Thursday, 3 April 2014

मुफ्त इलाज, आर्थिक सहायता और अच्छे जीवन स्तर का प्रलोभन देकर दलितों और गरीबों को ईसाई बनाने में जुटी मिशनरीज, भारत में लगातार बढ़ रही है परिवर्तित ईसाईयों की संख्या...


लोगों के बीच खुद को जीवनरक्षक बताकर, बिना हित के गरीबों की मदद करने वाले मसीहाओं के रुप में खुद को स्थापित करने वाली मिशनरीज का भारत में सदियों से स्वागत होता रहा है और हम हिंदुस्तानियों ने इन अच्छे कामों के लिए हमेशा इनका आभार व्यक्त किया है। लेकिन सच्चाई यह है कि विदेशी सहायता के जरिए डॉलरों में खेलती मिशनरीज ने इसी विश्वास का फायदा उठाकर ईसाईयत को पूरे भारत में फैला दिया है और आज देश में कमीशन के आधार पर लोगों का धर्म परिवर्तन कराने वाले समुदायों और संगठनों की बाड़ सी आ गई है। यह सभी संस्थाएं आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों और इलाकों को अपना निशाना बनाती हैं और लोगों को सामाजिक उत्थान और आर्थिक सहायता का प्रलोभन देकर उनका सामूहिक धर्म परिवर्तन करती हैं। 




अगर हम कट्टरता की बात करें तो मोटे तौर पर दो धार्मिक समूहों का नाम सबके ध्यान में आएगा... ईसाई धर्म जिसका प्रचार किताबों और दूसरों के प्रति दयालुता दिखाकर किया जाता है और इस्लाम जिसे ना मानने वालों को जेहाद झेलना पड़ता है। इन धर्मों ने संसार को दो हिस्सों में बाट दिया है। एक वो जिसमें वे खुद आते हैं और दूसरा वो जिसमें उनके धर्म को नहीं मानने वाले आते हैं। यहां मैं किसी धर्म की बुराई नहीं कर रही हूं क्योंकि सच यह है कि सभी धर्मों में ऐसे लोग मिल जाते हैं जो विश्वास और आस्था की आड़ में छिपकर धर्म का स्वरूप बिगाड़ रहे हैं, पर इन दोनों धर्मों के कट्टर अनुयायियों और शिक्षाओं के बारे में कई प्रामाणिक तथ्य मौजूद हैं। 

विडम्बना यह है कि सभ्य संसार ने इस्लामी जेहाद को तो बड़ी ही गंभीरता से स्वीकार किया है, लेकिन पुस्तकों के जरिये और लोगों की सहायता करते-करते ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार करने वाली मिशनरीज कई बड़े ऐतिहासिक कांड कर चुकने के बावजूद अपने जनसंपर्क कौशल के कारण अब तक लोगों की नज़रों में अच्छी बनी हुई हैं। अच्छाई की आड़ में धर्म परिवर्तन का खेल जारी है और हम सबकुछ अपनी आंखों के सामने होता देखकर भी इसे अनदेखा कर रहे हैं।  

सन् 1947 में जब भारत आजाद हुआ था, तब हमारे सामने विकल्प था कि हम पहले की तरह अपनी पारंपरिक धार्मिक भावनाओं के साथ आगे बढ़ें और आराम से रहें। पर ऐसा हो नही पाया - क्योंकि अंग्रेज चले गए थे, लेकिन हमारी धार्मिक शक्ति की प्रतिद्वंदी, ईसाई मिशनरीज शिक्षा देने के लिए यहीं रह गई थीं। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मिशनरीज के पास अपने पांव पसारने के पूर्ण अधिकार थे, और उन अधिकारों का इस्तेमाल मिशनरीज ने गरीब, कबायली और जनजातीय भारतीयों को बेवकूफ बना कर बखूबी किया। स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा इनका ध्यान लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने पर लगा रहा। ये हमेशा ही सबको बड़े ही विनम्र और मृदु शब्दों में एक ही बात समझाते रहे हैं- “भगवान आपसे प्यार करता है क्योंकि उसने अपने एकमात्र बेटे को आपके पापों के लिए मरने को भेजा जो कि ईसा मसीह है!” 

इनकी दयालुता की एक बानगी देखिए...  अगर आप गरीब हैं, किसी ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं, आपका बच्चा बीमार पड़ जाता है और आप उसे अस्पताल पहुंचाते हैं, लेकिन आपको पता चलता है कि इलाज में आने वाला खर्च आपकी हद से कहीं अधिक है। आप चिंतित हो जाते हैं और ऐसे में अचानक भगवान का रूप बनकर आया एक मिशनरी प्रतिनिधि आपसे कहता है कि आपके बच्चे का इलाज एकदम मुफ्त हो जाएगा, इसके लिए आपको केवल अपने बरसों पुराने धर्म और परंपरा को नमस्ते करके एक नए विदेशी धर्म को अपनाना होगा...। तो क्या आप ‘ना’ कहेंगे?

