहती हैं कि एक बार पवन बंसल हमारे स्कूल में आए थे, और भी एक-दो बार उनसे मुलाकात हुई हो तो काम करने वाले इंसान और प्रभावी नेता तो वो भी लगते हैं, और उन्होंने चंडीगढ़ में काम किया भी है लेकिन अभी हाल में रेलवे घूसकांड में जो मामा-भांजा प्रकरण हुआ उसके कारण उनकी छवि में दाग लग गया है। इसलिए उनको लेकर हिचक का वातावरण हैं। और फिर चूंकि हम बीजेपी को केंद्र की सत्ता पर काबिज होते देखना चाहते हैं, उसके लिए भी ज़रूरी है कि वो ज्यादा से ज्यादा सीटों से जीते। इसलिए भी शायद चंडीगढ़ में बीजेपी की हवा कुछ ज्यादा है। जहां तक ‘आप’ का सवाल है... उसके बारे में सत्यवती जी को नहीं लगता कि वो अपनी जगह चंडीगढ़ में बना पाएगी।

बालकिशन अग्रवाल (व्यापारी)

बालकिशन अग्रवाल जी रिटेल व्यापारी हैं जिनकी चंडीगढ़ में अपनी दुकान है। उनसे जब हमने इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें कांग्रेस पसंद है। उन्होंने कहा कि पवन बंसल ने काफी काम किया है और इसका फायदा उन्हें मिल सकता है। अगर नुकसान होगा तो इस वजह से भले ही हो कि इस बार बीजेपी की हवा ज्यादा है। बालकिशन जी मानते हैं कि चंडीगढ़ में सीधा-सीधा मुकाबला किरन खेर और पवन बंसल के बीच है। आने वाली सरकार से व्यापारी वर्ग की क्या अपेक्षाएं हैं, जब हमने उनसे यह पूछा तो उन्होंने बताया कि हम तो यह चाहते हैं कि चंडीगढ़ की कमर्शियल प्रॉपर्टी फ्री होल्ड हो जाए। उन्होंने बताया कि शहर की लगभग सारी कमर्शियल प्रॉपर्टी हाउसिंग बोर्ड या कॉरपोरेशन से लीज़ होल्ड पर मिलती है जिसकी वजह से व्यापारियों को दोगुना पैसा खर्च करना पड़ता है। जो भी सरकार आए उससे वो यहीं चाहते हैं कि पहले वो व्यापारियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कमर्शियल प्रॉपर्टी को फ्री होल्ड कर दे।

हिन्द प्रहरी संवाददाता
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“कम्पार्टमेन्ट के आखिरी छोर की दीवार के पास शव एक के ऊपर एक लदे पड़े थे। ट्रेन के शौचालय जवान शवों से भरे थे जो सुरक्षित स्थान समझकर वहां छिपे होंगे...” – ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ से…


ट्रेन टू पाकिस्तान खुशवंत सिंह द्वारा लिखी गई सबसे ज्यादा प्रसिद्ध किताब मानी जाती है, जिसमें उन्होंने देश विभाजन के समय सीमावर्ती गांवो के लोगों में धीरे-धीरे पनप रहे ज़हर, लोगों की दशा और मनोस्थिति का बेहतरीन और सजीव चित्रण किया है। इस उपन्यास की कहानी संक्षेप में इस प्रकार है-1987 की कहानी है जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन होने वाला है। ऐसे में सीमा पर स्थित एक शांत गांव मनो माजरा, जिसकी पूरी दिनचर्या गांव के स्टेशन से सुबह-शाम और रात में गुजरने वाली ट्रेनों पर आधारित हैं, में अचानक स्थिति बदल जाती है। गांव के निवासियों तक सीमा पार रहने वाले मुस्लिमों द्वारा अन्य धर्मों के लोगों को लूटने, बेइज्जत करने और मारने के किस्से पहुंचने लगते हैं और तनाव बढ़ने लगता है। मामला तब और गंभीर हो जाता है पाकिस्तान से एक मुर्दों की ट्रेन आती हैं जिसमें एक भी व्यक्ति जीवित नहीं होता। सारे हिन्दुओं को सीमापार के मुसलमान मौत के घाट उतार चुके थे। इस हादसे के बाद गांव में लगातार बढ़ते तनाव और बिखरती कानून व्यवस्था से गुस्साए लोग इस बात का बदला लेने के लिए भारत से मुस्लिमों को लेकर पाकिस्तान जा रही एक ट्रेन पर हमला करने की योजना बनाते हैं। यह ट्रेन खचाखच भरी है। छत पर भी लोग सवारी कर रहे हैं। ऐसे में उस पर हमला करने मनो माजरा से सिखों की एक टोली पहुंचती है। लोग हमले की तैयारी करते हैं... लेकिन अंत में मामला बदल जाता है। पढ़िए इस बेहतरीन उपन्यास के कुछ हिस्से..


