Wednesday, 30 April 2014

ताबूत नहीं होने के कारण स्वदेश नहीं लौट पाया भारतीय कामगार का शव, ढाई सालों से जुबैल के मुर्दाघर में पड़ी है लाश



वर्ष 2011 में सऊदी अरब के शहर जुबैल में मृत पाये गए एक भारतीय प्रवासी का शव अस्पताल और भारतीय दूतावास की रस्साकशी का शिकार होकर अभी भी जुबैल के एक मुर्दाघर में पड़ा हुआ है। अस्पताल उसके शव को वापस उसके घर भारत भेजने के लिए भारतीय दूतावास से ताबूत की मांग कर रहा है जबकि दूतावास का मत है कि मौत के स्पष्ट कारणों का पता चले बिना उस व्यक्ति के शव को उसके परिवार को नही सौंपा जा सकता है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार अज्ञात कातिलों ने उस व्यक्ति की हत्या की है।

इस बारे में भारतीय दूतावास का कहना है की पुलिस रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद ही उस व्यक्ति के शव को उसके घर भारत भेजने की कार्यवाही आरम्भ कर दी गई थी, लेकिन इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अस्पताल द्वारा व्यक्ति के शव के लिए ताबूत की अनुपलब्धता के कारण देरी हुई।

स्वास्थ्य मंत्रालय को ताबूत की आपूर्ति करने वाले व्यक्ति का तीन साल का अनुबंध था जो कि समाप्त हो गया और अभी अप्रैल 2014 के दूसरे हफ्ते में उस अनुबंध का नवीकरण किया गया है। पूर्वी प्रांत के स्वास्थ्य मंत्रालय को प्रति सप्ताह 25 ताबूत उपलब्ध करने के निर्देश दिए गए हैं। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार एक बार ताबूत मिल जाए तब उस व्यक्ति के शरीर को वापस भारत भेजने की प्रक्रिया प्रारंभ की जाएगी।

हम आपको बता दें कि यह तो केवल दो मामले हैं लेकिन ऐसे हज़ारों मामले हैं जबकि किसी ना किसी वजह से भारतीय मजदूरों के शव अरब देशों में ही लावारिस पड़े हुए हैं और जिन्हें पूछने वाला कोई नहीं।

निधि रावत

मजाहरुद्दीन की दर्दभरी कहानी – उसके शव को उसके परिवार ने लेना मंजूर नहीं किया और ना ही किसी और को उसे दफनाने के लिए मंजूरी दी... 6 सालों से दफनाए जाने का इंतज़ार कर रही है मजाहरुद्दीन की लाश



कई मामलों में अस्पतालों और दूतावास को भी समझ नहीं आता की वे क्या करें। वर्ष 2008 में इसी तरह का एक मामला हुआ था। सऊदी अरब की राजधानी रियाद के अल-मौवसत अस्पताल में 27 नवंबर 2008 को शेख मज़ाहरुद्दीन का 58 वर्ष की आयु में देहांत हो गया। उनका परिवार पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीवान जिले में रहता है। उनकी मौत के बाद भारतीय दूतावास ने जब भारत में उनके परिवार से सम्पर्क साधा तो उनके परिवार ने उनके शव को लेने से इनकार कर दिया और साथ ही रियाद में उनके शव को दफनाए जाने की अनुमति पर भी दस्तखत करने से भी मना कर दिया। लम्बे समय तक मज़ाहरुद्दीन का शव अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा हुआ रहा। न तो दूतावास उसके शव का दावा प्रस्तुत करने के लिए उसके परिवार को मना पाया न ही पारिवारिक अनुमति के अभाव में उसे दफ़न कर पाया।

मज़ाहरुद्दीन की पत्नी अस्मा खातून ने यह कहते हुए किसी भी कागज़ पर दस्तखत करने से इनकार कर दिया के जीते जी मज़ाहरुद्दीन ने अपने परिवार को कभी सहायता नहीं की तो क्यों मरने के बाद हम उनके शव को लें। मज़ाहरुद्दीन के बच्चों ने भी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई जो कि अब बड़े हो चुके हैं और अपने पिता के शव को भारत लाने का खर्च उठा सकते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या मज़ाहरुद्दीन ने वाकई अपने परिवार को पूछा नहीं था और जो उसकी बीवी कह रही है वो सच है या कोई और वजह थी जिसके चलते मजाहरुद्दीन अपने परिवार की खोज-खबर नहीं रख पाया... जी हां इसके पीछे भी दर्द भरी कहानी है- दरअसल 1994 में मज़ाहरुद्दीन कई सारे भारतीयों की तरह ही एक स्पांसर की सहायता से काम के तलाश में रियाद आया था। लेकिन यहां आने के बाद वो अपने मालिक के जाल में फँस गया, जिसने उसे परिवार से मिलने के लिए वापस जाने का अवसर ही नहीं दिया और ना वहां से उनकी खोज खबर लेने दी। यहां तक की परिवार को भेजने के लिए पैसे भी उसको नहीं मिल पाते थे। इस बात को लेकर मज़ाहरुद्दीन ने अपने मालिक के ऊपर मामला भी दर्ज कराया था। जिसका फैसला वर्ष 2002 में हुआ। मज़ाहरुद्दीन को उसके बकाया वेतन के तौर पर हज़ारों रियाल अदा किये गए और उसके वापस अपने देश भारत जाने में सहायता करने के लिए भारतीय दूतावास ने उसे नया पासपोर्ट भी उपलब्ध कराया। लेकिन अब तक मज़ाहरुद्दीन इतना निराश हो चुका था कि उसने भारत न जाकर रियाद में ही रुक कर नई जगह काम करने का फैसला लिया। इस दौरान उसने अपने परिवार से किसी भी प्रकार का सम्पर्क नहीं किया और इसी का खामियाजा वो 6 साल से अस्पताल के मुर्दाघर में दफनाए जाने का इंतज़ार करके भुगत रहा है।

बहरहाल भारतीय दूतावास ने लम्बे समय तक मज़ाहरुद्दीन के परिवार को उसको दफ़नाए जाने के अनुमति पत्र पर दस्तखत करने के लिए मनाया, लेकिन उन्हें अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। और अब दूतावास विशेष अधिकार के तहत मजाहरुद्दीन का शव रियाद स्थित भारतीय समाज सेवकों को सौंपने का मन बना रहा है जो उसका क्रिया कर्म वहीं कर देंगे।\

निधि रावत

हिंद प्रहरी संवाददाता द्वारा दूतावास व विदेश मंत्रालय में फोन लगाने पर जवाब मिला कि अधिकारियों को इन मामलों की जानकारी नहीं... एक दूसरे पर जानकारी देने का काम टालते रहे जिम्मेदार अधिकारी



इस जानकारी के आधार पर हमने अबू धाबी स्थित भारतीय दूतावास से बात करने का प्रयास किया तो भारतीय राजदूत के कार्यालय में जवाब मिला कि “इस तरह की कोई भी जानकारी उनके पास नही है, और अगर ऐसी कोई जानकारी हमारे पास है तो उनको भेज दें”।

जब दिल्ली स्थित हमारी संवाददाता सारिका सिंह ने भारतीय विदेश मंत्रालय से इस संबंध में जानकारी प्राप्त के लिए संपर्क किया तो संपर्क तंत्र का जाल ही बन गया। आरंभ में फोन करने पर सारिका को बताया गया कि आपको इस बारे में सही जानकारी चाहिए तो प्रोटेक्टर जनरल ऑफ़ एमिग्रेंट्स आर बोहरिल को फोन करें और उनका नम्बर दे दिया गया।
 श्रीमान बोहरिल को फोन करने पर उन्होंने इस विषय को बेहद गंभीर विषय बताया और साथ ही यह कह दिया कि इस विषय से हमारा कोई सरोकार नहीं है यह तो प्रवासी भारतीयों के लिए काम करने वाले दूतावासों का विषय है, और अगर हम और जानकारी प्राप्त करने के इच्छुक हैं तो प्रेस इनफार्मेशन ऑफ़ ब्यूरों के उप-निदेशक सुशांत महापात्रा से बात करें और उनका दूरभाष दे दिया। महापात्रा जी को कई मर्तबा फोन करने पर एक ही जवाब प्राप्त हुआ कि साहब बैठे नही हैं। 
परेशान होकर सारिका ने वापस बोहरिल जी को फोन किया तो इस बार उन्होनें विदेश मंत्री के उप-सचिव एमसी पांडे जी का दूरभाष दे दिया। पांडे जी को फोन करने पर उन्होने इस विषय पर बेहद दुख और पीड़ा दर्शाते हुए बताया कि हम इस मामले पर काम नहीं कर रहे हैं, अरब देशों में स्थित भारतीय दूतावासों द्वारा प्रवासी भारतीयों की भारत वापसी सुनिश्चित करने के लिए मिशन चलाया जा रहा है, वो ही ये सब बता पायेंगे, हम कुछ बता पाने की स्थिति में नही हैं, लेकिन क्षितिज मोहन इस बारे में आपको जानकारी दे सकते हैं तो उनका नम्बर ले लीजिए और जब सारिका ने बड़ी उम्मीदों के साथ क्षितिज जी को फोन लगाया तो शायद वो भी बैठना भूल गए थे। 
खैर सारिका ने सोचा शायद बोहरिल जी ही एक बार फिर कोई नया नम्बर दे पाएं तो वापस उन्हे फोन किया। इस बार उनके पीए ने फोन उठाया, सारिका की पूरी व्यथा सुनने के बाद उसने खेद जताया। सारिका ने कहा कि ये मसला आपके विभाग का है और जब मैं एक पत्रकार होकर कोई जानकारी नही जुटा पा रही हूं तो परेशान परिवारों को इतने फोन नम्बर भी नही पता, उनका क्या हाल होगा। शायद इस बात से पीए साहब नाखुश हुए और फौरन जवाब दिया कि “मैडम अगर हम सवाल जवाब करेंगे तो काम कौन करेगा”, इसके बाद फोन रख दिया गया। और हमने मान लिया कि वाकई में कोई जवाब नहीं है... न तो पीड़ित परिवारों को देने के लिए, न ही हमारी अफसरशाही का।

अब एक महत्वपूर्ण सवाल जब एक पत्रकार होते हुए भी हमारे संवाददाता को सही जानकारी नहीं मिली तो आप सोच सकते हैं कि आम आदमी का क्या हाल होगा जिसके पास सही नबंर और किससे सम्पर्क करना है, इसकी जानकारी तक नहीं होती
निधि रावत

कोई नहीं नामलेवा.. हज़ारों भारतीय प्रवासी मजदूरों को मौत के बाद कब्र की जगह मिलीं गैर देश के मुर्दाघरों की ठंडी दराजें...



