Thursday, 3 April 2014

धर्म परिवर्तन- लोगों के अनुभव



मुझे भी मिली ईसाईं बनने की पेशकश

पूर्वी दिल्ली के शशि गार्डन इलाके में रहने वाली अनुसूचित जाति की नरेश देवी के जेठ-जिठानी, ननद, देवर और देवरानी समेत लगभग सभी ईसाई बन चुके हैं। त्रिलोक पुरी में रहने वाले इनके जेठ लगभग तीस साल पहले ही धर्म परिवर्तन के बाद ईसाई बन चुके थे। उनसे खुद एक ईसाईं मिशनरी के प्रतिनिधि ने संपर्क किया था और उन्हें ईसाईं बनने के एवज में कई सुविधाएं देने की पेशकश की थी। नरेश देवी के पति की मौत के बाद उनके ऊपर भी सबने दवाब डाला कि तुम अकेली हो, अपने घर और बच्चों की देखभाल कैसे करोगी, अगर ईसाईं बन जाओ तो वो लोग तुम्हारी हर तरह से सहायता करेंगे, लेकिन नरेश देवी इसके लिए तैयार नहीं हुई। 

वो बताती हैं कि घर के पास ही एक चर्च में हर हफ्ते कुछ सभाएं होती हैं जिनमें उन लोगों को ईसाईं बनने के लिए प्रेरित किया जाता है जो ईसाईं नहीं हैं। एक बार जब आप ईसाई बनना स्वीकार कर लेते हैं तो आपको बपतिस्मा दिया जाता है। यानि आपको पहले पवित्र जल में डुबकी लगाकर पवित्र होना होता है। पवित्र जल का यह कुंड या तो चर्च में ही बनाया जा सकता है, किसी पोखर या तालाब को चुना जा सकता है या फिर किसी एक बड़ी हौदिया या बर्तन में पानी भरकर उसे भी पवित्र होने के लिए इस्तमाल किया जा सकता है। पवित्र होने के बाद आपको ईसाईं धर्म की दीक्षा दी जाती है। एक बार ईसाईं धर्म स्वीकार करने के बाद चर्च के ही लोग आकर आपके घर से आपका मंदिर और मूर्तियां उठा कर ले जाते हैं और घर में प्रभू यीशू की तस्वीर लगा जाते हैं। आपको क्रॉस पहनना ज़रूरी होता है।
 ईसाईं बनने के बाद आप हिन्दु धर्म में प्रचलित कोई भी व्रत जैसे करवाचौथ, शिवरात्रि, नवरात्रा वगैरह नहीं रख सकते लेकिन आपको गुडफ्राइडे से पहले चालीस दिन तक उपवास रखने होते हैं जो अनिवार्य होता है। ईसांई धर्म अपनाने के बाद आप अपने धर्मे के किसी रिश्तेदार की मौत में भी नहीं जा सकते और ना ही तेरहवीं वगैरह का खाना खा सकते हैं, हां लेकिन आपका चर्च के किसी पादरी या जानने वाले ईसाई की मौत में जाना अनिवार्य होता है। नरेश बताती हैं कि एक बार ईसाई बनने के बाद चर्च ही आपकी बीमारी और बच्चों की पढ़ाई की सारी जिम्मेदारियां ले लेता है। कई बार बाहर के लोग चर्च में आते हैं औऱ आपके बच्चों और आपकी फोटो खींच कर ले जाते हैं और उन्हें बहुत सारे कपड़े, किताबें, कॉपियां आदि भी दान में देकर जाते हैं। 

नरेश देवी के अनुसार चूंकि ईसाईं बनने के बाद आपकी इतनी सुविधाएं मिलती हैं और आप दलित ना रहकर इज्जतदार बन जाते हैं इसलिए उनके कई रिश्तेदार ईसाई बनना स्वीकार कर चुके हैं या कर रहे हैं, यहां तक कि उनका 17 साल का बेटा सागर भी ईसाई बनना चाहता है। 