वास्तव में भारत के दूर-पास के लगभग सभी गांवों और कबीलो में इसी तरह के प्रलोभनों और हथकंडो का उपयोग करके सीधे-सादे लोगों को उनकी संस्कृति से दूर किया जा रहा है। नागालैंड और दक्षिण भारत में तो यह हाल है कि धर्म परिवर्तन के लिए लोगों को मनाना, घर-घर जाकर साबुन बेचने के काम को कहीं पीछे छोड़ चुका है। विदेश से आए 1000 करोड़ रुपए की सहायता से केरल का पेंटाकोस्टल मिशन आधे दशक में कई लाख लोगों के घरों के पारंपरिक देवता को बाहर का रास्ता दिखा चुका है।

धर्म परिवर्तन में पारंगत इन समुदायों का लक्ष्य भारत के छोटे, पिछड़े और दलित इलाके हैं, जहां ये लोगों को इलाज आदि का खर्चा उठाने और रोजमर्रा की जरुरतों की पूरा करने के लिए आर्थिक सहायता के ऐवज में आसानी से ईसाई बनने को मना लेते हैं। कई मिशनरीज तो बेराजगारी से जूझ रहे नवयुवकों को धर्म परिवर्तन के बदले नौकरी तक की पेशकश करती हैं और बाद में अगर कोई अपना धर्म वापस अपनाना चाहे तो उसे नौकरी जाने का खतरा दिखा कर डराया जाता हैं। 
ऐसी भी कई मिशनरीज हैं जिनके कार्यकर्ता भगवा कपड़े पहन कर लोगों के मध्य उठते बैठते हैं, ताकि वो हिंदु साधु जैसे लगें। ये लोग भोले और गरीब गांव वालों को यह समझाते हैं कि वास्तव में तुम्हारे पारंपरिक भगवान ईसा मसीह का ही बिगड़ा हुआ स्वरुप हैं, सदियों से भारत में जन्मे साधु और धर्मगुरु वास्तव में ईसाई थे और भगवान शिव के माथे पर तीन पट्टियों में लगा तिलक पवित्र त्रिदेव (Holy Trinity) का प्रतीक है। सबसे खतरनाक बात यह कि उपनिशदों में दी गई प्रार्थना “हमें अंधकार से प्रकाश का मार्ग दिखाएं” में वास्तव में ईसा मसीह से खुद को बचाने के लिए सहायता की अपील की गई है।

दक्षिण भारत के कई इलाकों में लोगों को यह भी समझाया जाता है कि उनकी गरीबी का मुख्य कारण उनके हिंदू देवता ही हैं, जो कि वास्तव में शैतान का स्वरुप हैं। गांव के समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति को अपने गांव के साथ ही आसपास के ग्रामीण इलाकों के निवासियों के धर्म परिवर्तन के लिए पैसा दिया जाता है। औरतों को कहा जाता है कि यह उन्हें तय करना है कि वो रोज़ की जरुरत के लिए पानी का इंतजाम करने के लिए एक मील का सफर तय करेंगी या चर्च के सामने खुदे अच्छे और नए कुंए से पानी भरना पसंद करेंगी…? लेकिन हां, ऐसा करने की कीमत धर्म परिवर्तन करके अदा करनी होगी।

पिछले कुछ समय से भारत के पूर्वी इलाकों में भी ईसाई मिशनरीज ने अपने पैर जमाना शुरू कर दिए हैं। पहाड़ों के गरीब और सीधे लोगों के लिए भी प्रलोभन वहीं हैं- आर्थिक सहायता, अच्छी शिक्षा और मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं। यह प्रचार भी किया जा रहा है कि प्रभु ईसा मसीह की शरण में आने मात्र से ही उनकी बीमारियां ठीक हो जाएंगी। कई लोग तो मनोवैज्ञानिक रूप से इस बात से सहमत भी हो जाते हैं।

उत्तरांचल स्थित नानकमत्ता के ग्राम फिरौजा के दलवीर सिंह की बेटी के गुर्दे में पथरी थी। वह कई वर्षों से पीड़ित थी। अनेकों जगह दिखाया, इलाज करवाया, लेकिन सुधार नहीं हुआ। दलवीर के पास ऑपरेशन के लिए पैसा नहीं था। दलवीर कहते हैं कि मिशनरी के लोग आए, उन्होंने इलाज का भरोसा दिलाया, हम प्रार्थना सभा में गए, मेरी बेटी निर्मल कौर ने “पवित्र जल” नियमित रूप से ग्रहण करना शुरू किया और कुछ दिनों में ही उसकी हालत में सुधार होने लगा। वह बिल्कुल स्वस्थ हो गई।