सऊदी अरब के विभिन्न शहरों के मुर्दाघरों में साढ़े तीन हज़ार से ज्यादा प्रवासी मजदूरों के शव लावारिस पड़े हैं। इनमें से कई नेपाली हैं, कई पाकिस्तानी, कई बांग्लादेशी, कई श्रीलंकाई और हज़ारों भारतीय हैं। संबधित दूतावासों की उदासीनता, मालिकों की बेपरवाही और कुछ मामलों में परिजनों की अनदेखी के चलते इन कामगारों के शव ना स्वदेश लौट पा रहे हैं और ना वहां इनकी अंतिम क्रिया हो पा रही है। कई शव तो सालों से शवगृहों में पड़े हैं..

मजदूरों को काम के लिए बुलाने वाले मालिक उनके शवों की वतन वापसी के लिए पैसा खर्चने को तैयार नहीं... दूतावास के अधिकारियों ने भी जिम्मेदारी से हाथ खींचे

सऊदी अरब के गैजेट में अंकित है कि उनके देश के विभिन्न मुर्दाघरों में पिछले साल कुल 5,555 प्रवासी मजदूरों और कामगारों के शव प्राप्त किए गए। जिसमें से 1,791 शवों को या तो उनके परिवारों के पास उनके देश भेज दिया गया है या दफना दिया गया है। पर अभी भी 3,764 शव विभिन्न मुर्दाघरों में अपने देश वापसी का इंतजार कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर शव ऐसे मजदूरों के हैं जिन्हें काम करने के लिए भारत, नेपाल, बांगलादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों से किसी कंपनी द्वारा स्पांसर करके लाया गया था। गैजेट में दी गई जानकारी के अनुसार रियाद के फारेंसिक विभाग में मृतक मामलों के मुखिया अल बवाजीर ने इन मृतकों को उनके देश वापस भेजने में होने वाली देरी या नाकामी के लिए इन मजदूरों के स्पांसर मालिकों को जिम्मेदार बताया है। 

उन्होंने कहा है कि स्पांसर कंपनियां और मालिक, मृतक मजदूरों को वापस उसके देश भेजने के लिए कार्रवाई करने में सरकारी अधिकारियों का सहयोग नहीं कर रहे हैं। जिसके कारण अंदेशा लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में यह संख्या कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जाएगी। हम आपको बता दें कि मृतक शरीर को उसके देश भेजने के लिए ताबूत और हवाई जहाज का खर्च मजदूरों को काम पर रखने वाली कंपनी या मालिक को वहन करना होता है जिसके नहीं किये जाने के कारण बहुत से शव वतन नहीं लौट पाए हैं।

मालिकों के चंगुल में मजदूरों की जिंदगी और मौत.. मजदूरों की मौत के बाद कागज़ी कार्यवाही पूरी नहीं करने के कारण स्वदेश नहीं पहुंच पाते मजदूरों के शव 

अरब के बड़े और विकसित शहरो में काम करने वालों प्रवासियों के चारों ओर उन्हें स्पांसर करने वाले मालिक काफ़ला का सहारा लेकर एक जेल का ढांचा सा बना देते हैं जिसमें वो खुद को जकड़ा महसूस करते हैं। यह मालिक तय करता है कि उसके द्वारा लाए गए  मजदूर कहां काम करेंगे, कब तक काम करेंगे और कितने पैसे पर काम करेंगे। भारत, नेपाल, बांगलादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे अविकसित या अल्पविकसित देशों में सरकारी नीतियों ने भले ही महंगाई को सर पर उठा लिया है पर रोजगार जैसे संवेदनशील और सबसे जरुरी मुद्दे को स्थिर ज़मीन तक नसीब नहीं हो पा रही है। ऐसे में घर की जिम्मेदारियों और रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए ये कामगार, अरब देशों में बंधुआ मजदूर की तरह काम करने को आसानी से तैयार हो जाते हैं और जो तैयार नहीं होते वो भी कर कुछ नहीं सकते क्योंकि एक बार अच्छी कमाई और विदेश में काम करने का लालच लेकर जब वो अरब देश पहुंच जाते हैं तो उन्हें खबर लगती है कि उन्होनें अपने परिवार के लिए खुशियों का नही बल्कि खुद का सौदा कर लिया है। 

गुलामी के आधुनिक परिवेश के फंसे इन मजदूरों की जिंदगी तो उनके मालिक के आधीन हो ही जाती है, मरने के बाद भी उनकी मिट्टी उनके मालिक पर आश्रित रहती है। नियम के अनुसार अगर किसी मजदूर की किसी भी कारण मृत्यु हो जाती है तो उसके शरीर को उसके परिवार के पास वापस उसके वतन भेजने के लिए आने वाले खर्च सहित सारी काग़जी कार्रवाई को पूरा करके संबंधित दूतावास में जमा कराने की जिम्मेदारी उस मजदूर के मालिक की होती है। जिससे कि अधिकतर मालिक अपना पल्ला मजदूर की मौत के साथ ही झाड़ लेते हैं। मालिकों की इसी बेरुखी का शिकार कई परिवार अपने प्रियजनों के शरीर को प्राप्त करने के लिए लम्बे समय से इंतजार कर रहे हैं। परिणामस्वरुप विभिन्न अस्पतालों के मुर्दाघरों में मौजूद लावारिस शरीरों की गिनती बढ़ती जा रही है।

और भी हैं मुश्किलें..
 मालिकों की बेरुखी के साथ ही कुछ अन्य कारण भी हैं जिसके चलते ये शव अपने देश वापस नही जा पा रहे हैं जैसे कि लम्बे समय तक मालिक के पास पासपोर्ट रहने के कारण कई लोगों का समय से पासपोर्ट रिन्यू नहीं हो पाया है और अब इस प्रक्रिया में दुनियाभर की मुसीबतें आ रही हैं, या किसी मामले में संबंधित देश का दूतावास ही कोई दिल्चस्पी नही ले रहा है, परिवार के लोगों की सही प्रक्रिया की जानकारी नही है, तो कई मामलों में परिवार के लोग अपने संबंधी के मृत शरीर को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। 

संबंधित दूतावास के अधिकारियों की बेपरवाही भी है एक कारण 
आम तौर पर अरब देश में किसी प्रवासी भारतीय की मृत्यू होने पर ये दूतावास की जिम्मेदारी होती है कि वो सारी काग़जी कार्रवाई करने के लिए मजदूर के मालिक को निर्देश दे या किसी स्पांसर मालिक के न होने की स्थिति में इस प्रक्रिया को पूरा करने में मृतक के परिवार की सहायता करे। लेकिन ज्यादातर मामलों में दूतावास यह काम नहीं करना चाहता। उनका मानना है कि अगर सारी काग़जी कार्रवाई पूरी करके उन्हे समय से दे दी जाए तो वो मृतक के शरीर को उसके परिवार के सदस्य के साथ भारत रवाना कर देंगे नहीं तो वो इस मामले में कुछ नही कर सकते। दूतावास में दरकार जिस काग़जी कार्रवाई की मैं बात कर रही हूं उसकी सूची देख कर तो जिंदा इंसान के पसीने छूट जाएं तो बेचारा मृतक कहां से इस काग़जों का इंतजाम करे, लिहाजा परेशान परिवार सउदी अरब या अमीरात स्थित अस्पताल जहां कि मृतक का शरीर जमा है, भारतीय दूतावास और भारत स्थित विदेश मंत्रालय के बीच गेंद के समान इधर उधर चक्कर ही लगाता रहता है। कई मामलो में गरीब परिवार मृतक के शरीर को वापस भारत लाने का खर्च वहन नहीं कर सकते, और उनका इंतजार बढ़ता जाता है।

अरब देशों का कानून है कि अगर मरने वाला मुस्लिम होता है, तो वो उसके परिवार से स्वीकृति लेकर उसे अरब देश में ही दफ़ना देते हैं। लेकिन अगर मरने वाला किसी और धर्म का होता है, तो उसके शरीर को उसके देश वापिस भेजना आवश्यक है, फिर चाहे इस कार्रवाई में सालों का वक्त गुजर जाए। और अगर किसी वजह से ऐसे शव को वापस नहीं भेजा जा सकता तो अधिकारी उसे संबंधित दूतावास या फिर किसी समाज सेवी संस्था को सौंप देते हैं जो मृत व्यक्ति के धार्मिक रीति रिवाज़ों द्वारा उसके शव की अंतिम क्रिया करते हैं। 