डकैती

बहुत ज्यादा रेलगाड़ियां मनी माजरा में नहीं रुकती थीं। एक्सप्रेस गाड़ियां तो रुकती ही नहीं थीं। बहुत सी धीमी गति की यात्री रेलगाड़ियों में से केवल दो, एक सुबह में दिल्ली से लाहौर जाने वाली और दूसरी शाम को लाहौर से दिल्ली आने वाली, रेलगाड़ियां ही कुछ मिनटों के लिए रुकती थीं। अन्य गाड़ियां केवल तब रुकती थीं जब उन्हें रोका जाता था। नियमित रुकने वालों में केवला मालगाड़ियां थीं। हांलाकि मनो माजरा से बहुत कम बार सामान बाहर जाता या आता था लेकिन इसके स्टेशन पर वैगन गाड़ियों की लम्बी कतारें देखी जा सकती थीं। हर गुज़रने वाली मालगाड़ी में घंटों तक सामान चढ़ाया और उतारा जाता था। अंधेरा होने के बाद जब पूरे गांव में सन्नाटा छा जाता था, तब भी पूरी रात इंजन की सीटी और धुंआ छोड़ने की आवाजें, सामान रखने की आवाजें और लोहे से लोहा टकराने का शोर पूरी रात सुनाई देता था

कलयुग

सितम्बर की शुरूआत में मनो माजरा की दिनचर्या गलत होनी शुरू हो गई। रेलगाड़ियां पहले से कहीं ज्यादा अव्यवस्थित समय पर आने-जाने लगीं और बहुतों ने तो रात में गुज़रना शुरू कर दिया। कुछ समय तक तो ऐसा लगा जैसे की अलार्म घड़ी गलत घंटे पर बजने लगी है। और बाद के दिनों में ऐसा महसूस होने लगा जैसे किसी को भी इसे बंद करना याद ना रहा हो। इमाम बख्श ने मीत सिंह की तरफ से सुबह की शुरुआत करने का इंतज़ार किया। और मीत सिंह उठने से पहले मुल्ला की प्रार्थना सुनने की प्रतीक्षा करता था। लोग देर में उठने लगे, उन्होंने यह भी नहीं सोचा कि समय बदल चुका है और मेल ट्रेन अब शायद गुज़रेगी ही नहीं। बच्चे समझते नहीं थे कि उन्हें कब भूख लगनी है और पूरे समय खाने के लिए चिल्लाते रहते थे। शाम में हर कोई सूरज डूबने से पहले घर चला जाता था और एक्सप्रेस ट्रेन के आने से पहले सो जाता था- अगर ट्रेन आएं तो। मालगाड़ियों का आना बिल्कुल बंद हो गया था इसलिए उनको लोरी सुनाकर सुलाने के लिए लोरियां भी नहीं थी। इसकी बजाय, आधी रात और भोर से पहले भूतहा गाड़ियां गुज़रती थीं जो मनो माजरा के सपनो के तोड़ देती थीं। 

नहाने और कपड़े बदलने के बाद हुकुम चन्द को कुछ ताज़गी महसूस हुई। पंखे की हवा ताज़ी और अच्छी थी। वो अपनी आंखों पर हाथ रखकर लेट गया। आंखों के अंधेरे कमरे में पूरे दिन के दृश्य फिर से घूमने शुरू हो गए। उसने अपनी आंखें मलकर उन्हें झटकने की कोशिश की लेकिन दृश्य पहले और काले हुए, फिर और लाल और फिर वापस वैसे ही हो गए। एक आदमी अपने हाथों से अपना पेट पकड़े हुए उसे ऐसी निगाहों से देख रहा था जैसे कह रहा हो- देखो मुझे क्या मिला। वहां एक कोने में घुसे हुए बच्चे और औरतें थीं, उनकी आंखे डर से फैल गईं थीं, उनके मुंह खुले के खुले रह गए थे जैसे अभी उनकी चीख एकदम से गले में अटक कर रह गई हो। कुछ के शरीर पर तो एक खरोंच तक नहीं थी। ट्रेन के डिब्बे के आखिरी छोर की दीवार के पास शव लदे पड़े थे जिनकी आंखें खिड़कियों की तरफ देख रही थीं जहां से शायद गोलियां, भाले या तलवारें आईं होंगी। ट्रेन के शौचालय जवान शवों से भरे पड़े थे जिन्होंने शायद तुलनात्मक रूप से सुरक्षित स्थान ढूंढकर खुद को वहां छिपाया होगा। और वहां सड़ते मांस और मल-मूत्र की बदबू थी। 


मनो माजरा

जब यह पता चला कि पूरी रेलगाड़ी मुर्दों को लेकर आई है, पूरे गांव पर एक भारी सन्नाटा स्थापित हो गया। लोगों ने अपने दरवाजों पर रोक लगानी शुरू कर दी और बहुत से लोग पूरी रात जागकर कानाफूसी करते रहते थे। हर किसी को लगने लगा कि उसका पड़ौसी उसका दुश्मन है। लोगों ने दोस्तों और साथियों को तलाशना शुरू कर दिया। उन्होंने बादलों द्वारा तारों को ढके जाना देखना छोड़ दिया और ठंडी नम हवा की गन्ध का आनंद लेना भी भूल गए। जब वो सुबह उठते थे और देखते थे कि बारिश हो रही है, उनके दिमाग में सबसे पहले ट्रेन और जलते हुए मुर्दों का ख्याल आता था। स्टेशन को देखने के लिए पूरा गांव छत पर चढ़ जाता था

कर्म

तुम्हें मालूम है हिन्दुओं और सिखों के शवों से भरी कितनी गाडियां आ चुकी हैं ? तुम्हें रावलपिंडी, मुल्तान, गुजरेंवाला और शेखूपुरा में हुए नरसंहार के बारे में मालूम है ? तुम इस बारे में क्या कर रहे हो ? तुम बस खाते हो और सोते हो ओर अपने आप को सिख कहते हो, बहादुर सिख, शहीद होने वाले सिक्ख...- उसने अपने दोनों हाथ उठाते हुए कहा ताकि उसका व्यंयग असरदार बन सके। उसने सभी सुन रहे लोगों की आंख में आंख डालकर देखते हुए, उनका परीक्षण किया। लोगों ने शर्म से सिर झुका लिए।
लम्बरदार ने पूछा- हम क्या कर सकते हैं सरदारजी? अगर हमारी सरकार पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध लड़ेगी तो हम लड़ेंगे, यहां मनो माजरा में बैठ कर हम क्या कर सकते हैं?”


