चंडीगढ़। देश में गौमाता का खोया हुआ सम्मान और स्थान वापस दिलाने के लिए आजीवन प्रयासरत रहने का संकल्प लेने वाले पूज्य गुरुदेव गोपाल मणि महाराज को आज पूरा भारत बेहद सम्मान की दृष्टि से देखता है। उनके द्वारा रचित गौमहत्व का ग्रंथ ‘धेनुमानस’ देशवासियों को गाय के महत्व से परिचित करा रहा है। गुरुदेव के जीवन का एकमात्र लक्ष्य गौरक्षा और गौसेवा है। वो केवल यहीं चाहते हैं कि एक बार फिर से भारत में उस स्वर्णिंम युग की वापसी हो जब घर-घर में गाय हुआ करती थी और कोई निरोगी नहीं था। लोगों को गाय का महत्व समझाने और गाय की रक्षा के लिए जागरूक करने के उद्देश्य से गुरुदेव देशभर में घूम-घूम कर गौकथा का वाचन करते हैं। उन्होंने कमजोर, अपाहिज और सड़कों पर घूमने वाली अनेक गायों के उचित रखरखाव और देखभाल के लिए कई शहरों में गौशालाओं का निर्माण भी करवाया है।
गोपाल मणि जी ने गाय को देश की राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने का संकल्प लिया है, और इसी संकल्प को देश की जनता और प्रशासन तक पहुंचाने के लिए गौक्रांति की शुरुआत की है जिससे गाय केवल हिन्दु धर्म का ही नहीं बल्कि अन्य धर्मो, विचारों और प्रतिष्ठा का भी हिस्सा बने और हर व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग बने। गुरुदेव के इन प्रयासों को लेकर हम और आप जैसे आम इंसानों के मन में काफी सवाल उठते हैं क्योंकि हमने ना तो धेनुमानस का पाठ किया है और ना ही हम गाय के महत्व को समझते हैं। आप लोग भी शायद सोचते होंगे कि गुरुजी क्यों केवल गाय को लेकर ही इतने चिंतित हैं, ऐसा क्या है गाय में, क्यों इतनी महत्वपूर्ण है गाय..? और भी तो पशु हैं जिनको रक्षण की ज़रूरत है, फिर गुरुजी का प्रयास केवल गाय के लिए ही क्यों...? ऐसे ही कुछ सवालों और जिज्ञासाओं को लेकर हमने गुरुदेव गोपाल मणि जी से बात की। प्रस्तुत है उस बातचीत के कुछ अंश..
आपका ध्यान गाय बचाने पर कैसे गया। कब और क्यों आपने सोचा कि गाय को बचाना है और उसके महत्व को दुनिया के सामने लाना है जिसकी वजह से आपने धेनुमानस की भी रचना की।
जय गौ माता की…। देखिए गाय हमारे समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गाय हमारे धर्म में है, गाय हमारे दिलों में है, दिमाग में है। हमारे समाज और संस्कृति में तो गाय का बहुत ज्यादा महत्व है। गाय की उपासना की जाती है, उसके पंचगव्य को पूजा में प्रयोग किया जाता है, उसके गोबर से घर को स्वच्छ किया जाता है। तो गाय तो शुरू से ही भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। आज़ादी से पहले और काफी बाद तक भी लोगों में गाय के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना थी। घरों में गाएं पलती थी और बच्चे-बड़े सब उसका दूध पीकर जीवन जीते थे। आज जिस तरह से गौहत्या हो रही है, उसमें भारतीय नहीं अंग्रेजी दिमाग चल रहा है जो हमारे दिमाग में इस कदर जमकर बैठ गया है, कि उसकी वजह से हम अपनी जड़ों को भूल गए हैं, अपना भला-बुरा सोचने की ताकत गंवा बैठे हैं। उस गाय को भूल गए हैं जो हर तरह से हमें जीवनदान देने में भूमिका निभाती है। जब देश में निरंतर गायों को कम होते और गौमाता की हत्या होते देखा तभी सोच लिया कि अब गाय माता को बचाने की दिशा में प्रयास करना होगा। भारतीय समाज जो बदलते वक्त के साथ गाय को भूल चुका है, उसे फिर से गाय का महत्व याद दिलाना होगा, उसे फिर से घर घर में लाना होगा। बस इसी सोच के साथ अपने गौ रक्षा आंदोलन की शुरूआत की और देश भर में जा-जाकर इसके प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयत्न किया।
आपको धेनुमानस की रचना करने की प्रेरणा कैसे मिली..?