काम के दौरान हादसों में हो रही मृत्यु के साथ ही प्रवासी मजदूरों द्वारा अकेलेपन के कारण आत्महत्या के मामले भी बढ़ रहे हैं- 

क़तर, सउदी अरब, संयुक्त राष्ट्र अमीरात जैसे देशों में काम के दौरान हादसों, सांस की बीमारी या किसी अन्य प्राकृतिक या अप्राकृतिक घटना में रोज ही किसी न किसी प्रवासी भारतीय की जान जाती ही रहती है। लेकिन एक खतरनाक बीमारी जिसने हाल के समय कई जाने ली हैं वो है अकेलेपन की बीमारी, लम्बे समय तक परिवार से दूर रहने की बीमारी, जिसके चलते कई लोगों ने खुदकुशी जैसा कदम तक उठाया है। एक बार अरब की धरती पर पहुंच कर मालिक जब पासपोर्ट जब्त कर लेता है तो सालों तक परिवार से मिलने का मौका नहीं आता और कई मामलो में तो जीवनभर।


भारतीय दूतावास के अधिकारियों को अपने देश के मजदूरों के शवों की चिन्ता नहीं, कोई सहयोग नहीं देते अधिकारी

कुछ समय पहले ब्रिटेन के द गार्डियन अखबार में खबर छपी थी कि संयुक्त राष्ट्र अमीरात के कई शहरों के अस्पतालों में लावारिस भारतीय शवों की गिनती बढ़ती जा रही है, और कई शव तो अस्पताल के मुर्दाघर में दो वर्षों के लम्बे समय से मौजूद हैं। इसी सिलसिले में अबू दाबी स्वास्थ्य प्राधिकरण में प्रबंधक डा ज़माल अल मुतावा का कहना है कि “यह सच है और ऐसे कई शव आबू धाबी स्थित शेख खलीफा अस्पताल के मुर्दाघर में मौजूद हैं। हम उनके संबंधित दूतावासों को पत्र लिखते हैं पर कोई सहयोग प्राप्त नही होता, जिसके कारण अस्पताल के मुर्दाघर को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है”। 
उदाहरण के तौर पर भारतीय मूल के कुमार विहारा की मृत्यु अस्पताल के रिकार्ड में 9 जून 2012 अंकित है और अभी तक अस्पताल प्रबंधन उनके शरीर को उनके परिजनों को सौंपे जाने के संबंध में उचित कार्रवाई का इंतजार कर रहा है। अस्पताल के अधिकारी इस संबंध में कई मर्तबा भारतीय दूतावास में गुहार लगा  चुके हैं पर कोई सकारात्मक पहल देखने को नही मिली है। मुतावा बताते हैं कि “अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में शव को तब तक मुर्दाघर में रखा जाता है जब तक स्थानीय पुलिस से अनुमति प्राप्त न हो जाए। एक बार पुलिस द्वारा मामले को क्लीन चिट देने के बाद उस शव को उसके परिवार को सौंपे जाने या उसके मूल देश भेजे जाने या यहीं उसके दाहसंस्कार की कार्रवाई करने की शुरूआत की जाती है। लेकिन समस्या उस समय आती है जब या तो मृतक की पहचान नहीं हो पाती या उसके परिवार वाले न तो उसके शव के लिए दावा प्रस्तुत करते हैं न ही उसके संस्कार की अनुमति देते हैं।”

निधि रावत

बंधन नहीं, सोच से बंधता है इंसान


एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया। उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!!
यह स्पष्ट था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे।
उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं ?
तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें। बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते और बड़े होने पर भी उनका यह यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”
आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!
इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण यह मान बैठते हैं कि अब हमसे यह काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं।
याद रखिये असफलता जीवन का एक हिस्सा है, और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है। यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए….. आप हाथी नहीं इंसान हैं।

“जिस आदमी की सही सोच और सही नजरिया है, उसे लक्ष्य तक पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता”।

‘पैरेन्ट्स को चाहिए सभी बच्चों को एन्ड्रॉयड फोन दिलाएं’, ‘नेताओं को सबसे पहले डिस्पिलिन सीखना चाहिए और कुछ मैनर्स भी’, ‘एप्पल वूमन पार्टी’ महिलाओं के हित के लिए काम करेगी'.... कॉन्वेन्ट स्कूल में पढ़ने वाली नौंवी कक्षा की छात्रा का साक्षात्कार…

नविका अग्रवाल, लखनऊ के कॉन्वेन्ट स्कूल में नौंवी कक्षा की छात्रा


जिस तरह बच्चों की अलग दुनिया होती है, उसी तरह किशोरों की भी अलग दुनिया होती है। किशोर यानि टीनएजर्स- 13 से 19 साल के बच्चे। यह ना बच्चे होते हैं और ना बड़े। इनका बचपना पूरी तरह से जाता नहीं और समझदारी धीरे-धीरे आ रही होती है। यह सपनों की उम्र है, खुद से प्यार करने की उम्र है और दुनिया को एक नए नज़रिए से देखने की उम्र है। इसलिए अब से आपको हर महीने में एक बार किशोर-वाणी नाम का यह कॉलम पढ़ने को मिलेगा जिसमें हमने किशोरों की चिंताओं, उनकी परेशानियों, खुशियों और संदेशों के बारे में जानने की कोशिश की है। आपको इनके जवाब हंसा भी सकते हैं और हैरान भी कर सकते हैं और शायद कुछ मामलों में इनकी सरल सोच आपको सोचने पर मजबूर कर दे। इस श्रृंखला में सबसे पहले हम आपके लिए लाए हैं लखनऊ निवासी छात्रा नविका अग्रवाल का साक्षात्कार। जिन्होंने कुछ खास मुद्दों पर बेबाकी से अपने विचार रखे हैं, तो इन्हें पढ़िए और मुस्कुराने के साथ ही सोचने के लिए भी तैयार हो जाईए।

आपकी जिंदगी की सबसे बड़ी परेशानी क्या है?

देखिए मेरी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि फिलहाल मेरा दोस्त स्कूल में हाउस कैप्टन बन गया है। पहले एक दूसरी लड़की हाउस कैप्टन बन रही थी जिससे मेरी लड़ाई हो चुकी थी तब भी मुझे खराब लग रहा था लेकिन अब जब मेरा दोस्त कैप्टन बन गया है तब बहुत ज्यादा खराब लग रहा है। अब मुझे समझ में आ गया है कि दोस्त फेल हो जाए तो दुख होता है लेकिन दोस्त आपसे आगे निकल जाए तो बहुत ज्यादा दुख होता है। दोस्ती में दरार आ जाती है ऐसा कभी नहीं होना चाहिए।


आजकल की पढ़ाई के बारे में आपका क्या कहना है?

पढ़ाई इतनी ज्यादा बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। टीचर्स को समझना चाहिए कि हम बच्चे हैं, कम्पयूटर नहीं, जो इतना सारा कुछ पढ़ने के लिए लगा रखा है। ना हमें खेलने को समय मिलता है ना एक दूसरे से मिलने जुलने का, जबकि सोशल होना कितना ज़रूरी है, खेलना भी हैल्थ के लिए कितना ज़रूरी है। यह बातें टीचर्स खुद ही पढ़ाते हैं लेकिन उन्हें लागू करने के लिए हमें टाइम ही नहीं देते। पूरे समय बस पढ़ाई, पढ़ाई और पढ़ाई..।


आपके हिसाब से टीचर्स को पढ़ाई को और रोचक बनाने के लिए क्या करना चाहिए?

उन्हें हर हफ्ते एक पीरियड बातों के लिए देना चाहिए कि उस पीरियड में बच्चे खूब बातें करें। जी भर के बातें करें। इससे उनका मन पढ़ाई में खूब लगेगा और वो बार बार हर पीरियड में बात करने का मौका भी नहीं ढूंढेंगे। और दूसरे हर टीचर को स्टूडेन्ट्स को बता देना चाहिए कि बच्चे उन्हें और किस नाम से पुकार सकते हैं। वो केवल एक नाम होना चाहिए...


एक नाम मतलब?

 अब देखो बच्चे टीचर को उनके नाम से तो बुलाते नहीं हैं, उनका नया नामकरण ज़रूर करते हैं। यह तो आपको मालूम ही होगा। जैसे हमारे यहां एक टीचर हैं, रजनी मैम, अब कुछ बच्चे उन्हें रज्जो कहते हैं, कुछ रजनीकांत कहते हैं, कुछ रजनीगंगनम कहते हैं... अब अलग अलग नाम हैं तो अक्सर बच्चों में लड़ाई हो जाती है कि मेरे नाम से बोलो, मेरा नाम ज्यादा अच्छा है वगैरह, वगैरह..। अब अगर टीचर यह रूल लागू कर देगी कि उन्हें एक ही नाम से बुलाया जा सकता है तो बच्चे कन्फ्यूज नहीं होंगे और ना लड़ेंगे। है कि नहीं।


(पॉइन्ट) और क्या करना चाहिए?

और टीचर को बच्चों के लिए पॉपकॉर्न लाने चाहिए। क्योंकि जब हम लड़ते हैं और अचानक टीचर आ जाती है तो हम कहते हैं, चुप कर के बैठो अब शो शुरू होने वाला है... और उस वक्त हम चुप होकर सीधे तो बैठ जाते हैं पर हमारे पास खाने के लिए पॉपकॉर्न तो होते नहीं। अब अगर टीचर हमें पॉपकॉर्न देगी तो हम कितने ध्यान से पढ़ाई करेंगे। मूंह में पॉपकॉर्न होंगे तो कोई बात भी नहीं करेगा। और बिल्कुल जैसे मूवी देखते हैं, शांति से, ध्यान लगाकर हम टीचर की बात सुनेंगे। (इतनी महत्वपूर्ण बात तो हम सोचते ही नहीं हैं..)