ट्रेन टू पाकिस्तान खुशवंत सिंह की बेहतरीन उपन्यासों में से एक है

सरकार... उसने घृणा से कहा, तुम सरकार के कुछ करने की अपेक्षा रखते हो, वो सरकार जो कायर जमींदारों से भरी पड़ी है। क्या पाकिस्तान के मुसलमानों ने तुम्हारी बहनों को बेइज्जत करने से पहले सरकार की आज्ञा ली थी? क्या उन्होंने ट्रेन रोकने और उसमें सवार बच्चे, बूढ़े जवानों और महिलाओं को मारने से पहले सरकार से पूछा था? तुम चाहते हो सरकार कुछ करे। वाह, शाबाश.. बहुत बहादुरी की बात..
लेकिन सरदार साहब आप बताओ हम क्या कर सकते हैं?” लम्बरदार ने धीरे से पूछा।
यह बेहतर है, लड़के ने कहा..। अब हम बात कर सकते हैं, सुनो और बहुत ध्यान से सुनो, वो रुका, उसने चारों तरफ देखा और फिर शुरु हुआ। वो अपनी पहली ऊंगली हवा में उठाते हुए, हर एक शब्द पर जोर देते हुए बहुत धीरे-धीरे बोलने लगा…उनके द्वारा मारे गए हर एक हिन्दु और सिख के लिए दो मुसलमानों को मारो। हर उस महिला के लिए जिसे उन्होंने उठा लिया या बेइज़्जत किया, दो महिलाओं को उठाओ। उन्होंने एक घर लूटा, तुम दो लूटो।  वो अगर एक मुर्दों की ट्रेन भेजते हैं तो हम दो भेजेंगे। वो अगर किसी काफिले पर हमला करते हैं, हम दो काफिलों पर हमला करेंगे। इसी तरह से दूसरी तरफ से हत्याएं रुकेंगी। इसी तरह से उन्हें सबक मिलेगा कि हम भी लूटमार और हत्या का खेल खेलना जानते हैं।

नेता ने अपनी राइफल उठाई और फायर कर दिया। उसका निशाना चूक गया और उस आदमी का पैर रस्सी से बाहर आ गया और हवा में झूलने लगा। दूसरा पैर अभी भी रस्सी में उलझा हुआ था। उसने जल्दी में दूर हटने की कोशिश की। इंजन केवल कुछ यार्ड दूर था और हर सीटी की आवाज़ के साथ हवा में चिंगारी उछल रही थी। किसी ने दूसरा फायर किया। आदमी का शरीर रस्सी से फिसल गया लेकिन वो अपनी थुड्डी और हाथों की सहायता से उस पर लटका रहा। उसने अपने आपको ऊपर खींचा, रस्सी अपनी बांयी बगल के नीचे दबाई और फिर से सीधे हाथ से काटना शुरू कर दिया। रस्सी कई जगह से कट चुकी थी। सिर्फ एक पतला पर मजबूत धागा रह गया था। उसने पहले उसे चाकू से काटने की कोशिश की, फिर दांत से। इंजन उसके पास पहुंच चुका था। एक के बाद एक फायर होने लगे। वो आदमी कांपा और ढेर हो गया। उसके नीचे गिरने के साथ ही रस्सी भी बीच में से टूट गई। ट्रेन उसके ऊपर से निकल गई और पाकिस्तान चली गई"।

संकलन- चित्रलेखा अग्रवाल  




“सब लोग मुझे ही गलत ठहराते थे.. मम्मी-पापा मुझे इस डर से, कि लोग क्या कहेंगे, बाहर नहीं निकलने देते थे, कहीं नहीं ले जाते थे...यकीन मानिए, एक तलाकशुदा औरत के लिए यह समाज बहुत कठोर है” एक तलाकशुदा महिला के संघर्ष की दास्तान उसी की ज़ुबानी




कहते हैं भारतीय समाज बहुत आधुनिक हो गया है, लोग खुले विचारों और खुलेपन के साथ सबकुछ स्वीकार करने लगे हैं लेकिन फिर भी कुछ सच हैं जो कभी नहीं बदलते। और उन्हीं में से एक सच यह भी है कि आज भी हमारा भारतीय समाज तलाकशुदा महिलाओं के मामले में पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं और उनके प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया रखता है। सच क्या है यह जानने के लिए हमने आज के ज़माने की सफल और आधुनिक नारी का प्रतिनिधित्व करने वाली एक तलाकशुदा महिला मिस गीता आहूजा से बात की। मिस आहूजा एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर हैं, दिल्ली में मशहूर फर्म में अच्छे पद पर हैं। तलाकशुदा होने के बावजूद मिस गीता आहूजा आज खुश हैं, आज़ाद है लेकिन उनकी यह खुशीदर्द की जिन सीढ़ियों पर चलकर हासिल हुई है, उनके बारे में जब हमने उनसे पूछा तो उन्होंने दिल खोलकर हमसे बात की। आप भी जानिए कि इस समाज की हकीकत क्या है और तलाकशुदा महिलाओं को किस नज़र से देखा जाता है...