मिशनरी स्कूलों की छात्रों को ईसाईयत की तरफ मोड़ने में अहम् भूमिका

सम्वेदना वैलफेयर सोसाइटी और युवा भारत संगठन से जुड़ी रूचि राठौर जो बचपन से कॉन्वेन्ट स्कूल में पढ़ी हैं इस मुद्दे पर अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि भारत के हर शहर में संचालित और भारतीय परिवारों के लिए स्टेटस सिंबल की पहचान बन चुके मिशनरी स्कूल दरअसल ऐसी जनरेशन तैयार कर रहे हैं, जिन्हें अपनी संस्कृति और धर्म के बारे में कुछ नहीं मालूम और जो केवल जीसस को ही हर परेशानी से उबारने वाले भगवान के रूप में देखते हैं। रुचि जो सेंट कॉनरेड स्कूल, आगरा से पढ़ी हैं, अपने अनुभव याद करते हुए बताती हैं, कि हम सबको बाइबिल मिला करती थी, एसेम्बली में सारे लोग कैरल्स गाया करते थे, सारी प्रेयर्स भी बाइबिल पर आधारित होती थी, हमारे स्कूल में एक चर्च भी हुआ करता था और फादर हमें खाली समय में वहां जाने को प्रेरित करते थे।
 रुचि बताती हैं कि हर बार एसेम्बली के बाद हम लोग हाथ से शरीर पर क्रॉस बनाया करते थे, अपनी किताबों-कॉपियों में जीसस की फोटो रखा करते थे और हमारी शिक्षा इस तरह से होती थी कि लगभग हर हफ्ते हमें एक लेक्चर जीसस के बारे में दिया जाता था। सारे बच्चे यह मानते थे कि अगर कोई मुश्किल होगी तो केवल जीसस ही उन्हें इससे बचा सकता है और वहीं उनके सारे पापों से मुक्ति दिला सकता है। चूंकि हमारे घरों में तब हमें इतना ज्यादा पूजा-पाठ करने को नहीं कहा जाता था और ना ही हम रामायण या अन्य धर्मग्रंथ पढ़ते थे, हमारे ऊपर ईसाई धर्म का ही प्रभाव ज्यादा था। कई बार तो हम सोचा करते थे कि क्यों हम हिन्दू धर्म के हैं, काश हम भी ईसाई होते। क्योंकि हमारी शिक्षा ऐसी होती थी जिसमें हिन्दू होने का मतलब था, पुरानी विचारधारा और रुढ़ियों में जकड़े लोग और ईसाई होने का मतलब था आधुनिक सोच, सभ्रांत वर्ग और स्वतंत्र विचार रखने वाले लोग जिनका समाज में स्वीकार्य कहीं ज्यादा होता है और जिन्हें हर कोई रोल मॉडल की तरह देखता है। 

कॉन्वेन्ट स्कूल में पढ़ी रुचि की तरह ही लखनऊ के स्टैला मैरिस में अध्यापिका समीक्षा अग्रवाल भी मानती हैं कि यह स्कूल बहुत नहीं तो कुछ हद तक तो बच्चों को उनके धर्म से विमुख करने में अहम भूमिका निभा ही रहे हैं। समीक्षा कहती हैं कि उनके स्कूल में नन्स कभी आपके धर्म के बारे में गलत नहीं कहती लेकिन वो ईसाई धर्म और जीसस की इतनी प्रशंसा करते हैं, उसका इतना प्रचार करते हैं कि कुछ गलत कहने की ज़रूरत नहीं रह जाती। ईसाई त्यौहारों जैसे गुड फ्राईडे और क्रिसमस वगैरह बहुत ही अच्छे से मनाए जाते हैं जबकि हिन्दू त्यौहारों पर छुट्टियां भी कम और मुश्किल से दी जाती हैं। छात्रों को जीजस के नाम पर रेगुलर चैरिटी करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, उन्हें कैरल्स सीखने और बाइबिल पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। धीरे-धीरे यह बातें बच्चों पर इतना असर करती हैं और वो अपने धर्म को भूलकर ईसाईयों और जीसस का गुणगान करने लगते हैं।