आप मम्मी-पापा से क्या उम्मीद रखती हैं? क्या आपको लगता है कि उनको भी और अच्छा होना चाहिए। उनमें भी बदलाव ज़रूरी हैं?

हां बिल्कुल होना चाहिए। अच्छे होने के लिए सबसे पहले तो मम्मी-पापा को मुझे एक एन्ड्रॉयड फोन दिलाना चाहिए, क्योंकि मेरे सारे दोस्तों के पास एन्ड्रॉयड फोन है, बस मेरे पास नहीं है। तो समानता की भावना नहीं आती।  और मम्मी पापा को हमें हर फिल्म दिखानी चाहिए ताकि हमारे फ्रेन्ड्स जब फिल्मों के बारे में बातें करें तो हम भी अपनी राय रख सकें, उनसे अलग ना महसूस करें। जो फिल्में देखें सारे बच्चे देखें जिससे कि सभी उसके बारे में बातें कर सकें।


अच्छा मुझे यह बताईए कि आपको अपने देश में क्या खराब लगता है? आप देश में क्या बदलाव लाना चाहती हैं? अगर आपको पावर मिले तो क्या बदलेंगी?

हमारे देश में तो सबसे ज्यादा गंदगी की परेशानी है। देश में हर जगह इतनी ज्यादा गंदगी है कि पूछिए मत। मुझे अगर पावर मिली तो मैं देश में गंदगी फैलाने वालों को जेल में डाल दूंगी। कैसे लोग है, इतने बड़े होते हैं, पर सफाई नहीं रख सकते, कहीं भी कूड़ा फेंक देते हैं। उनसे ज्यादा सफाई तो हम स्कूल के स्टूडेन्ट्स रखते हैं। हम अपना स्कूल साफ रखते हैं और बड़े लोग सड़के, गलियां और देश साफ नहीं रख सकते। इसके अलावा मैं सारे पैरेन्ट्स को बोलूंगी कि अपने बच्चों को पूरी फ्रीडम दें। हर बच्चे को जो वो करना चाहता है करने दिया जाए, उन पर जबरदस्ती के नियम मत थोपिए, उससे हमें बड़ी परेशानी होती है। जैसे आपको हमें रोज कम से कम एक घंटे तक फेसबुक करने की इजाज़त देनी चाहिए। और भी अगर हम कहीं जाना चाहते हैं, या कुछ करना चाहते हैं, किसी से मिलना चाहते हैं तो मिलने देना चाहिए। क्योंकि अगर आप हमें नहीं करने देंगे तो वो काम हम छुप छुप के करेंगे तब भी आपको परेशानी होगी। आप लोगों को हमारी बातें सुननी चाहिए, हमसे बातें करनी चाहिए। एक तरफ तो कहते हैं कि हम देश का भविष्य हैं और दूसरी तरफ आप हमें बिल्कुल निगलेक्ट कर देते हैं, बस बच्चा समझते रहते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए।


अच्छा क्या आप राजनीति के बारे में जानती हैं, उसमें दिलचस्पी लेती हैं?

पापा पूरे समय न्यूज़ सुनते रहते हैं। टीवी पर कभी एक नेता किसी के बारे में कुछ बोलता है तो कभी कोई दूसरा किसी के बारे में कुछ बोलता है। बुराई सुन सुन के कान पक गए। कितना टाइम है इनके पास, हमेशा एक दूसरे के बारे में ही बातें करते रहते हैं, ढूंढ कर एक दूसरे की बुराई निकालते रहते हैं। इसलिए मुझे नेता अच्छे नहीं लगते। अरे भई अपने बारे में सोचो, अपने बारे में बात करों, दूसरों के बारे में बात करोगे तो बेकार में वो अपने आपको इम्पोर्टेन्ट समझने लगेंगे। नेताओं को इतनी छोटी सी बात समझ में नहीं आती। यह तो हमसे सीखना चाहिए। हम सिर्फ अपने फैशन, अपने स्टायल, अपनी पढ़ाई, अपनी अच्छाई की बातें करते हैं, किसी और के बारे में सोचने का टाइम किसके पास है। वैसे मुझे यह भी लगता है कि हमें तो एक क्लास पास करनी है, उसमें इतनी पढ़ाई होती है कि अपने लिए समय नहीं मिलता और नेताओं को तो राज्य संभालना होता है, देश संभालना होता है, फिर भी उन्हें फालतू की बातें करने का टाइम मिल जाता है...। उन्हें सबसे पहले तो डिस्पिलिन सिखाना चाहिए और कुछ मैनर्स भी। 


अगर आपको राजनीति में लाया जाए, तो क्या करेंगी?

मैं..., मैं सबसे पहले एक एप्पल वूमन पार्टी बनाऊंगी। और वो पूरी तरह महिलाओं की पार्टी होगी।


पर एप्पल वूमन पार्टी क्यों...? मतलब आप अपनी पार्टी का नाम एप्पल वूमन पार्टी क्यों रखना चाहती हैं?

देखिए, एक आम आदमी पार्टी तो हैं ना..., और वो आदमियों की पार्टी है, तो इसी तरह एक एप्पल वूमन पार्टी भी होनी चाहिए जो केवल महिलाओं की पार्टी हो और महिलाओं के हित की बातें करें और इसी के लिए काम करे। उन्होंने अपनी पार्टी का नाम आमरखा है तो हम एप्पल रखेंगे क्योंकि जिस तरह आम बहुत टेस्टी होता है उसी तरह एप्पल भी बहुत अच्छा फल है और बीमारियां दूर करता है।


 आप अपनी तरफ से कोई संदेश देना चाहेंगी?

मैं सारे मम्मी-पापा से यह कहना चाहती हूं कि पैसा हाथ का मैल होता है। उसे कभी भी हाथ में नहीं लगने देना चाहिए। उस मैल के कारण कभी भी बच्चों को परेशान नहीं करना चाहिए और उनकी हर ख्वाहिश पूरी करनी चाहिए।

चित्रलेखा अग्रवाल

 



दरिद्रता व आर्थिक परेशानी दूर करने के लिए करें ये उपाय



अगर आप आर्थिक परेशानी से जूझ रहे हैं तो निम्न उपायों को करने से लाभ मिल सकता है। ये उपाय राशि अनुसार दिए जा रहे हैं। ऐसी मान्यता है कि अपने घर में ही इन उपायों को करने से घर की आर्थिक परेशानियों में कमी आ जाती है। कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। यदि किसी व्यक्ति का समय अच्छा नहीं है तो भी इन उपायों से काफी लाभ मिलता है। यहां जानिए आपके लिए खास उपाय...

मेष: घर के दक्षिण भाग में गुड़ की एक डली छोड़कर प्रस्थान करें। कार्य में प्रगति होगी तथा यात्रा में सफलता मिलेगी। जब भी किसी खास काम के लिए घर से बाहर निकलें, तब यह उपाय अवश्य करें।

वृषभ: किसी सफेद गाय को कच्चे चावल खिलाने से धन लाभ होगा। शुक्रवार से रोजाना यह उपाय आरंभ कर दें। चावल की अपनी मात्रा हथेली के अनुसार रखें। यह उपाय आपके लिए धनप्रद स्थितियां निर्मित करेगा।

मिथुन: बुधवार के दिन खड़े मूंग का दान करें। किसी सुहागन स्त्री को सुहाग के सामान का दान करें। नियमित रूप से सफेद गाय को हरी घास खिलाने से घर-परिवार के दोष दूर होंगे। खासकर वायव्य कोण (घर की पश्चिम-उत्तर दिशा) में पैसा रखना आपके लिए शुभ होगा, इससे आप अवश्य लाभान्वित होंगे।
कर्क: घर के पश्चिम भाग में कबूतरों को ज्वार के दाने चुगाने से पश्चिमी भाग लाभदायक हो जाता है। नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है तथा परिवार में शांति बनी रहती है।

सिंह: तांबे के लोटे में जल भरे और अपने घर के पूर्व भाग को लोटे से पानी छिड़ककर गीला करें। ऐसा करने से शुभ समाचार प्राप्त होते हैं। घर में बुजुर्गों को स्वास्थ्य लाभ होगा। यह उपाय करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है।

कन्या: नियमित रूप से अपने घर की उत्तर दिशा में हरी घास को गायों के खाने के लिए रखें। यदि हो सके तो किसी गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति को खड़ा मूंग और गुड़ का दान करें। यह करने से घर की उत्तर दिशा में लक्ष्मी का वास होगा तथा अपव्यय रुकेगा। साथ ही रुका धन प्राप्त होगा।
तुला: शुक्रवार को प्रात: घर के पश्चिम-उत्तर दिशा में सफेद कपड़े में चावल बांधकर लटका दें। ऐसा करने से मांगलिक कार्यों में गति आएगी तथा वैवाहिक जीवन की परेशानियां दूर हो जाएंगी। कार्यों में सफलता मिलेगी।

वृश्चिक: अपने घर के दक्षिण-पूर्व कोने में जौ को लाल कपड़े में बांधकर रखें। ऐसा करने से बुरी शक्तियां घर में प्रवेश नहीं करेंगी। बच्चों पर शुभ असर होगा तथा वे स्वस्थ रहेंगे।