देखिए धेनुमानस मेरी नहीं हमारे भारत के प्राचीन ऋषि मुनियों की रचना है। मैं इसकी रचना का श्रेय कैसे ले सकता हूं। हमारे ऋषि मुनि जंगल में गायों के बीच रहते थे, गाय के महत्व और उसके मानव जीवन पर प्रभाव को जानते थे और तब उनके मुंह से निर्मल गौकथा का वाचन होता था। मैंने तो गौ-गंगा, गौरी-गणेष और गुरु की प्रेरणा से सिर्फ उसी गौकथा को कलमबद्ध और संकलित किया है, ताकि इस ग्रंथ के जरिए हर इंसान तक गौमाता का महत्व और उनकी सरस कथा पहुंच सके। हर इंसान गौ महत्व को समझ सके। दुनिया मुझे इसका रचियता मानती है तो यह उनकी विनम्रता है लेकिन यह केवल साधु-संतों की प्रेरणा से संभव हुआ है।
आप कहते गाय प्राचीनकाल से पूज्यनीय है तो क्या हमारे पुराणों में भी गाय का जिक्र मिलता है?
बिल्कुल मिलता है। चारों वेदों और उपनिषदों में गाय के महत्व संबंधी बातें और श्लोक लिखे हैं। रामायण की रचना करने वाले तुलसीदास जी ने कहा है कि रामायण की चौपाई गाय के चार पैर हैं, श्लोक गाय का दुग्ध हैं जिनका पान करने से अमृतपान की अनुभूति होती है। संस्कृत भाषा पूरी गौमय होने के कारण ही इतनी सरस और सहज है। गाय तो चलता फिरता, साक्षात देवालय है जिसमें तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का वास है। सुबह गाय के दर्शन करने मात्र से भगवत भक्ति का पुण्य प्राप्त हो जाता है। गाय की रक्षा नहीं हो पाई तो बाकी मानव निर्मित देवालयों और मन्दिरों का क्या महत्व रह जाएगा। गाय नहीं रही तो यह समाज ही नहीं रहेगा। “गावो विश्वस्य मातर:”.. गाय का आशिर्वाद ग्रहण करने वाले मनुष्य के घर में कभी दरिद्रता नहीं आती। जीवन सुखी होता है और लोक व परलोक दोनों सुधरते हैं।
आप का ध्यान केवल गाय के संरक्षण पर ही क्यों केन्द्रित है। हिन्दु धर्म में तो और जीवों को मारना भी पाप है। फिर केवल गाय को बचाने के लिए ही आप क्यों प्रयासरत हैं?
बिल्कुल, हिन्दु धर्म में किसी भी जीव की हत्या से पाप लगता है। मुर्गे को मारना भी गलत है, मछली को मारना भी गलत है, पेड़ों से हरा पत्ता तक तोड़ना निषिद्ध है। लेकिन गाय की तुलना तो किसी भी जीव से नहीं होती। गाय का स्थान तो भारतीय समाज में माता का है और सबसे पहले माता को बचाना ज़रूरी है। पहले समाज के प्राण को तो बचाओ, वहीं खत्म हुए जा रहे हैं..। गाय बचेगी, लोग गाय के पंचगव्य का पान करेंगे, शाकाहारी बनने की प्रेरणा उन्हें मिलेगी तो बाकी जीवों की रक्षा भी होगी। आज समाज में बहुत ज्यादा बदलाव हो चुके हैं। पूरी की पूरी भारतीय संस्कृति जो गौ पर आधारित थी, बदल चुकी है। इसे फिर से सही दिशा में ले जाना है। एक एक करके कदम आगे बढ़ाना है और सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम गाय की रक्षा करना है। एक बार गौ रक्षा के लिए सब प्रतिबद्ध हो जाए तो बाकी जीवों को बचाने के प्रति लोगों में प्रतिबद्धता खुद-ब-खुद आ जाएगी।
आप सरकार से क्या चाहते हैं?