धर्म परिवर्तन के लिए हिन्दुत्वादी लोग भी जिम्मेदार

डॉक्टर एकता बंसल, सफदरजंग अस्पताल दिल्ली में कार्यरत हैं। इस बारे में 
अपना अनुभव बांटते हुए वो कहती हैं कि मैंने भी अस्पताल में बहुत से ऐसे गरीबों को देखा है जो पहले हिन्दु या किसी और धर्म के थे और फिर ईसाई बन गए। डॉक्टर एकता कहती हैं कि उन्हें इसमें कोई परेशानी नहीं दिखती। वो बताती हैं कि ईसाईं धर्म अपनाने वाले अधिकतर दलित लोग होते हैं, अनुसूचित जाति-जनजाति के होते हैं जिन्हें समाज में बेहद हीन दृष्टि से देखा जाता है। दूसरे यह लोग गरीब होते हैं जिनकी परेशानियों में कोई उनकी मदद भी नहीं करता। ऐसे में अगर ईसाई मिशनरी के लोग, भले ही उनका धर्म बदलकर, उनका जीवन सुगम बना रहे हैं और उनकी सहायता कर रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है। वैसे भी अगर हिन्दू धर्म के होने के बावजूद जब आप ही के धर्म के लोग आपकी मदद की फरियाद ठुकरा देते हैं, और दूसरे धर्म के लोग आपकी सहायता करते हैं तो ऐसे में धर्म बदलने में बुराई क्या है जबकि इससे आपको सम्मान से जीने का अधिकार भी मिलेगा, बच्चों को शिक्षा भी मिलेगी और आर्थिक मदद भी।

 डॉक्टर एकता यह भी कहती हैं कि हिन्दुत्ववादी लोगों ने दरअसल अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कुछ भी नहीं किया है। ईसाईं मिशनरीज़ अगर लोगों की मदद करके या फिर उन्हें प्रलोभन देकर अगर उनका धर्म बदल रही हैं तो इसके लिए सिर्फ ईसाई कुसूरवार नहीं बल्कि वो लोग भी कुसूरवार हैं जो अपना धर्म बदलने को तैयार हो जाते हैं और वो हिन्दुत्ववादी लोग भी जो कभी गरीबों और दलितों की मदद तो नहीं करते पर उनके धर्म बदलने पर ज़रूर हल्ला मचाने पहुंच जाते हैं।

ईसाई बनने में क्या हर्ज़ है...


पूर्वी दिल्ली में खिचड़ीपुर के पास एक चर्च हैं जिसे सभी 13 नंबर का चर्च कहते हैं। जब अपनी रिपोर्टिंग के सिलसिले में मैं शाम को यहां पहुंची तो बहुत सारे लोग यहां मौजूद दिखाई दिए। उनमें से कुछ लोगों से मैंने जब इस मुद्दे पर बात करनी चाही तो उन्होंने बिल्कुल रुचि नहीं ली। ईवनिंग मास के बाद मैंने वहां मौजूद कई लोगों से पूछा कि क्या आप जन्म से ईसांई हैं या बाद में ईसाईं बने हैं। इस पर उनमें से अधिकतर लोगों का यहीं जवाब था कि हम 10-15, 4, ,5 या 3 साल पहले जीसस की शरण में आए हैं और हमें यहां आकर बहुत शांति मिली है। बल्कि एक महिला ने तो मुझसे कहा कि तुम भी प्रभू यीशू की शरण में आओ, तुम्हें तुम्हारे पापों से मुक्ति मिलेगी और इस तरह के सवालों का जवाब भी मिल जाएगा। 

जब मैंने उनसे यह कहा कि मैं भी अपना धर्म बदलना चाहती हूं और इसलिए यहां आईं हूं तो उनमें से काफी लोग उत्साहित दिखने लगे। वो मुझे ईसाई बनने के फायदे गिनाने लगे। जब उनमें से एक से को मैंने यह बताया कि ईसाईं धर्मातंरण को लेकर मेरे मन में कई सवाल हैं तो उन्होंने मुझसे कहा कि कम से कम ईसाईं लोग मुसलमानों की तरह जबरदस्ती किसी का धर्मांतरण नहीं करते। हम लोग उन लोगों को एक विकल्प देते हैं कि अगर आप ईसाईं बनना चाहे तो बन सकते हैं बदले में आपको सुविधाएं मिलेंगी। इसमें हर्ज क्या है, और फिर हम केवल लोगों को ईसाई नहीं बनाते उनकी जिम्मेदारी भी लेते है। इस तरह हम उनका सामाजिक उत्थान कर रहे हैं बदले में अगर अपने धर्म से उन्हें जोड़ना चाहते हैं तो क्या हर्ज हैं?

चित्रलेखा अग्रवाल


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