धनु: घर का ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) आपकी साधना के लिए श्रेष्ठ है। यहां पर भगवान विष्णु की शत् नामावली या सहस्त्र नामावली का पाठ करें। ऐसा करने से रोग और दोषों से घर को मुक्ति मिलेगी। कार्यों में प्रगति का माहौल बनेगा।
मकर: घर के पश्चिम में हरी या श्याम तुलसी का पौधा लगाएं तथा इसे निरंतर सींचें। ऐसा करने से रुके कार्यों में प्रगति होगी। मांगलिक कार्य के साथ आर्थिक लाभ के योग बनेंगे।

कुंभ: घर की पश्चिम-उत्तर दिशा को स्वच्छ रखें। उपयोगी कागजात इस स्थान पर रखेंगे तो कार्यों में सफलता मिलेगी। यदि यहां किसी प्रकार के स्टोरेज की स्थिति निर्मित होती है तो स्थान परिवर्तन करें। घर में मनी प्लांट लगाएं।

मीन: घर की पूर्वोत्तर दिशा में देवताओं के लिए मंदिर बनवाएं। प्रयास करें कि घर का मंदिर और रसोईघर साथ-साथ न हो या चूल्हे की सीध में मंदिर न हो। मंदिर का स्थान परिवर्तन कर इष्टदेव को प्रसन्न करें। विशेष तौर पर लक्ष्मीनारायण की उपासना आपको भूमि-भवन का लाभ देगी।

हिंद प्रहरी संवाददाता

“शुक्र के परम उच्च काल में देश में सरकार बदलने का संकेत”

आचार्य धनीराम, मोबाइल-9417115003



इस समय शुक्र पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में मीन में आया है। 16 मई 2014 के लगभग शुक्र परम उच्च का होगा, यानी पूरे प्रभाव में होगा। शुक्र के उच्च काल में फिल्म, फैशन, ग्लैमर, वस्त्र, चांदी, रत्नों आदि के कारोबार में उछाल आएगा। तेल, खेती, व्यापार में भी लाभ होगा। 16 मई 2014 को शुक्र परम उच्च का होगा उसी समय लोकसभा चुनाव के परिणाम आएंगे। उस समय चंद्रमा नीच का रहेगा, यह स्थिति देश में सरकार बदलने का संकेत कर रही है। 








सभी राशियों के लिए मई माह का राशिफल 

मेष- शुक्र मीन में मेष राशि से बारहवां हो जाएगा जो कि ज्यादा लाभकारी नहीं रहेगा। खिन्नता रहेगी एवं प्रभाव में कमी आएगी। धन की कमी महसूस होगी। अपमान हो सकता है।

वृषभ- राशि स्वामी शुक्र उच्च का एवं ग्यारहवां होने से आप अत्यधिक लाभ में रहेंगे। धन लाभ के साथ सम्मान की प्राप्ति होगी। परिवार में खुशियां एवं संतान का सुख प्राप्त होगा। विवाह प्रस्ताव मिलेंगे।

मिथुन- दसवां शुक्र आपका जीवन अनियमित बना सकता है। धन की पूर्ति सामान्य रहेगी। ऋण का अंत होगा एवं संतान की समस्याओं से ग्रसित हो सकते हैं। यात्रा का योग भी बनाएगा।
कर्क- आपके लिए नवम शुक्र शुभ समाचारों की वृद्धि करेगा। शुक्र अटके कार्यों में गति प्रदान करेगा। धन की पूर्ति सहज होगी एवं विवादों का निपटारा होगा। कोई बड़ी उपलब्धि मिल सकती है। जीवन साथी से सामंजस्य रहेगा।

सिंह- अब आपके लिए शुक्र आठवां रहेगा, जो कि राशि के स्वभाव के अनुसार ही फल प्रदान करेगा। अकेलेपन एवं वैराग्य की वृद्धि रहेगी। सुविधाओं के प्रति आकर्षण कम होगा एवं अध्यात्मिकता की ओर झुकाव होगा।

कन्या- सातवां शुक्र उत्तम फल प्रदान करने वाला होगा। आर्थिक स्थिति मजबूत करेगा एवं नई जिम्मेदारियों की प्राप्ति होगी। सोचे हुए कार्य समय पर होंगे एवं लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होंगे।
तुला- आपकी राशि का स्वामी शुक्र अब छठा हो जाएगा। उच्च का शुक्र शुभ फल प्रदान करेगा। समस्याओं का अंत करने के साथ ही सौन्दर्य में वृद्धि करेगा। धन की कमी पूरी होगी एवं नौकरी में प्रमोशन के साथ धन लाभ होगा।

वृश्चिक- आपके लिए पांचवां शुक्र अच्छा फल प्रदान करने वाला होगा। जीवन की अनियमितताएं समाप्त होंगी एवं विचारों में सुधार होगा। आत्मबल मजबूत होगा तथा कई कार्यों को एक साथ करने में सक्षम होंगे।

धनु- आपके लिए चतुर्थ शुक्र धन संबंधी समस्याएं बढ़ाएगा। अन्य लोगों के कारण परेशान रहेंगे एवं उनकी समस्याएं सुलझाने में समय व्यतीत होगा। विवादों में फंसने का संकट बना हुआ है। घर-परिवार की चिंता बनी रहेगी।
मकर- आपके लिए तृतीय शुक्र श्रेष्ठ फल प्रदान करने वाला होगा। राशि का मित्र होने के साथ वह अनुकूल भी रहेगा। सोच से अधिक लाभ होगा एवं विवादों में विजय प्राप्त होगी। प्रेम की प्राप्ति होगी।

कुंभ- आपके लिए द्वितीय शुक्र एवं राशि मित्र होने से सकारात्मक स्थितियां निर्मित होंगी। आर्थिक उन्नति के साथ ही संबल प्राप्त होगा। जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा एवं धन लाभ के साथ प्रभाव में वृद्धि करेगा। नई योजनाएं प्राप्त होंगी।


मीन- इसी राशि में शुक्र होने से यह प्रथम और उच्च का रहेगा। कई सफलताओं के साथ प्रभाव में भी वृद्धि होगी। मई के मध्य में शुक्र पूरे चरम पर होगा। सभी ओर से अनुकूल समाचार मिलेंगे। लाभ बढ़ जाएगा।

हिंद प्रहरी संवाददाता

Friday, 18 April 2014

अरब देशों में काम करने वाले भारतीय मजदूरों की हालत बदतर, ना पेट भर खाना मिलता है और ना ही सोने के लिए भरपूर जगह, पानी भी खरीदकर पीना पड़ता है, पर चाहकर भी लौट नहीं सकते क्योंकि मालिक ने जब्त कर रखा है पासपोर्ट

इस तरह के लेबर कैम्प्स में रहते हैं प्रवासी मजदूर


मैने सुना है और जहां तक याद है इतिहास में पढ़ा भी है कि शाहजहां ने अपने प्रेम की मज़ार ताजमहल बनवाने के लिए 20,000 मजदूरों से काम लिया था और जब दुनिया की खास इमारत ताजमहल बनकर तैयार हो गई तो इस डर से कि कहीं ताजमहल की बराबरी कोई और इमारत न कर ले उन सभी मजदूरों के हाथ कटवा दिए थे। शाहजहां ने तो ऐसा इसलिए किया कि उसे अपने सपनों की इमारत की नकल बनाए जाने का डर था, लेकिन आज अरब देशों में शानदार इमारतों का निर्माण करने वाले मजदूरों के साथ अमानवीय व्यवहार केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि कॉन्ट्रेक्टर्स ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने की चाह रखते हैं और गरीब मजदूरों की जान किसी के लिए महत्वपूर्ण नहीं.. ना उनके देश के लिए और ना उनके एम्प्लॉयर के लिए जिसके सपनों को पूरा करने के लिए यह मजदूर तपती गर्मी में बारह-बारह घंटे लगातार काम करते हैं। 

शायद यहीं वजह है कि क़तर, दुबई, शारजाह और आबू दाबी में खड़ी आलीशान और आसमान की उंचाई तक उंची इमारतों के निर्माण में जुटे मजदूरों में आरंभ में तो दिहाड़ी कमाने का जोश था पर आज कल वो अपनी जान बचाने की कोशिश में हैं। यूएई यानि संयुक्त राष्ट्र अमीरात पैसे कमाने के दृष्टिकोंण से भारतीय मजदूरों की पसंद तो है पर बड़ी ही तेजी से अनगिनत लोगों की कब्रगाह भी बनता जा रहा है। 

जी हां दुनिया के पटल पर सभी सुख सुविधाओं से पूर्ण अमीरात को किसी राजा की रियासत से कम नही आंका जा सकता। शान और शौकत की तलब रखने वाले रईसों को यह अरब देश चुंबक की तरह अपनी ओर खींचता है। पर आसमान में जगमगाते इस देश की जमीन पर कई लोगों का खून बहा है, बह रहा है और शायद बहता ही रहेगा। इसका कारण है अमीरात के विभिन्न शहरों में बनने वाली इमारतें, जिन्हें दुनिया में सबसे खास बनाने के लिए भव्य स्वरुप दिया जाता है और इनके निर्माण के लिए भारत, नेपाल, बांगलादेश जैसे देशों से अच्छी आमदनी के लिए अमीरात का रुख करने वाले गरीब मजदूर अपना सबकुछ झौंक देते हैं। 

