मज़दूरों की मज़बूरी और मालिकों की लापरवाही बनी हादसों की सबब
· 50 डिग्री तापमान पर तपती गर्मी में बिना पानी, खाने के गधे की तरह काम में जुटे लोगों के साथ हादसे नही होंगे तो और क्या होगा। इनके रहने के घरों से अच्छे तो हमारे सड़क के किनारे रखे कूड़ा घर हैं। जहां कम से मुंह दूसरी ओर घुमा कर सांस तो ले सकते हैं। लेकिन यहां ज्यादा पैसा कमाने की चाह में मजदूरी करने आए मजदूरों की रिहायश के हालात बहुत बदतर हैं।
· पिछले कुछ सालों से लगातार शिकायतें मिल रही हैं कि कई महीनों की तनख्वाह और पासपोर्ट काम पर लगाने वाली एजेंसियों के पास जमा होने के चलते इन्हें मजबूरन काम करना पड़ रहा है।
· काम के दौरान उन्हे मुफ्त पानी मुहैया कराने के स्थान पर खरीद कर पानी पीने को मजबूर किया जाता है।
· पिछले साल के आरंभ में ही 82 भारतीय मजदूरों की काम के दौरान मौत हो चुकी थी जिनमें से ज्यादातर की मौत का कारण दिल की धड़कन रुक जाना था और बाकी मौतों के कारण था काम के दौरान होने वाले हादसे। मजदूरों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि हो रही है।
· पिछले साल कुल 1,460 भारतीय मजदूरों ने भारतीय दूतावास में कार्यस्थल पर खराब स्थिति और अमानवीय व्यवहार, व्यवस्थाओं और तनख्वाह में कमी अथवा मालिकों द्वारा तन्ख्वाह रोक लिए जाने संबंधी मामलों को लेकर शिकायत दर्ज की है।
एक साल में 478 भारतीय मजदूरों की मौतों को ‘सामान्य’ मानते हैं कतर के मानवाधिकार अधिकारी
कार्यस्थल सुरक्षा और प्राथमिक सुविधाओं के अभावों के साथ काम करने को मजबूर लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है और साथ ही बढ़ रही है रोज होने वाले हादसों की संख्या लेकिन कतर के मानव अधिकार विभाग से संपर्क करने पर वो इसकी जानकारी से साफ इनकार कर देते हैं बल्कि उनका सीधा सा जवाब होता है कि आपको गलत जानकारी है और सब कुछ ठीक चल रहा है। इतना ही नहीं ब्रिटेन के एक अखबार को दिए इंटरव्यू में मानवाधिकार अधिकारी कहते हैं की वर्ष 2012 से 2013 तक होने वाली कुल 478 भारतीय मजदूरों की मौत “सामान्य” हैं। जबकि अन्य मानव अधिकार समूह इस संख्या को “डरावना” कहते हैं। और यह तो हम मात्र भारतीय मजदूरों की बात कर रहे हैं, खराब स्थिति और काम के दौरान मरने वालों में नेपाल, श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए मजदूर भी शामिल हैं, तो वास्तविक संख्या का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।
एक अन्य सरकारी मानव अधिकार संस्था बताती है कि “क़तर में मजदूरी करने के लिए रहने वाले भारतीयों की संख्या क़तर के वास्तविक निवासियों की संख्या की दोगुनी है। मात्र क़तर में 600,000 भारतीय रह रहे हैं, जिनमें से अधिकतर किसी इमारत के निर्माण कार्य का हिस्सा हैं।” पिछले वर्ष औसतन हर महीने होने वाली मौतों की संख्या 27 का आंकड़ा पार कर चुकी है। कार्यस्थल पर खराब व्यवस्था और सुरक्षा के इंतजाम न होने को लेकर विरोध कर रही इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन परिसंघ का मानना है कि मृत्यु की यह दर असाधारण रुप से “बहुत अधिक” है।
पक्की नौकरी और आराम की ज़िंदगी के सपने दिखाकर गरीब लोगों को मजदूरी के लिए अरब देशों में भेजने में जुटी हैं कई एजेंसियां
