कई मामलों में अस्पतालों और दूतावास को भी समझ नहीं आता की वे क्या करें। वर्ष 2008 में इसी तरह का एक मामला हुआ था। सऊदी अरब की राजधानी रियाद के अल-मौवसत अस्पताल में 27 नवंबर 2008 को शेख मज़ाहरुद्दीन का 58 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उनका परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीवान जिले में रहता है। उनकी मौत के बाद भारतीय दूतावास ने जब भारत में उनके परिवार से सम्पर्क साधा तो उनके परिवार ने उनके शव को लेने से इनकार कर दिया और साथ ही रियाद में उनके शव को दफनाए जाने की अनुमति पर भी दस्तखत करने से भी मना कर दिया। लम्बे समय तक मज़ाहरुद्दीन का शव अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा हुआ रहा। न तो दूतावास उसके शव का दावा प्रस्तुत करने के लिए उसके परिवार को मना पाया न ही पारिवारिक अनुमति के अभाव में उसे दफ़न कर पाया।
मज़ाहरुद्दीन की पत्नी अस्मा खातून ने यह कहते हुए किसी भी कागज़ पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया के जीते जी मज़ाहरुद्दीन ने अपने परिवार को कभी सहायता नहीं की तो क्यों मरने के बाद हम उनके शव को लें। मज़ाहरुद्दीन के बच्चों ने भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई जो कि अब बड़े हो चुके हैं और अपने पिता के शव को भारत लाने का खर्च उठा सकते हैं।
अब सवाल यह है कि क्या मज़ाहरुद्दीन ने वाकई अपने परिवार को पूछा नहीं था और जो उसकी बीवी कह रही है वो सच है या कोई और वजह थी जिसके चलते मजाहरुद्दीन अपने परिवार की खोज-खबर नहीं रख पाया... जी हां इसके पीछे भी दर्द भरी कहानी है- दरअसल 1994 में मज़ाहरुद्दीन कई सारे भारतीयों की तरह ही एक स्पांसर की सहायता से काम के तलाश में रियाद आया था। लेकिन यहां आने के बाद वो अपने मालिक के जाल में फँस गया, जिसने उसे परिवार से मिलने के लिए वापस जाने का अवसर ही नहीं दिया और ना वहां से उनकी खोज खबर लेने दी। यहां तक की परिवार को भेजने के लिए पैसे भी उसको नहीं मिल पाते थे। इस बात को लेकर मज़ाहरुद्दीन ने अपने मालिक के ऊपर मामला भी दर्ज कराया था। जिसका फैसला वर्ष 2002 में हुआ। मज़ाहरुद्दीन को उसके बकाया वेतन के तौर पर हज़ारों रियाल अदा किये गए और उसके वापस अपने देश भारत जाने में सहायता करने के लिए भारतीय दूतावास ने उसे नया पासपोर्ट भी उपलब्ध कराया। लेकिन अब तक मज़ाहरुद्दीन इतना निराश हो चुका था कि उसने भारत न जाकर रियाद में ही रुक कर नई जगह काम करने का फैसला लिया। इस दौरान उसने अपने परिवार से किसी भी प्रकार का सम्पर्क नहीं किया और इसी का खामियाजा वो 6 साल से अस्पताल के मुर्दाघर में दफनाए जाने का इंतज़ार करके भुगत रहा है।
बहरहाल भारतीय दूतावास ने लम्बे समय तक मज़ाहरुद्दीन के परिवार को उसको दफ़नाए जाने के अनुमति पत्र पर दस्तखत करने के लिए मनाया, लेकिन उन्हें अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। और अब दूतावास विशेष अधिकार के तहत मजाहरुद्दीन का शव रियाद स्थित भारतीय समाज सेवकों को सौंपने का मन बना रहा है जो उसका क्रिया कर्म वहीं कर देंगे।\
निधि रावत

No comments:
Post a Comment