लगातार मर रहे हैं निर्माण कार्य में लगे मजदूर 

कुछ महीने पहले लंदन के एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2022 में फुटबॉल के वर्ल्ड कप फीफा की मेजबानी के लिए क़तर में एक विशाल स्टेडियम के साथ कई छोटे स्टेडियम, होटल्स और अन्य इमारतों का निर्माण कार्य तेज़ी से चल रहा है, पर आंकड़ों की माने तो शायद स्टेडियम के निर्माण के चलते लगभग 4000 प्रवासी मजदूरों की जिंदगी अधर में फंस गई है। लेकिन अभी भी स्टेडियम और होटलों के तेज निर्माण के लिए पड़ोसी देशों से ड़ेढ लाख मजदूरों को आकर्षित करने का प्रयास ज़ारी है और इसी तरह निर्माण कार्य के दौरान प्राकृतिक और अप्राकृतिक हादसों में मजदूरों की असमय मौत का सिलसिला भी ज़ारी है।



मज़दूरों की मज़बूरी और मालिकों की लापरवाही बनी हादसों की सबब 

· 50 डिग्री तापमान पर तपती गर्मी में बिना पानी, खाने के गधे की तरह काम में जुटे लोगों के साथ हादसे नही होंगे तो और क्या होगा। इनके रहने के घरों से अच्छे तो हमारे सड़क के किनारे रखे कूड़ा घर हैं। जहां कम से मुंह दूसरी ओर घुमा कर सांस तो ले सकते हैं। लेकिन यहां ज्यादा पैसा कमाने की चाह में मजदूरी करने आए मजदूरों की रिहायश के हालात बहुत बदतर हैं।

· पिछले कुछ सालों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि कई महीनों की तनख्वाह और पासपोर्ट काम पर लगाने वाली एजेंसियों के पास जमा होने के चलते इन्हें मजबूरन काम करना पड़ रहा है।

· काम के दौरान उन्हे मुफ्त पानी मुहैया कराने के स्थान पर खरीद कर पानी पीने को मजबूर किया जाता है।

· पिछले साल के आरंभ में ही 82 भारतीय मजदूरों की काम के दौरान मौत हो चुकी थी जिनमें से ज्यादातर की मौत का कारण दिल की धड़कन रुक जाना था और बाकी मौतों के कारण था काम के दौरान होने वाले हादसे। मजदूरों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है।

· पिछले साल कुल 1,460 भारतीय मजदूरों ने भारतीय दूतावास में कार्यस्थल पर खराब स्थिति और अमानवीय व्यवहार, व्यवस्थाओं और तनख्वाह में कमी अथवा मालिकों द्वारा तन्ख्वाह रोक लिए जाने संबंधी मामलों को लेकर शिकायत दर्ज की है।


एक साल में 478 भारतीय मजदूरों की मौतों को ‘सामान्य’ मानते हैं कतर के मानवाधिकार अधिकारी

कार्यस्थल सुरक्षा और प्राथमिक सुविधाओं के अभावों के साथ काम करने को मजबूर लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है और साथ ही बढ़ रही है रोज होने वाले हादसों की संख्या लेकिन कतर के मानव अधिकार विभाग से संपर्क करने पर वो इसकी जानकारी से साफ इनकार कर देते हैं बल्कि उनका सीधा सा जवाब होता है कि आपको गलत जानकारी है और सब कुछ ठीक चल रहा है। इतना ही नहीं ब्रिटेन के एक अखबार को दिए इंटरव्यू में मानवाधिकार अधिकारी कहते हैं की वर्ष 2012 से 2013 तक होने वाली कुल 478 भारतीय मजदूरों की मौत “सामान्य” हैं। जबकि अन्य मानव अधिकार समूह इस संख्या को “डरावना” कहते हैं। और यह तो हम मात्र भारतीय मजदूरों की बात कर रहे हैं, खराब स्थिति और काम के दौरान मरने वालों में नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए मजदूर भी शामिल हैं, तो वास्तविक संख्या का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।

एक अन्य सरकारी मानव अधिकार संस्था बताती है कि “क़तर में मजदूरी करने के लिए रहने वाले भारतीयों की संख्या क़तर के वास्तविक निवासियों की संख्या की दोगुनी है। मात्र क़तर में 600,000 भारतीय रह रहे हैं, जिनमें से अधिकतर किसी इमारत के निर्माण कार्य का हिस्सा हैं।” पिछले वर्ष औसतन हर महीने होने वाली मौतों की संख्या 27 का आंकड़ा पार कर चुकी है। कार्यस्थल पर खराब व्यवस्था और सुरक्षा के इंतजाम न होने को लेकर विरोध कर रही इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन परिसंघ का मानना है कि मृत्यु की यह दर असाधारण रुप से “बहुत अधिक” है।



पक्की नौकरी और आराम की ज़िंदगी के सपने दिखाकर गरीब लोगों को मजदूरी के लिए अरब देशों में भेजने में जुटी हैं कई एजेंसियां


भारत और हमारे कई पड़ोसी देश हैं जहां मजदूरों की कमी नही। जहां पर अच्छा खासा पढ़ा लिखा इंसान भी घर का कर्जा उतारने, बहन की शादी करने या परिवार को अच्छा जीवन स्तर देने के लिए मेहनत मजदूरी करने को तैयार हो जाता है। फिर क़तर में तो इमारत बनाने के काम में 300 से 500 दिर्हाम की कमाई प्रतिदिन है। पक्की नौकरी और आराम की जिंदगी के सपने दिखा कर मजदूरों को अमीरात की राह दिखाने वाली कई एजेंसियां देश के कोने-कोने में मौजूद हैं, जो पासपोर्ट होने पर वीज़ा लगवा कर, नहीं तो कबूतरबाज़ी के जरिए अमीरात में मजदूरों की कमी को पूरा करने का काम कर रही हैं। और ये मजदूर जब एक बार काम में लग जाते हैं तो बस एक जगह फंस के रह जाते हैं। 


काफला प्रणाली के चलते फंस जाते हैं मजदूर

इस समय क़तर में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, इंडोनेशिया और फिलीपींस से आये लगभग 1.2 लाख मज़दूर काम कर रहे हैं, जो वहां मौजूद कुल मज़दूरों की संख्या का 94 फीसदी भाग हैं। कंस्ट्रक्शन कंपनियों को सबसे बड़ा सहारा और मजदूरों को सबसे ज्यादा परेशानी क़तर में लागू “काफ़ला” प्रणाली के कारण हैं, जिसके अंतर्गत प्रवासियों को किसी व्यक्ति द्वारा स्पॉन्सर किया जाता है और वही व्यक्ति उस प्रवासी मजदूर के जीवन की बागडोर पर कब्जा जमा लेता है, उस मजदूर का पासपोर्ट यहां तक कि वेतन भी उस प्रायोजक के पास जमा रहता है। वो मजदूर न तो उसे छोड़ कर जा पाता है और न ही वो व्यक्ति उसे जाने देता है। इस तरह से कई लोग खुद को एक जाल में फंसा पाते हैं, जिसे कि उनके स्वदेश से आने से पहले ही उनके लिए बिछा दिया गया था और वो खुद को गुलामी की स्थिति में देखते हैं।


क्या है काफला प्रणाली

काफ़ला प्रणाली का इस्तेमाल लेबनान, सऊदी अरब और फारस की खाड़ी के छोटे अरब देशों में निर्माण और घरेलू प्रवासी मजदूरों की निगरानी के लिए किया जाता है। इस प्रणाली के अन्तर्गत इन देशों में किसी भी अकुशल मज़दूर को लाने के लिए एक प्रायोजक या स्पॉन्सर की ज़रूरत होती है जोकि आम तौर पर उस मज़दूर कामगार का एम्प्लॉयर या मालिक होता है, और वो ही उस मज़दूर के वीजा और कानूनी स्थिति के लिए जिम्मेदार होता है। काफला प्रणाली में मजदूर एक ही एम्पलॉयर के पास काम करने के मजबूर होते हैं। वो चाहकर भी किसी और जगह काम नहीं कर सकते और ना ही वापसी की राह पकड़ सकते हैं क्योंकि उनकी देश वापसी भी तभी हो सकती है जबकि उनका स्पॉन्सर उन्हें एक्जिट परमिट दे। स्थितियां चाहे कितनी भी खराब क्यों ना हों उन्हें एक ही मालिक के पास काम करने को मजबूर होना पड़ता है। इस तर्ज पर एम्प्लॉयर द्वारा मज़दूर के शोषण के लिए आसान अवसर पैदा करने के लिए दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों में इस प्रणाली की आलोचना की गई है क्योंकि ज्यादातर स्पॉन्सर इन मज़दूरों के पासपोर्ट अपने पास जब्त रखते हैं और कानूनी नतीज़ो के डर के बिना उनका शोषण करते हैं। हांलाकि मजदूरों के वीज़ा वगैरह देने का काम उन मालिकों का होता है लेकिन सच्चाई यह है कि वो उसकी फीस भी मजदूरों की दिहाड़ी में से काटते रहते हैं।


भारतीय दूतावास में फोन करने पर जवाब मिलता है कि इस बारे में उन्हें खबर नहीं विदेश मंत्रालय में बात करिए और विदेश मंत्रालय में जवाब मिलता है कि चुनाव के चलते किसी के पास वक्त नहीं....- मेरा अनुभव