भारत और हमारे कई पड़ोसी देश हैं जहां मजदूरों की कमी नही। जहां पर अच्छा खासा पढ़ा लिखा इंसान भी घर का कर्जा उतारने, बहन की शादी करने या परिवार को अच्छा जीवन स्तर देने के लिए मेहनत मजदूरी करने को तैयार हो जाता है। फिर क़तर में तो इमारत बनाने के काम में 300 से 500 दिर्हाम की कमाई प्रतिदिन है। पक्की नौकरी और आराम की जिंदगी के सपने दिखा कर मजदूरों को अमीरात की राह दिखाने वाली कई एजेंसियां देश के कोने-कोने में मौजूद हैं, जो पासपोर्ट होने पर वीज़ा लगवा कर, नहीं तो कबूतरबाज़ी के जरिए अमीरात में मजदूरों की कमी को पूरा करने का काम कर रही हैं। और ये मजदूर जब एक बार काम में लग जाते हैं तो बस एक जगह फंस के रह जाते हैं।
काफला प्रणाली के चलते फंस जाते हैं मजदूर
इस समय क़तर में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, इंडोनेशिया और फिलीपींस से आये लगभग 1.2 लाख मज़दूर काम कर रहे हैं, जो वहां मौजूद कुल मज़दूरों की संख्या का 94 फीसदी भाग हैं। कंस्ट्रक्शन कंपनियों को सबसे बड़ा सहारा और मजदूरों को सबसे ज्यादा परेशानी क़तर में लागू “काफ़ला” प्रणाली के कारण हैं, जिसके अंतर्गत प्रवासियों को किसी व्यक्ति द्वारा स्पॉन्सर किया जाता है और वही व्यक्ति उस प्रवासी मजदूर के जीवन की बागडोर पर कब्जा जमा लेता है, उस मजदूर का पासपोर्ट यहां तक कि वेतन भी उस प्रायोजक के पास जमा रहता है। वो मजदूर न तो उसे छोड़ कर जा पाता है और न ही वो व्यक्ति उसे जाने देता है। इस तरह से कई लोग खुद को एक जाल में फंसा पाते हैं, जिसे कि उनके स्वदेश से आने से पहले ही उनके लिए बिछा दिया गया था और वो खुद को गुलामी की स्थिति में देखते हैं।
क्या है काफला प्रणाली
काफ़ला प्रणाली का इस्तेमाल लेबनान, सऊदी अरब और फारस की खाड़ी के छोटे अरब देशों में निर्माण और घरेलू प्रवासी मजदूरों की निगरानी के लिए किया जाता है। इस प्रणाली के अन्तर्गत इन देशों में किसी भी अकुशल मज़दूर को लाने के लिए एक प्रायोजक या स्पॉन्सर की ज़रूरत होती है जोकि आम तौर पर उस मज़दूर कामगार का एम्प्लॉयर या मालिक होता है, और वो ही उस मज़दूर के वीजा और कानूनी स्थिति के लिए जिम्मेदार होता है। काफला प्रणाली में मजदूर एक ही एम्पलॉयर के पास काम करने के मजबूर होते हैं। वो चाहकर भी किसी और जगह काम नहीं कर सकते और ना ही वापसी की राह पकड़ सकते हैं क्योंकि उनकी देश वापसी भी तभी हो सकती है जबकि उनका स्पॉन्सर उन्हें एक्जिट परमिट दे। स्थितियां चाहे कितनी भी खराब क्यों ना हों उन्हें एक ही मालिक के पास काम करने को मजबूर होना पड़ता है। इस तर्ज पर एम्प्लॉयर द्वारा मज़दूर के शोषण के लिए आसान अवसर पैदा करने के लिए दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों में इस प्रणाली की आलोचना की गई है क्योंकि ज्यादातर स्पॉन्सर इन मज़दूरों के पासपोर्ट अपने पास जब्त रखते हैं और कानूनी नतीज़ो के डर के बिना उनका शोषण करते हैं। हांलाकि मजदूरों के वीज़ा वगैरह देने का काम उन मालिकों का होता है लेकिन सच्चाई यह है कि वो उसकी फीस भी मजदूरों की दिहाड़ी में से काटते रहते हैं।
भारतीय दूतावास में फोन करने पर जवाब मिलता है कि इस बारे में उन्हें खबर नहीं विदेश मंत्रालय में बात करिए और विदेश मंत्रालय में जवाब मिलता है कि चुनाव के चलते किसी के पास वक्त नहीं....- मेरा अनुभव