आपने अपने पति से तलाक क्यों लिया? कैसे हुआ यह सब, क्यों हुआ?

मैंने जिस लड़के से शादी की थी वो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। हम नेट पर मिले थे। और फिर हम दोनों के परिवारों की मर्ज़ी से हमारी शादी हो गई। शादी के बाद से ही उसने अपना काम करना छोड़ दिया थाहांलाकि मैं शादी से पहले भी इन्टीरियर डिज़ाइनिंग के प्रोजेक्ट्स लेती थी लेकिन शादी के बाद उसने मेरा यह काम भी छुड़वा दिया। वो भी काम छोड़ चुका था, मुझे भी काम नहीं करने देता था तो ज़ाहिर है घर में आर्थिक तंगी चल रही थी। जब हमारी इस बात पर लड़ाई होने लगी तब उसने कहा ठीक है तुम किसी जगह नौकरी कर सकती हो। मैं नौकरी तलाश करती थी तो वो हर बात पर नज़र रखता था, बहुत टोका-टाकी करता था कि यह नौकरी ऐसी है, यह बहुत दूर है, यह कंपनी अच्छी नहीं है या यहां के लोग अच्छे नहीं हैं वगैरह-वगैरह। हद तो तब हो गई जब वो नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाते समय भी मेरे साथ जाने लगा। हर समय मेरे साथ ही घूमता था। मुझे अगर पूरा दिन भी इंटरव्यू के लिए बैठना पड़े तो भी मेरे साथ बैठा रहता था। मैं किसी से फोन पर बात करती थी तो सुनता था। कोई सहेली मेरे घर आती थी तो हमारे साथ बैठ जाता था और जब मौका मिलता था कोई भी छोटी से छोटी बात पकड़कर मुझे जली-कटी सुनाते रहता था। मुझे लगता था जैसे मैं किसी जेल में बन्द हूं। मैं काफी डिप्रेशन में आ गई थी। पागल सी हो गई थी। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं। मैंने कभी छिप कर मम्मी पापा से बात की भी तो वो भी मुझे ही समझा देते थे कि यह कोई बड़ी बात नहीं सब ठीक हो जाएगा पर उन्हें पता नहीं था कि मैं कितनी परेशान थी। आखिरकार एक दिन मैं लड़-झगड़ कर किसी तरह अकेली अपने मायके मेरठ चली गई। और दो दिन बाद लौटी तो देखा वो अपना सारा सामान लेकर घर छोड़ कर चला गया था। बस उसी दिन मैंने पक्का फैसला कर लिया कि अब मुझे इस बोझ बनते रिश्ते को खत्म करना है। मैंने महिला आयोग में अर्जी दी और 2006 में म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग से हमारा तलाक हो गया।

क्या तलाक का फैसला करना आपके लिए मुश्किल था, क्या किसी ने आपकी बात सुनी, आपका साथ दिया?
बहुत बहुत मुश्किल था वो वक्त, वो फैसला लेना। उस समय समझ ही नहीं आता था मैं क्या करूं। मैं मम्मी पापा से बात करती थी तो वो मना कर देते थे, समझाने लगते थे। लोग क्या कहेंगे यह सोच कर भी डर लगता था। पूरे समय मन में यही उलझन रहती थी कि क्या करूं। मन में बुरे-बुरे खयाल आते थे। लेकिन फिर मैंने ही अपने आपको हिम्मत दी। मैंने सोच लिया कि मुझे इस तरह मर-मर के नहीं जीना है। मुझे इस बोझ से आज़ादी चाहिए थी और फिर मैंने फैसला कर लिया कि चाहे जो हो जाए मैं अब तलाक लेकर रहूंगीं। मैंने अपनी छोटी बहन को सारी बातें बताईं और तब किसी ने पहली बार मेरे दुख को समझा और मेरा साथ दिया। जब मैंने मम्मी-पापा को इस फैसले के बारे में बताया तो वो तो बहुत गुस्सा हुए थे, मुझसे बात करना छोड़ दिया था वो बोलते थे कि बच्चे के बारे में सोचो बच्चा आ जाएगा तो ज़िंदगी आसान हो जाएगी। लेकिन मैं जानती थी कि बच्चे के बाद मेरे लिए इस रिश्ते को तोड़ना और मुश्किल होगा। मैं अपने फैसले पर अडिग रही और तलाक ले लिया।

तलाक के बाद भी ज़िंदगी आसान नहीं रही होगी?
नहीं बिल्कुल नहीं, बल्कि ज़िंदगी की असली जंग तो अब शुरू हुई थी। तलाक लेने के बाद तो मेरे प्रति लोगों के तेवर ही बदल गए। मेरे बहुत से रिश्तेदार जैसे मेरी बुआ जो मुझे बहुत प्यार करती थीं, ने मुझसे रिश्ता तोड़ दिया। सब लोग मुझे ही ग़लत ठहराते थे। जिस भी रिश्तेदार को इस बारे में पता चलता था वो मेरी ही गलती निकालता था। लोग कहते थे कि मुझमे ही कुछ कमी होगी इसलिए शादी टूट गई। मैं मम्मी-पापा के पास जाती थी तो वो मुझे घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। उन्होंने मुझे कहीं भी ले जाना बन्द कर दिया। उन लोगों ने भी जाना-आना छोड़ दिया क्योंकि उनसे भी लोग सौ सवाल करते थे। वो तो शुक्र हैं कि उन्होंने शादी पर दिल्ली में मुझे एक मकान भी दिया था। मैं यहीं आ गई और यहीं रहना शुरू कर दिया। छः महीने तक मैं घर नहीं गई। कितने समय मैं यह सोचकर घर में बन्द रहती थी कि अब क्या होगा। मैं जाऊंगी तो लोग मुझे कैसे देखेंगे, कैसी कैसी बाते करेंगे। पर कहते हैं ना समय बहुत बड़ा मरहम होता है। धीरे-धीरे मैंने अपने आपको संभाला, नौकरी शुरू की तो काफी हद तक मैं इस तनाव से बाहर आने लगी।