इन आंकड़ों और भारतीय मजदूरों द्वारा दूतावास में की जा रही शिकायतों की पुष्टि के लिए जब मैंने क़तर स्थित भारतीय दूतावास में बात करने की कोशिश तो जवाब मिला “हमें इस बारे में कैसे पता होगा, यह हमारा काम थोड़े ही है। विदेश मंत्रालय से पूछिए’। अब भारत की हालत किससे छुपी है, काम करने और काम की बात करने में समय कौन खराब करें। पर फिर भी मैंने सोचा कोशिश करने में क्या हर्ज है तो विदेश मंत्रालय की साइट से दूरभाष लेकर फोन घुमा दिया, एक बार, दो बार, तीन बार, कई बार फोन मिलाने पर आखिरकार फोन उठाया गया...मैने तत्काल अपना परिचय दिया और पूछा अगर इस संबंध में बात करने के लिए किसी उपयुक्त व्यक्ति से संपर्क हो सकता हो तो..., तो मेरे गंभीर विषय पर सार्थक टिप्पणी के स्थान पर मुझे सुनने मिला “मैडम पता नहीं है आपको यहां चुनाव चल रहे हैं, अभी कौन बात करेगा आपसे...”, मैं यह भी नहीं पूछ पाई कि “सर आप कौन” और फोन रखा जा चुका था। बात सच भी है जब इतने गंभीर मसले पर अमीरात की सरकार को होश नही आ रहा तो भारत तो चुनाव के नशे में डूबा हुआ है, उसे कौन जगा सकता है।


भारतीय मूल के कंसलटेन्ट आर्किटेक्ट प्रदीप मोडी कहते हैं कि दुबई में ऐसी कोई समस्या नहीं..। यह अलग बात है कि हमें अनऑफिशियल सोर्स से यह पता चला कि वहां साइट पर लगभग रोज़ एक मजदूर की मौत होती है पर मोडी जी ऐसा मानने से साफ इनकार करते हैं.....
दुबई में रहने वाले भारतीय मूल के कंसलटेंट आर्किटेक्ट प्रदीप मोडी से जब मैने इस बारे में जानना चाहा तो सबसे पहले तो उन्होंने यह साफ कर दिया कि वो नहीं चाहते कि इस साक्षात्कार में उनकी फोटो छापी जाए और दूसरे वो उन्हीं बातों का जवाब देंगे जो वो जानते हैं और उनसे अनऑफिशियली कोई जानकारी ना मांगी जाए।

‘मजदूर खुद होते हैं हादसे के जिम्मेदार’

इतनी शर्तें रखने के बाद उन्होंने बताया कि “वो दुबई में रहते हैं क़तर में नही और क़तर के जो हालात हैं उसकी उन्हें कोई खबर नही है। पर हां अगर दुबई के बारे में पूछें तो यहां के कांट्रेक्टर, निर्माण स्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करके रखते हैं। मजदूरों को सभी प्रकार की सहुलियतें मुहैया कराई जाती है, यहां तक कि उनके खाने पीने की गुणवत्ता का भी खास ख्याल रखा जाता है। इसके बाद भी अगर कोई हादसा हो जाता है तो उसका जिम्मेदार ज्यादातर मजदूर ही होता है। क्योंकि कई मजदूर हैं, जिन्हें सुरक्षा उपकरण भार लगते हैं और वो बिना उनके अपना कार्य करना ज्यादा आसान समझते हैं।

“मजदूर काम छोड़कर ना भाग जाएं इसलिए कांन्ट्रेक्टर उनका पासपोर्ट जब्त करके रखते हैं”

उनसे पूछे जाने पर कि वर्ष 2009 में पासपोर्ट नहीं जमा करने का कानून बनने के बाद भी क्यों कांट्रेक्टर मजदूरों के पासपोर्ट अपने पास रखते हैं?, उनका कहना था कि “यह प्रथा कोई आज की नहीं है, यह तो हमेशा से होता आया है। मजदूर काम छोड़कर भाग न जाए इसलिए कांट्रेक्टर उनका पासपोर्ट अपने पास जब्त रखते हैं। अब अगर किसी को पासपोर्ट नहीं देना हो तो वो मना कर दे।”

“मजदूरों को खंरोच आ जाना या थोड़ी-बहुत चोट लग जाना आम है लेकिन कोई गंभीर घटना नहीं घटती”

मेरे इमारत के बनने के स्थान पर होने वाली घटनाओं के बारे में बहुत जोर देकर पूछने पर उन्होंने बताया कि “आज तक तो ऐसी घटना हुई नही, हां खरोंच आ जाना या थोड़ा बहुत चोट लग जाना तो आम है, पर वो तो घर में भी लग सकती है, उसे दुर्घटना नही कह सकते। यहां लोग 100 माले की इमारत के शीर्ष पर काम करते हैं पर कभी कोई हादसा नही हुआ। क्योंकि दुबई की सरकार नियमों को लेकर बहुत सख्त है और परिणामों को लेकर तल्ख़ भी।”

निधि रावत की रिपोर्ट


(अगले अंक में पढ़िए किस तरह बड़ी संख्या में भारतीय मजदूरों की लाशें अरब देशों के अस्पतालों में लावारिस पड़ी हैं और जिनको क्लेम करने वाला कोई नहीं और साथ ही जानिए इस बारे में क्या है भारतीय दूतावास के अधिकारियों का रुख)

टूट गया ज्यादा दिहाड़ी और बेहतर जिंदगी का स्वप्न..

खाड़ी देशों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं भारत से पहुंचे मजदूर, गुलामों सा जीवन जीने को मजबूर

लेबर कैम्प्स में इस तरह रहते हैं प्रवासी मजदूर

कई बार एक ही बिस्तर पर रहते हैं दो दो मजदूर

और कई बार दर्जन भर
और ऐसी होती हैं इन मजदूरों की किचेन्स जहां कई बार दो सौ लोगों को एक साथ खाना बनाना होता है


अमानवीय हालातों में काम करने को बाध्य हैं प्रवासी मजदूर, एक नज़र डरावने आंकड़ों पर

ü वर्ष 2022 में होने वाले फीफा वर्ल्डकप की मेजबानी के लिए क़तर में कई महत्वकांक्षी निर्माण श्रंखला मे हैं और वहां निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है।
ü दुनिया में सबसे ज्यादा प्रवासी मजदूर क़तर में हैं। वहां रहने वाले 94% लोग दूसरे देशों से काम की तलाश में आए हैं।
ü आम तौर मजदूरों को उनके देश से पैसे और सहुलियतों के वादे करके यहां लाया जाता है, जो कि वास्तविकता से परे है क्योंकि यहां पर उन्हें ना सुविधाएं मिलती हैं और ना काम के पैसे बल्कि उनके पासपोर्ट भी जब्त कर लिए जाते हैं जिससे वो चाहकर भी वापस नहीं लौट सकते।
ü नियमित रुप से 40 डिग्री से अधिक पारे के बीच कई घंटे लगातार काम करने वाले मजदूरों के लिए यहां कोई सुविधा नही है।
ü एक छोटे से तंग हाल कमरे में एक दर्जन से अधिक मजदूर रहने को मजबूर हैं और लगभग 200 लोगों के मध्य एक किचन की व्यवस्था की जाती है जिनमें मजदूरों को खुद ही अपना खाना बनाना होता है।
ü ज्यादातर मजदूर सप्ताह में एक दिन के अवकाश के साथ रोज लगातार 12 घंटों तक काम करते हैं।
ü पिछले साल नवम्बर में प्रकाशित एमनेस्टी संस्था की रिपोर्ट जो कि 210 कामगारों और 22 कम्पनियों के अधिकारियों से बातचीत पर आधारित थी, के मुताबिक कतर में निर्माण स्थलों पर सुरक्षा की पूरी तरह से अनदेखी की जाती है। साल 2012 में 1000 से ज्यादा मजदूरों को ऊंचाई से गिरने के बाद दोहा के मुख्य अस्पताल के ट्रॉमा सेन्टर में भर्ती कराया गया जिनमें से दस फीसदी लोग अपाहिज हो गए।
ü यह रिपोर्ट बताती है कि यहां प्रवासी मजदूरों को बेदर्दी से शोषण किया जाता है, उनसे कई-कई घंटों तक काम लिया जाता है और कई बार उनकी तन्ख्वाह रोक ली जाती है। रिपोर्ट के अनुसार इन मजदूरों की इनके मालिकों के लिए कोई कीमत नहीं है। एक कम्पनी के अधिकारी ने तो साक्षात्कार के दौरान इन्हें कैटलकहकर संबोधित किया।
ü शानदार गगनचुम्बी इमारतों का निर्माण करने वाले मजदूरों को निर्माण स्थल से अलग लेबर कैम्प नाम की बस्तियों में रखा जाता हैं जहां उनके रहने के लिए तंग कमरे होते हैं और सुविधाएं भी नाममात्र की होती हैं।
ü इन मजदूरों को तड़के सुबह बसों में भरकर कंस्ट्रक्शन साइट पर लाया जाता है और देश शाम या कई बार रात तक वापस लेबर कैम्प में छोड़ा जाता है।
ü यहीं नहीं मजदूरी को लेकर मालिकों से विवाद होने के चलते कई बार प्रवासी मजदूरों के खाने की मात्रा भी कम कर दी जाती है।
ü प्रवासियों के मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए कार्यरत संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत फ्रेंकोइस क्रीपिओ का कहना है कि क़तर में श्रम कानून के पालन को लेकर बहुत कमियां हैं और काफ़ला प्रणाली को समाप्त करने की ज़रूरत है जिसके अंतर्गत प्रवासी श्रमिक केवल एक मालिक के साथ काम करने को बाध्य होते हैं
ü सितम्बर 2013 में छपी एक रिपोर्ट में ब्रिटिश अखबार द गार्डियन ने कतर में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों की हालत आधुनिक गुलामों जैसी बताई है।
ü वर्ष 2010 से 2012 के बीच कतर स्टेडियम के निर्माणकार्य के दौरान मरने वाले भारतीय मजदूरों की संख्या 700 थी। 

निधि रावत

देश के युवा मतदाताओं को सलाम, जिन्होंने बदलाव के लिए वोट दिया है...