देखिए हम गौ रक्षा आंदोलन कर रहे हैं। गाय को बचाने के लिए और उसके संवर्धन हेतु हमने सरकार से कुछ मांगे रखी हैं। हमारी पहली मांग यह है कि गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिया जाए। जब गौमाता का दर्जा राष्ट्रमाता का हो जाएगा तो गोवध पर रोक लगेगी। गाय पर अनुसंधान होगा। गाय का सरकारी तौर पर रक्षण किया जाएगा और यह गाय को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल होगी।
हमारी दूसरी मांग यह है कि गौवध पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया जाए। गौवध करने वालों को कड़ी सजा मिले और लोगों को घरों में गाय पालने के लिए प्रेरित किया जाए।
हमारी तीसरी मांग यह है कि गाय के गव्य का प्रयोग देश और देशवासियों के भले के लिए किया जाए। देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए किया जाए। देशी खाद पर प्रतिबंध लगाया जाए और गाय के गोबर से खाद का उत्पादन किया जाए। गाय के गोबर में अत्यधिक मात्रा में मीथेन गैस होती है जिससे ना केवल मिट्टी उपजाऊ बनती है बल्कि मीथेन का प्रयोग करके गाड़ियों को चलाने के लिए ईंधन हेतु गैस का उत्पादन भी किया जा सकता है। विदेशों से पेट्रोल के आयात पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए और गाय के गोबर से निकलने वाली मीथेन गैस से ईंधन बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए जिससे वातावरण भी स्वच्छ होगा। इसके अलावा गौमूत्र में जो अपार औषधीय गुण होते हैं, उसका लाभ लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार गौमूत्र से औषधि निर्माण की दिशा में भी पहल करे।
हमारी चौथी मांग यह है कि सरकार हर व्यक्ति को निशुल्क गाय का दूध उपलब्ध कराए। हर व्यक्ति को कम से कम दस वर्ष की आयु तक गाय का दूध पीने के लिए मिलना चाहिए तभी उनका सही मानसिक और शारीरिक विकास होगा। सरकार के ऊपर जब गाय का दूध उपलब्ध कराने का भार होगा तो खुद-ब खुद गाय के संरक्षण के लिए प्रयास होने लगेंगे और हमारे देश से गौवध का कलंक भी मिट जाएगा।
और हमारी पांचवी मांग यह है कि गाय का महत्व लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार की तरफ से प्रयास हो। जैसे उसे पाठ्य सामग्री में शामिल किया जाए। पहले गाय हमारी शिक्षा का हिस्सा थी। लेकिन जैसे-जैसे समाज में भ्रष्टाचार बढ़ा, अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव बढ़ा, गाय हमारी किताबों से गायब हो गई। जब गाय किताबों से गायब हुई तो लोगों को उसका महत्व समझ में आना बंद हो गया। इसलिए जब गाय पाठ्यक्रम में शामिल होगी तो हर बच्चा, भारतीय पीढ़ी गाय का महत्व समझेगी, गाय बचाने के प्रति जागरूक बनेगी और फिर हम गाय को फिर से भारत के घर-घर में स्थापित कर पाएंगे।
लेकिन सिर्फ सरकार के आपकी मांगे मान लेने भर से क्या गाय की रक्षा हो जाएगी? क्या गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने भर से गाय का वध रुक जाएगा। आपको भूलना नहीं चाहिए कि भारत का राष्ट्रीय पशु टाइगर है और जब राष्ट्रीय पशु होने के बावजूद टाइगर की रक्षा नहीं हो पाई तो कैसे सिर्फ गाय को राष्ट्रमाता घोषित कर देने भर से उसकी रक्षा हो जाएगी?