 जीवन की इस घटना ने क्या आपको कुछ बदला भी, सिखाया भी?
सबसे बड़ी बात तो यह सिखाई कि ज़िंदगी हर चीज़ की कीमत वसूलती है। आज़ादी आपको यूंही नहीं मिलती, बड़ा संघर्ष करना पड़ता है इसके लिेए। और असली आज़ादी तब मिलती है जब आप आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाओ। शुरूआत मे तलाक के बाद मैं पापा-मम्मी से खर्चा लेती थी, क्योंकि मैं नौकरी तो कर नहीं रही थी, तो ज़ाहिर है मुझे उनकी सुननी भी पड़ती थी आखिर मैं उनकी मोहताज़ जो थी। मैं एक गलत शादी से ज़रूर आज़ाद हो गई थी लेकिन अपने परिवार के तानों से आज़ाद नहीं थी। यह आज़ादी मुझे तब मिली जब मैंने खुद कमाना शुरु किया। जब मैंने अपने पापा से खर्च लेना छोड़ दिया, उनकी बातें सुनना छोड़ दिया तब जाकर जिंदगी में थोड़ा सुकून आया। अकेली महिला का जीवन बहुत मुश्किल भरा होता है, यह अब तक मैंने सुना था लेकिन अब यह सब मेरे साथ घट रहा था। आस-पास के लोग, पड़ौसी, ऑफिस के सहयोगी इस बात का बड़ा फायदा उठाते थे। कोई भी कुछ भी बोल कर निकल जाता था। आसानी से मेरा काम नहीं होता था। लेकिन इन्हीं बातों ने मुझे मज़बूत बनाया। धीरे-धीरे मैंने अपने लिए लड़ना और जीतना सीख लिया और आज तो लोग मुझसे डरते हैं (मुस्कुराहट के साथ)। आज की गीता और सात साल पहले की गीता में ज़मीन आसमान का फर्क है।

क्या कभी दूसरी शादी के बारे में नहीं सोचा?
सोचा, कभी -कभी जब दूसरों के परिवारों और बच्चों को देखती हूं तो मेरा भी बड़ा मन करता है कि मेरा भी परिवार हो, बच्चे हों, ज़िम्मेदारियां हों। मम्मी-पापा, रिश्तेदार भी बहुत ज़ोर देते हैं कि दूसरी शादी कर लो, अकेले ज़िंदगी नहीं कटती। लेकिन अब जब मैं अपने आप से सवाल करती हूं कि मुझे ज़िंदगी में क्या ज्यादा ज़रूरी लगता है तो बस एक ही जवाब मिलता है- आज़ादी। और फिर इस बात का डर भी है कि कहीं फिर से मेरे साथ वैसा ही कुछ हुआ तो, इसलिए शादी करने का मन नहीं करता।

पर अकेलापन तो लगता होगा, जीवनसाथी की कमी तो महसूस होती होगी?
हां होती है, तब होती है जब अकेलापन नहीं कटता। लेकिन अब मैंने अपने आप को काम में इतना डुबो दिया है कि मुझे वक्त ही नहीं मिलता यह सब सोचने का। कभी अकेलापन लगता भी है, तो दोस्तो से बात कर लेती हूं, अपनी बहन से बात कर लेती हूं। फिर सब ठीक लगने लगता है।

कोई अच्छा लड़का मिला तो दोबारा शादी करेंगी?
(हंसते हुए) आज तो मैं सफल हूं, आत्मनिर्भर हूं अगर सही लड़का मिला जो मुझे और मेरे करियर को भी उतना ही सम्मान दे जितना अपने को देता है तो सोचूंगी।

अपनी तरफ से कुछ कहना चाहेंगी
बस यहीं कि जिंदगी में कुछ भी, खासतौर से अपनी खुशी और आज़ादी, वो भी एक लड़की के लिए पाना बहुत मुश्किल होता है। अगर अपनी शर्तों पर ज़िदंगी जीनी है तो बहुत लड़ाईया लड़नी पड़ती हैं, खुद को पत्थर जैसा मज़बूत बनाना पड़ता है, कुर्बानियां देनी पड़ती हैं और सबसे ज़रूरी बात समाज में रहना सीखना पड़ता है... और यकीन मानिए एक तलाकशुदा औरत के लिए यह समाज बहुत कठोर है।

चित्रलेखा अग्रवाल

“लोग सम्मान के लिए लड़ते हैं, जायज संतति साबित होने के लिए लड़ते हैं। लेकिन मैं दुनिया को बताना चाहता हूं कि मैं मिस्टर एनडी तिवारी की नाजायज औलाद हूं…” रोहित शेखर



