खाड़ी देशों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं भारत से पहुंचे मजदूर, गुलामों सा जीवन जीने को मजबूर
अमानवीय हालातों में काम करने को बाध्य हैं प्रवासी मजदूर, एक नज़र डरावने आंकड़ों पर
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| लेबर कैम्प्स में इस तरह रहते हैं प्रवासी मजदूर |
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| कई बार एक ही बिस्तर पर रहते हैं दो दो मजदूर |
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| और कई बार दर्जन भर |
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| और ऐसी होती हैं इन मजदूरों की किचेन्स जहां कई बार दो सौ लोगों को एक साथ खाना बनाना होता है |
अमानवीय हालातों में काम करने को बाध्य हैं प्रवासी मजदूर, एक नज़र डरावने आंकड़ों पर
ü वर्ष 2022 में होने वाले
फीफा वर्ल्डकप की मेजबानी के लिए क़तर में कई महत्वकांक्षी निर्माण श्रंखला मे हैं
और वहां निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है।
ü दुनिया में सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूर क़तर में हैं।
वहां रहने वाले 94% लोग दूसरे देशों से काम की तलाश में आए हैं।
ü आम तौर मजदूरों को उनके देश से पैसे और सहुलियतों के
वादे करके यहां लाया जाता है, जो कि वास्तविकता से परे है क्योंकि
यहां पर उन्हें ना सुविधाएं मिलती हैं और ना काम के पैसे बल्कि उनके पासपोर्ट भी
जब्त कर लिए जाते हैं जिससे वो चाहकर भी वापस नहीं लौट सकते।
ü नियमित रुप से 40 डिग्री से अधिक पारे के बीच कई घंटे लगातार काम करने
वाले मजदूरों के लिए यहां कोई सुविधा नही है।
ü एक छोटे से तंग हाल कमरे में एक दर्जन से अधिक मजदूर
रहने को मजबूर हैं और लगभग 200 लोगों के मध्य एक किचन की व्यवस्था की
जाती है जिनमें मजदूरों को खुद ही अपना खाना बनाना होता है।
ü ज्यादातर मजदूर सप्ताह में एक दिन के अवकाश के साथ रोज
लगातार 12 घंटों तक काम करते हैं।
ü पिछले साल नवम्बर में प्रकाशित एमनेस्टी संस्था की रिपोर्ट जो कि 210
कामगारों और 22 कम्पनियों के अधिकारियों से बातचीत पर आधारित थी, के मुताबिक कतर
में निर्माण स्थलों पर सुरक्षा की पूरी तरह से अनदेखी की जाती है। साल 2012 में
1000 से ज्यादा मजदूरों को ऊंचाई से गिरने के बाद दोहा के मुख्य अस्पताल के ट्रॉमा
सेन्टर में भर्ती कराया गया जिनमें से दस फीसदी लोग अपाहिज हो गए।
ü यह रिपोर्ट बताती है कि यहां प्रवासी मजदूरों को बेदर्दी से शोषण किया जाता
है, उनसे कई-कई घंटों तक काम लिया जाता है और कई बार उनकी तन्ख्वाह रोक ली जाती
है। रिपोर्ट के अनुसार इन मजदूरों की इनके मालिकों के लिए कोई कीमत नहीं है। एक
कम्पनी के अधिकारी ने तो साक्षात्कार के दौरान इन्हें ‘कैटल’ कहकर संबोधित किया।
ü शानदार गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण करने वाले मजदूरों
को निर्माण स्थल से अलग लेबर कैम्प नाम की बस्तियों में रखा जाता हैं जहां उनके
रहने के लिए तंग कमरे होते हैं और सुविधाएं भी नाममात्र की होती हैं।
ü इन मजदूरों को तड़के सुबह बसों में भरकर कंस्ट्रक्शन
साइट पर लाया जाता है और देश शाम या कई बार रात तक वापस लेबर कैम्प में छोड़ा जाता
है।
ü यहीं नहीं मजदूरी को लेकर मालिकों से विवाद होने के चलते
कई बार प्रवासी मजदूरों के खाने की मात्रा भी कम कर दी जाती है।
ü प्रवासियों के मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए कार्यरत
संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत फ्रेंकोइस क्रीपिओ का कहना है कि “क़तर में श्रम कानून के पालन को लेकर बहुत कमियां हैं और काफ़ला प्रणाली को समाप्त करने की ज़रूरत है जिसके
अंतर्गत प्रवासी श्रमिक केवल एक मालिक के साथ काम करने को बाध्य होते हैं”।
ü सितम्बर 2013 में छपी एक रिपोर्ट में ब्रिटिश अखबार द
गार्डियन ने कतर में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों की हालत आधुनिक गुलामों जैसी बताई
है।
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वर्ष 2010 से
2012 के बीच कतर स्टेडियम के निर्माणकार्य के दौरान मरने वाले भारतीय मजदूरों की
संख्या 700 थी।
निधि रावत


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