इसलिए तो हम चाहते हैं कि गाय के प्रति जनभावना बने। गाय की स्वीकार्यता देश के हर इंसान के मन में हो, घर में हो। हम जानते हैं कि सरकारें जनभावना से चलती हैं। जिस दिन जन-जन में गाय को बचाने के प्रति भावना उत्पन्न हो गई, अपने आप सारी मुश्किलें आसान हो जाएंगी। यह आंदोलन केवल सरकार से मांगे मनवाने के लिए नहीं है बल्कि भारतीय लोगों में गाय के प्रति आदर और सम्मान जगाने के लिए भी है। इसलिए तो हम नगर-नगर जा कर गौकथा का वाचन करते हैं, ताकि लोग गौ का महत्व जाने। यह सच है कि जब तक लोग गौमहत्व नहीं समझेंगे, सरकारी प्रयास से कोई फायदा नहीं होगा, जमीनी स्तर पर लोगों में गाय के प्रति सम्मान को जगाना होगा तभी सही मायने में हमारे प्रयासों को सफलता मिलेगी और उसके लिए हम निरंतर प्रयास कर रहे हैं। लेकिन सरकार की तरफ से भी पहल होनी ज़रूरी है। क्योंकि बहुत से लोग है जो गाय के महत्व को जानते हैं, लेकिन चूंकि कानून और सरकार उनका साथ नहीं देते, वो चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रहे हैं। इसलिए जब सरकार की तरफ से पहल होगी तो बदलाव की शुरूआत निश्चित तौर पर हो जाएगी। और आपने जो टाइगर की बात की उस पर भी मैं यह कहना चाहूंगा कि सरकार अंग्रेजी संस्कृति से प्रभावित होकर टाइगर को बचाने की बात तो करती है लेकिन अपनी गौमाता को बिल्कुल भूल चुकी है जो भारतीय समाज का आधार है। यहां तक कि पेड़-पौधे भी केवल दिन में ऑक्सीजन छोड़ते हैं लेकिन गाय एकमात्र ऐसा जीव है जो दिन में भी ऑक्सीजन छोड़ता है और रात में भी। गाय रहेगी तो पर्यावरण भी बचा रहेगा, साफ और शुद्ध वायु मिलेगी और जनता का स्वास्थ्य और भविष्य सुदृढ़ होगा सो अलग से। तो गाय तो कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है इसलिए इसे हर हाल में बचाना ज़रूरी है।
अपनी तरफ से कुछ संदेश देना चाहेंगे।
मैं अपने देशवासियों से सिर्फ यहीं कहना चाहता हूं कि जब भारत का स्वर्णिम युग था तब हमारी स्वर्ण मुद्राओं पर गाय और बैल के चित्र अंकित होते थे। क्योंकि तब लोग गाय के महत्व को जानते थे। गाय को पूजा जाता था। अंग्रेजों के शासन के बाद से उस स्वर्णिम युग का अंत होना शुरू हुआ, गौ हत्या की शुरूआत हुई और आज तो हम गौहत्या में अग्रणी देशों में एक बन चुके हैं। जिस भारत में दूध की नदियां बहती थी, आज गाय का खून बह रहा है। हमें अपने प्रयासों से इस स्थिति को बदलना है, फिर से उस स्वर्णिम युग को वापस लाना है और इसके लिए गाय को बचाना होगा। हर किसी को प्रयास करने की जरूरत है। अपने घर के आस-पास गौशालाएं बनवाईए। गाय को बचाने में योगदान दीजिए। गाय के महत्व का प्रसार कीजिए। घर-घर में धेनुमानस के पाठ की शुरुआत कीजिए। जो भी थोड़ा-बहुत शारीरिक, आर्थिक या मानसिक योगदान आप गाय के संरक्षण हेतु दे सकते हैं, उसे दीजिए और भारत के स्वर्णिम युग की वापसी में सहयोग कीजिए। जय गौ माता की..
चित्रलेखा अग्रवाल

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