यह उस युवक के संघर्ष की दास्तान है जिसे उसे जन्म देने वाला पिता अपना नाम नहीं देना चाहता था। उसे उसकी पहचान से वंचित रखना चाहता था। आम तौर पर ऐसे मामलों में लोग शर्मिन्दगी के कारण चुप लगा जाते हैं और ताउम्र एक गलत पहचान के साथ जीते हैं। मगर रोहित ने शर्मिदगी को परे ढकेलते हुए अपनी पहचान की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की। ओपन पत्रिका की रिपोर्टर सोहिनी चट्टोपाध्याय से उन्होंने कभी अपनी बात साझा की थी जिसे सोहिनी ने एक आलेख का रूप दिया था। इस आलेख को पढ़ कर हम रोहित के संघर्ष को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। रोहित के यह विचार उस समय के हैं जब तक कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आया था। एनडी तिवारी ने उन्हें अपना बेटा स्वीकार नहीं किया था और उनका संघर्ष जारी था। आप सब के लिए प्रस्तुत हैं इस लम्बे आलेख के कुछ महत्वपूर्ण अंश..”


"जब मैं बड़ा हो रहा था, मैं त्रिशूल फिल्म को बार-बार देखता था। उस फिल्म में अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार से कहते थे, तुम मेरे नाजायज बाप हो। उनका यह डायलॉग मुझे काफी प्रभावित करता। लेकिन जब मैंने यह जाना कि मिस्टर तिवारी मेरे जैविक पिता हैं और मिस्टर शर्मा जो मेरे स्कूल में मेरे पिता के रूप में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग अटेंड करते हैं मेरे जैविक पिता नहीं है, मुझे लगने लगा कि यह फिल्म मेरी कहानी बता रही है। इस बात ने मेरे अंदर इस जुनून को पैदा किया कि में मिस्टर तिवारी को बताऊं कि आप मेरे नाजायज बाप हैं।

मैं उनसे बहुत जुड़ाव महसूस नहीं करता था। हालांकि मैं उनसे 14 साल की उम्र से ही लगातार मिला करता था। हर तीन महीने में हम उनसे मिलने जाया करते थे। मां मुझे स्कूल से ले लेती थीं और हम उनके दिल्ली वाले मकान पर जाते थे। उन दिनों वे अपने राजनीतिक कैरियर के शीर्ष पर थे। या तो वे मुख्यमंत्री होते या केंद्र में कैबिनेट मंत्री। उनके बंगले पर जबरदस्त सुरक्षा होती, सैकड़ों लोग उनसे मिलने के लिए इंतजार करते रहते। मगर हमें आने जाने में कोई रोक नहीं होती। वहां का स्टाफ मुझसे बड़े प्यार से व्यवहार करता। मैं चकित हो जाता कि ऐसा क्यों है। मुझे स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिल रहा है। हमारे लिए यह इन्सान क्या है..? यह मेरी बर्थडे पार्टी में क्यों आता है, मुझे इतने उपहार क्यों देता है..?

एक बार हम लोग उनसे मिलने लखनऊ गये थे। उस वक्त वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। तब मैंने उनके स्टेट एयरक्राफ्ट में उड़ने की फरमाइश की। मैंने उनकी गोद में बैठ कर एयरक्राफ्ट में पूरी दिल्ली का चक्कर लगाया था।

नानी ने मुझे बताया था


मैं गौर करता कि उनसे मुलाकात के बाद मेरी मां रोती हुई वापस होती। जब-जब उनसे मुलाकात होती उसके कुछ दिन बाद मेरी मां को अस्थमा का दौरा आ जाता। ज्यादातर वो और मेरी मां अकेले में बातें करते और उनमें तीखी बहस होती। उस वक्त मिस्टर तिवारी मुझे बाहर खेलने के लिए भेज देते, अपने स्टाफ के साथ। उसी दौरान मैंने महसूस करना शुरू कर दिया कि बेडरूम एक निजी क्षेत्र है और लिविंग रूम सार्वजनिक।

एक बार जब मैं 11 या 12 साल का था मेरी नानी ने मुझे बताया कि मिस्टर तिवारी मेरे असली पिता हैं। मैं उनकी बात सुनकर हंस पड़ा। जब मैंने अपनी मां से यह बताया तो उन्होंने कहा कि यह सच है। इसी कारण मिस्टर तिवारी से उनकी बहस होती है। वे उन पर दवाब डाल रही हैं कि वे मुझे अपना बेटा स्वीकार करें। लेकिन वे कहते हैं उनकी पत्नी इस बात के लिए तैयार नहीं है।

मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे

नारायण दत्त तिवारी तब मेरी मां के नजदीक आये जब वह मेरे नाना, प्रोफेसर शेर सिंह से मिलने उनके पास आया करते थे। यह सत्तर का दशक था। मेरे नाना उस वक्त केंद्रीय मंत्री थे और वे हरियाणा राज्य के संस्थापकों में से एक थे। मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे। मेरी मां का वैवाहिक संबंध सुखद नहीं रहा और वे उस दौरान नाना के साथ रहा करती थीं। हालांकि मिस्टर बीपी शर्मा मेरे लिए अच्छे पिता साबित हुए मगर वे मेरी मां के लिए अच्छे पति नहीं थे। मेरे नाना इस बात को समझते थे। मिस्टर तिवारी को भी इस बात का अहसास था। उन्होंने मेरी मां से कहा कि उनकी शादी भी असफल साबित हुई है। वे उस दौरान पचास के लपेटे में थे। उन्होंने मेरी मां से कहा कि वे उनसे एक बच्चा चाहते हैं, क्योंकि उनकी बीवी उन्हें यह सुख दे पाने में सक्षम नहीं है। उन्होंने मेरी मां से वादा किया कि जैसे ही उनका तलाक हो जाता है वे उनसे शादी कर लेंगे। मेरे नाना ने उन पर भरोसा किया और मेरी मां भी सहमत हो गयीं।