13 अप्रेल को हुए मतदान ने बड़े-बड़े चुनावी पंडितों को हैरान कर दिया जो पिछले सालों हुई वोटिंग के आधार पर अपने-अपने कयास लगा रहे थे। जो बम्पर वोटिंग हुई उसने राजनीतिक पार्टियों को यह सीख भी दे दी कि देश के मतदाता अब जागरूक हो गए हैं और अब वो घर से निकलकर देश के निर्माण में अपना योगदान देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, उन्हें हल्के में ना लिया जाए। इस बार युवा मतदाता जो पहली बार वोट दे रहे थे, भी भारी मात्रा में मतदान करने पहुंचे। चंडीगढ़ में हुई 74 फीसदी वोटिंग ने सबको पीछे छोड़ दिया। हमने चंडीगढ़ के कुछ फर्स्ट टाइम मतदाताओं से बात की और जानने की कोशिश की कि उन्होंने वोट किस मुद्दे पर दिया और उनके लिए मतदान क्यों महत्वपूर्ण है।



अनीता (बीए, फाइनल ईयर)- मैंने पहली बार वोट दिया और बहुत अच्छा लगा। वोट सबको देना चाहिए, यह सारे नागरिकों का अधिकार है। कांग्रेस कब से शासन कर रही है, बदलाव ज़रूरी है और मैंने बदलाव के लिए वोट दिया।

निकिता (21 साल)- वोट इसलिए दिया कि हमें बेहतर जिंदगी चाहिए। इस उम्मीद में वोट दिया कि नई सरकार बजट को सही तरीके से इस्तमाल करके महंगाई को काबू करेगी, महिलाओं की सुरक्षा पर काम करेगी और पूरे देश की स्थिति में बदलाव आएगा।

अमित (बीए, प्रथम वर्ष)- मैंने इसलिए वोट दिया कि देश में कुछ परिवर्तन आए, देश की तरक्की हो। मैंने अपनी तरफ से एक अच्छे उम्मीदवार को वोट दिया है और मुझे उम्मीद है कि देश में कुछ अच्छा होगा।

वंदना (एम कॉम, सेकेंड सेमेस्टर)-पहली बार वोट देने के बाद मुझे लगने लगा कि अब मैं भी भारत की नागरिक हूं। मुझे वोट देने का अधिकार मिल गया। मुझे लगता है वोट सबको देना चाहिए। अगर आपको बदलाव लाना है तो वो केवल वोट देकर लाया जा सकता है। मैंने वोट इस उम्मीद में दिया कि हमें रोजगार के ज्यादा अवसर मिलें, गरीबी खत्म हो और हमारा देश सबके लिए मिसाल बनें।

कुसुम जोशी (21 साल)- देश से भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए। और मैंने इसलिए वोट दिया कि भ्रष्टाचार खत्म हो और देश को अच्छा नेता मिले।

आप इन्हें मूर्ख नहीं बना सकते, ये जागरूक हैं और अंदर क्या है, बाहर क्या है... सब जानते हैं...

हमने कुछ ऐसे युवाओं से भी बात की जिन्हें या तो वोट देना है या दे चुके हैं, चुनाव को लेकर उनका क्या मानना है और वो किस पार्टी को पसंद करते हैं.., इस बारे में दो अलग अलग विचारधाराएं रखने वाले युवाओं के विचार ...

झूठी है मोदी लहर, अरविंद केजरीवाल है सही इंसान

देहरादून निवासी हिना असवाल इन चुनावों में पहली बार वोट देंगी। हमने जब उनसे चुनावी पार्टियों पर उनकी पसंद नापसंद को लेकर सवाल पूछे तो उन्होंने साफ कहा कि मोदी लहर की जो बातें चल रही हैं वो पूरी तरह से झूठी हैं और यह मोदी लहर दरअसल मीडिया की बनाई हुई है, बाकी देश में कोई मोदी लहर नहीं। जिस गुजरात विकास मॉडल की इतनी वाह-वाही हो रही है, वो भी झूठा है। सच्चाई यह है कि गुजरात में साक्षरता दर बहुत कम है, शिशु मृत्यू दर बहुत ज्यादा है। अम्बानी और अडानी जैसे लोग मोदी का समर्थन कर रहे हैं और इसलिए वो इतना बढ़ चढ़कर बोल रहे हैं। हिना कांग्रेस का भी समर्थन नहीं करतीं, कहती हैं- कांग्रेस के बारे में तो जो कहा जाए वो कम है। उन्होंने देश को केवल लूटा है और इतना ज्यादा लूटा है.., स्विस बैंक ने जो लिस्ट निकाली है अगर वो पब्लिक हो जाए, तो सबके सब जेल जाएंगे। मैं ना मोदी को मानती हूं ना कांग्रेस को, मेरे लिए तो अरविंद केजरीवाल सही चॉयस है। वो अपनी समाज सेवी संस्था के जरिए 2002 से समाज में परिवर्तन लाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने बहुत से गरीब लोगों को बीपीएल कार्ड्स दिलवाएं हैं। बहुत काम किया है। लोगों को जागरूक किया है। उनको अवॉर्ड मिल चुके हैं। ऐसे कितने लोग होते हैं जो अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़ कर लोगों को जागरूक करने का काम करते हैं, समाज सेवा के काम में जुट जाते हैं। उनकी ईकोनॉमिक एनालिसिस भी बहुत अच्छी है, इसलिए मेरा वोट तो ‘आप’ के लिए होगा। एक और बात बताते हुए हिना कहती हैं कि यहां जो ‘आप’ की उम्मीदवार हैं, वो कंचन चौधरी हैं और वो बहुत ही ईमानदार हैं। लेकिन यहां भाजपा के जो उम्मीदवार है निशंक, वो तो भ्रष्टाचारी हैं। उनका बैकग्राउंड भी अच्छा नहीं है। तो मैं उन्हें वोट क्यों दूं? मेरे परिवार के लोग भी केवल मोदी-मोदी ही करते हैं लेकिन मैं उनका समर्थन नहीं करती। मैं अरविंद का समर्थन करती हूं क्योंकि वो हमारे लिए कुछ करना चाहता है और लोग उसे थप्पड़ मारने में लगे हैं...। जो भी हो मैं अरविन्द का ही समर्थन करती हूं।

मजबूत उम्मीदवार हैं नरेन्द्र मोदी, केजरीवाल के बारे में तस्वीर साफ नहीं

गरिमा गुंसाईं भंडारी दिल्ली में अपना वोट डाल चुकी हैं। जब हमने उनसे उनकी पसंद के बारे में पूछा कि उन्होंने किसे और क्यों वोट दिया तो उन्होंने बताया कि उनकी पसंद बीजेपी है क्योंकि उन्हें लगता है नरेन्द्र मोदी एक मज़बूत उम्मीदवार है और बदलाव ला सकता है। गरिमा कहती हैं कि आज की तारीख में महिला सुरक्षा, जनता के प्रति जिम्मेदारी, भ्रष्टाचार, महंगाई ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिस पर कांग्रेस सरकार पूर तरह असफल हुई है इसलिए बदलाव बहुत ज़रूरी है और यह बदलाव बीजेपी ला सकती है। हमें उन्हें एक मौका देना चाहिए। लेकिन बदलाव की बात तो अरविंद केजरीवाल भी करते हैं फिर उन्हें मौका क्यों ना दिया जाए..., जब हमने गरिमा से यह सवाल पूछा तो गरिमा का कहना था- देखिए केजरीवाल के बारे में तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा कि यह बन्दा करना क्या चाहता है। मैंने विधानसभा चुनावों में ‘आप’ को वोट दिया था लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ खास किया नहीं और अब तो लगता है उनका फोकस ही चला गया है। वो लोग भी और राजनेताओं की तरह ही काम कर रहे हैं, दल बना रहे हैं, बातें कर रहे हैं, फिर उन पर भरोसा कैसे किया जाए। और दिल्ली तक तो ठीक था लेकिन देश चलाने का अनुभव मुझे नहीं लगता उन्हें है। इसलिए मैंने उन्हें वोट नहीं दिया। लेकिन बीजेपी को तो सब कट्टर पार्टी कहते हैं, आपको उससे कोई परेशानी नहीं.., इस सवाल के जवाब में गरिमा का कहना था कि मुझे तो लगता है यह मीडिया की बनाई बाते हैं। वरना ऐसा कट्टर जैसा तो मुझे कुछ नहीं दिखता बल्कि कट्टर टाइप तो मुझे आप दिखती है...।

युवा मतदाताओं में जोश देखकर अच्छा लगता है...

जी के अवस्थी- जी के अवस्थी ने अब तक हर बार मतदान किया है। युवाओं में यह जोश देखकर वो काफी खुशी जाहिर करते हैं और कहते हैं कि इस बार का चुनाव काफी अच्छा हो क्योंकि मतदाता ज्यादा तादाद में वोट डालने आए हैं। पहले जहां ग्रामीण इलाकों में ही अच्छी वोटिंग होती थी वहीं आज शहरी मतदाता भी जागरूक हो गए हैं और वोट डालने के लिए घरों से निकलने लगे हैं, क्योंकि लोग चाहते हैं कि वो अच्छी सरकार चुने और खुद चुनें।

हिंद प्रहरी संवाददाता