दलवीर सिंह इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मिशनरी को प्रार्थना सभा हेतु एक बीघा जमीन दे दी। जिस पर गांव व बिरादरी के लोगों ने बवाल भी किया था, लेकिन अब कुछ लोग नियमित रूप से प्रार्थना सभा में आते हैं। सत्संग करते हैं। पवित्र जल ग्रहण कराते व करते हैं। वहीं नानकमत्ता तहसील के पसैनी गांव निवासी हरदेव सिंह, मिशनरी के लोगों पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि यह लोग गरीब, बीमारी से तंग दलित समुदाय अथवा समाज के दबे कुचले उपेक्षित परिवारों से संपर्क स्थापित करते हैं तथा उन्हें लालच दिखाकर उनका धर्म परिवर्तन करते हैं। 

जनपद उत्तरकाशी के विकासखण्ड, मोरी में बगाण पट्टी स्थित आराकोट के ग्राम थुनारा निवासी भजन दास बताते हैं कि 2 वर्ष पहले तक उनका 5 साल का बेटा राहुल बहुत बीमार रहता था। लेकिन जब से उन्होंने हर रविवार आराकोट में आयोजित होने वाली प्रार्थना सभा में भाग लेना शुरू किया, बेटे की सारी बीमारी दूर हो गई। उत्तराखंड के विभिन्न कस्बों में अपनी पैठ बनाने के लिए मिशनरीज अपने चिकित्सालय खोल रही हैं और मुफ्त इलाज की बात कहकर स्थानीय लोगों को प्रभावित कर रही हैं।

चमोली जिले के गंगोल गांव में अमला ईसाई मिशनरी ने जमीन खरीदकर उस पर एक चर्च और अस्पताल खोल रखा है। ये जनपद के कई इलाकों में यहीं से मिशन के प्रचार-प्रसार का काम करते हैं। टिहरी गढ़वाल के चंबा और घनसाली कस्बों में खुले चिकित्सालयों में काम कर रहे मिशनरी के प्रतिनिधियों से आसपास के लोग आसानी से प्रभावित हो जाते हैं।

जनपद रुद्रप्रयाग के ग्राम बड़ेथ में एक ईसाई मिशनरी सक्रिय रूप से कार्यरत है। इसका संचालन ग्राम बड़ेथ के ही बचन सिंह भण्डारी द्वारा किया जा रहा है। इस संस्था का नाम अगापे चिल्ड्रन एकेडमी है। भण्डारी ईसाई मिशनरी की तरफ से उत्तराखंड के डायरेक्टर भी हैं। वर्तमान में इनकी संस्था के माध्यम से प्रत्येक रविवार को गोष्ठी आयोजित की जाती है तथा ईसाई धर्म की शिक्षा-दीक्षा दी जाती है।

हाल में प्रकाशित खबरों के अनुसार केदारनाथ में हुई तबाही के बाद वहां भी मिशनरी पहुंच चुकी है और प्रकृति की मार झेल कर गरीब और बेघर हुए परिवारों को ईसाईयत की राह दिखाने का काम ज़ोरों पर हैं। लोगों को हर तरह की मुफ्त सहायता का लालच देकर उन्हें बड़े पैमाने पर ईसाई बनने के लिए राज़ी किया जा रहा है। छत्तीसगढ और उड़ीसा के माओवादी प्रभावित इलाके हों या बिहार के नक्सलीग्रस्त ग्रामक्षेत्र, या फिर बाढ़, तूफान या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा से घिरे लोग... मिशनरी की नज़र हमेशा सही समय, सही परिस्थिति और सही लोगों तक पहुंच जाती हैं और वे अपने धर्म का प्रचार और उसमें लोगों को जोड़ने का सुअवसर भुनाने के लिए उन तक अवश्य पहुंचते हैं। आप चाहे तो कोई भी अखबार उठा कर देख सकते हैं, जहां ना पहुंचे सरकारी सहायता.., वहां भी पहुंच रही है मिशनरी मदद... और हैरानी की बात यह है कि जहां यह पहुंचते हैं, कुछ ही समय बाद उस इलाके में चर्च स्थापित हो जाते हैं और ईसाईयों की संख्या बढ़ जाती है। 




निधि रावत
ऑस्ट्रेलिया संवाददाता

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