जब मेरा जन्म हुआ तो मां ने मुझे रोहित शेखर नाम दिया, उन्हें भरोसा था कि मिस्टर तिवारी मुझे पुत्र के रूप में स्वीकार कर लेंगे। मगर जब बर्थ सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने की बारी आयी तो मिस्टर तिवारी ने यह बहाना बनाया कि इससे उनके राजनीतिक कैरियर पर नकारात्मक असर पड़ेगा। आखिरकार बीपी शर्मा को उस पर हस्ताक्षर करने पड़े।

मैं एक गुस्सैल और संशयग्रस्त किशोर था और कई बार अपनी मां पर बरस पड़ता था कि उन्होंने मेरा जीवन बरबाद कर दिया। 1993 में मिस्टर तिवारी की पत्नी गुजर गयीं और मेरी मां ने सोच अब अंतत: वे मुझे अपनी पहचान दे देंगे। लेकिन तब मिस्टर तिवारी ने हमसे सारे नाते तोड़ लिये।
आखिरकार रोहित को जीत हासिल हुई, एनडी तिवारी अब उन्हें अपना बेटा मान चुके हैं

मैं कह सकता हूं कि उन दिनों मेरी जिंदगी नरक में गुजर रही थी। मुझे पढ़ने में और सोने में परेशानी होती थी। मैं गुस्से से भरा था और खुद को अपमानित महसूस करता था। उस दौरान मैं कालेज में था, मैं डिप्रेशन और नींद ना आने की बीमारी से पीड़ित था। मैं किसी तरह क्लास जाता और पढ़ाई करता।

2002 से 2005 के बीच हम कई बार मिले। मुझे हमेशा होटल में ठहराया जाता था। कमरे में जब हम लोग अकेले होते थे तो वे हमेशा अपनी प्लेट से खाने के लिए मुझे प्रोत्साहित करते थे। कहते थे - यह तो हमारा बेटा है, अपना रास्ता खुद बनायेगा। मगर कमरे से बाहर वे बिल्कुल अलग इनसान होते थे। एक सुबह वे अपने समर्थकों से मुलाकात कर रहे थे, उस वक्त मैंने उनके कमरे में जाने की कोशिश की तो उनके अंगरक्षकों ने मुझे यह कहते हुए रोक दिया कि नहीं साहब इस वक्त नहीं। एक बार मेन गेट के बाहर मैं खड़ा था आसपास कई दूसरे लोग भी उनके इंतजार में खड़े थे। वे जब बाहर आये तो उन्होंने मुझसे निगाहें तक नहीं मिलायी।

एक-दो बार मैं उनको कह चुका था कि मैं पूरी गंभीरता से इस मसले को अदालत में ले जाने का मन बना चुका हूं। मगर वे हमेशा सोचते कि मैं ऐसा नहीं करूंगा। मैं अपने और अपनी मां के लिए यह पहचान हासिल करना चाहता था। क्योंकि हमनें इस दर्द को सहा था।

मैं दिसंबर 2005 में उनसे आखिरी बार मिला। वे किसी काम के सिलसिले में दिल्ली आये थे और मानसिंह रोड स्थित ताज होटल में ठहरे थे। मैं, मेरी मां और मेरी नानी उनसे मिलने गये थे, मगर उन्होंने हमारी तरफ देखा तक नहीं। एक घंटे से अधिक समय तक इंतजार करने के बाद हमने एक चिट में उनके लिए संदेश भिजवाया। मगर जब वे बाहर आये तो हमें दिखाते हुए उस चिट को गोला बनाकर बाहर फेंक दिया। यही वह वक्त था जब मैंने फैसला कर लिया।

हार्ट अटैक, सेरेब्रल स्ट्रोक और मुकद्मा

मेरे वकील और मैंने खूब रिसर्च की। वकील नर्वस था क्योंकि यह अनोखा मुकदमा था। इसके अलावा मिस्टर तिवारी पावरफुल आदमी थे। मैं भी डरा हुआ था। मुझे इस बात का भी डर था कि कहीं मेरे केस को पब्लिसिटी स्टंट मानकर खारिज न कर दिया जाए। इसके अलावा रात को आने वाले फोन कॉल की मुसीबत अलग थी। पिछले एक दशक से हमें इस तरह के धमकी भरे फोन आते रहते थे कि मुझे टुकड़े-टुकड़े कर देंगे और गटर में फेक देंगे। मिस्टर तिवारी हमेशा इस मामले से अपना कनेक्शन होने की बात से मुकर जाते, कहते जरूर हमारा कोई दुश्मन होगा।

5 जुलाई 2007 को मुझे दिल का दौरा पड़ा। मैं घर में बैठकर विंबलडन के मुकाबले देख रहा था कि मुङो पीठ में जबरदस्त दर्द का अहसास हुआ। मुझे देखने घर आये डॉक्टर को यह समझ नहीं आया कि मुझे हार्ट अटैक आया है। उन्होंने मुझे कोई दर्द निवारक दवा दे दी। मैं अपना काम करता रहा। सितंबर 2007 तक हमलोग मुकदमा दायर करने के लिए तैयार थे।

12 सितंबर की रात मुझे मस्तिष्क आघात आ गया, क्योंकि पिछले हार्ट अटैक ने मेरे हार्ट में दो थक्के छोड़ दिये थे। 13 सितंबर को मैं अस्पताल के बिस्तर पर अचेत पड़ा था उसी दौरान मेरे वकील ने मुकदमा दायर किया। जब मेरी मेडिकल रिपोर्ट आयी तो उसमें हार्ट अटैक और सेरेब्रल स्ट्रोक का कारण तनाव बताया गया था। इसके बाद मैंने योग, ध्यान करना और हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक सीखना शुरू कर दिया। मैं धीरे-धीरे ठीक हो रहा था, लेकिन मेरा बायां पैर ठीक से काम नहीं रहा था।

अप्रैल 2008 में मैंने दुबारा दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया। 25 नवंबर 2008 को कोर्ट ने मिस्टर तिवारी के नाम से सम्मन जारी कर दिया। वे अब ऐसे पहले गवर्नर बन गये थे जिनके नाम कोर्ट का समन जारी हुआ हो। मिस्टर तिवारी ने इस आदेश का इस आधार पर विरोध किया कि गवर्नर के रूप में उन्हें कोर्ट में हाजिर होने से छूट मिलनी चाहिये। नवंबर 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने मुकदमे को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, मगर मैंने उस आदेश को चुनोती देने का फैसला किया।

23 अक्तूबर 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने संतति (जैविक पिता) और वारिस (कानूनी पिता) को परिभाषित करते हुए मेरे पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया और मिस्टर तिवारी से डीएनए टेस्ट करवाने के लिए कहा गया। अदालत ने ब्लड टेस्ट के मामले में शीघ्रता बरतने का निर्देश दिया यह कहते हुए कि कहीं मामले का महत्वपूर्ण सुराग हमेशा के लिए खत्म न हो जाये। अदालत का इशारा मिस्टर तिवारी की बढ़ती उम्र की तरफ था, उस वक्त वे 86 साल के हो चुके थे। मगर आठ से दस बार कहे जाने पर भी मिस्टर तिवारी ने अपना सैंपल नहीं दिया।

 मुकदमे की सुनवायी बड़ी त्रसाद थी। मुझे अक्सर बास्टर्ड, पब्लिसिटी स्टंट करने वाला और ब्लैक मेलर कहा जाता और मेरी मां को हृदयहीन महिला कह कर पुकारा जाता।

27 अप्रैल 2012 को दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि मिस्टर तिवारी को ब्लड सैंपल देना ही होगा। उस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि अगर मिस्टर तिवारी सैंपल देने से मुकरते हैं तो समुचित मात्रा में पुलिस बल का इस्तेमाल करते हुए सैंपल हासिल करने की छूट दी गयी थी।

29 मई 2012 को मैंने 2005 के बाद पहली बार मिस्टर तिवारी को देखा जब मैं अपनी मां, अपने वकील और कोर्ट द्वारा तय किए गये अधिकारी के साथ उनके घर गया था। उन्होंने मुझसे पूछा, और बेटा, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मैंने कहा, आपकी कृपा की बदौलत मैंने अपनी पढ़ाई को होल्ड पर रख दिया है और अदालत के चक्कर काट रहा हूं। जब मैंने अपने वकील को उनकी दीवार पर टंगी नेहरू जी की तस्वीर दिखायी तो उन्होंने अपने गार्ड से कहा, देखो बेटा क्या बोल रहा है, उसे यह तसवीर पसंद आयी है। उसको यह भेंट कर देना। मैंने तत्काल कहा, आपसे बहुत सारे भेंट मिले हैं, बस ब्लड सैंपल भेंट कर दीजिये।

उन्होंने बड़ी आसानी से ब्लड सैंपल दे दिये। जब हमने सैंपल पर साइन कर दिये तो वे मेरी मां की तरफ मुड़े। उन्होंने कहा, बहुत दिनों से तुम्हारी आवाज नहीं सुनी। राग दुर्गा सुना दो। मेरी मां यह सुनकर सन्न रह गयी। वह बोली, तुम फिर मुझे भ्रमित कर रहे हो। साइन करो और हमें जाने दो।

जब टेस्ट के नतीजे आयेंगे, मैं अपना नाम बदल कर रोहित शेखर तिवारी सिंह करने की याचिका दायर करूंगा। सिंह मेरे हीरो, मेरे नाना प्रोफेसर शेर सिंह के नाम से होगा। फिर मैं भरन-पोषण की मांग करूंगा जो मिस्टर तिवारी ने सालों से नहीं चुकाया है। पहले मैं भरन-पोषण के बारे में नहीं सोचता था मगर मुकदमे के दौरान उनके एरोगेंस ने मुझे अपना विचार बदलने के लिए मजबूर किया। मैं उन्हें हर चीज अदा करने के लिए मजबूर करूंगा।"


पुण्यमित्र

प्रस्तुत ब्लॉग पुण्यमित्र के ब्लॉग हज़ारो ख्वाहिशें ऐसीसे लिया गया है जिसमें पुण्य ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एनडी तिवारी के नाजायज़ बेटे शेखर के संघर्ष की दास्तान बयां की है। पटना दैनिक प्रभात खबर से जुड़े पुण्यमित्र एक जाने-माने पत्रकार हैं और अपनी सटीक बयानी के लिए जाने जाते हैं।







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