इन आंकड़ों और भारतीय मजदूरों द्वारा दूतावास में की जा रही शिकायतों की पुष्टि के लिए जब मैंने क़तर स्थित भारतीय दूतावास में बात करने की कोशिश तो जवाब मिला “हमें इस बारे में कैसे पता होगा, यह हमारा काम थोड़े ही है। विदेश मंत्रालय से पूछिए’। अब भारत की हालत किससे छुपी है, काम करने और काम की बात करने में समय कौन खराब करें। पर फिर भी मैंने सोचा कोशिश करने में क्या हर्ज है तो विदेश मंत्रालय की साइट से दूरभाष लेकर फोन घुमा दिया, एक बार, दो बार, तीन बार, कई बार फोन मिलाने पर आखिरकार फोन उठाया गया...मैने तत्काल अपना परिचय दिया और पूछा अगर इस संबंध में बात करने के लिए किसी उपयुक्त व्यक्ति से संपर्क हो सकता हो तो..., तो मेरे गंभीर विषय पर सार्थक टिप्पणी के स्थान पर मुझे सुनने मिला “मैडम पता नहीं है आपको यहां चुनाव चल रहे हैं, अभी कौन बात करेगा आपसे...”, मैं यह भी नहीं पूछ पाई कि “सर आप कौन” और फोन रखा जा चुका था। बात सच भी है जब इतने गंभीर मसले पर अमीरात की सरकार को होश नही आ रहा तो भारत तो चुनाव के नशे में डूबा हुआ है, उसे कौन जगा सकता है।
भारतीय मूल के कंसलटेन्ट आर्किटेक्ट प्रदीप मोडी कहते हैं कि दुबई में ऐसी कोई समस्या नहीं..। यह अलग बात है कि हमें अनऑफिशियल सोर्स से यह पता चला कि वहां साइट पर लगभग रोज़ एक मजदूर की मौत होती है पर मोडी जी ऐसा मानने से साफ इनकार करते हैं.....
दुबई में रहने वाले भारतीय मूल के कंसलटेंट आर्किटेक्ट प्रदीप मोडी से जब मैने इस बारे में जानना चाहा तो सबसे पहले तो उन्होंने यह साफ कर दिया कि वो नहीं चाहते कि इस साक्षात्कार में उनकी फोटो छापी जाए और दूसरे वो उन्हीं बातों का जवाब देंगे जो वो जानते हैं और उनसे अनऑफिशियली कोई जानकारी ना मांगी जाए।
‘मजदूर खुद होते हैं हादसे के जिम्मेदार’
इतनी शर्तें रखने के बाद उन्होंने बताया कि “वो दुबई में रहते हैं क़तर में नही और क़तर के जो हालात हैं उसकी उन्हें कोई खबर नही है। पर हां अगर दुबई के बारे में पूछें तो यहां के कांट्रेक्टर, निर्माण स्थल पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करके रखते हैं। मजदूरों को सभी प्रकार की सहुलियतें मुहैया कराई जाती है, यहां तक कि उनके खाने पीने की गुणवत्ता का भी खास ख्याल रखा जाता है। इसके बाद भी अगर कोई हादसा हो जाता है तो उसका जिम्मेदार ज्यादातर मजदूर ही होता है। क्योंकि कई मजदूर हैं, जिन्हें सुरक्षा उपकरण भार लगते हैं और वो बिना उनके अपना कार्य करना ज्यादा आसान समझते हैं।
“मजदूर काम छोड़कर ना भाग जाएं इसलिए कांन्ट्रेक्टर उनका पासपोर्ट जब्त करके रखते हैं”
उनसे पूछे जाने पर कि वर्ष 2009 में पासपोर्ट नहीं जमा करने का कानून बनने के बाद भी क्यों कांट्रेक्टर मजदूरों के पासपोर्ट अपने पास रखते हैं?, उनका कहना था कि “यह प्रथा कोई आज की नहीं है, यह तो हमेशा से होता आया है। मजदूर काम छोड़कर भाग न जाए इसलिए कांट्रेक्टर उनका पासपोर्ट अपने पास जब्त रखते हैं। अब अगर किसी को पासपोर्ट नहीं देना हो तो वो मना कर दे।”
“मजदूरों को खंरोच आ जाना या थोड़ी-बहुत चोट लग जाना आम है लेकिन कोई गंभीर घटना नहीं घटती”
मेरे इमारत के बनने के स्थान पर होने वाली घटनाओं के बारे में बहुत जोर देकर पूछने पर उन्होंने बताया कि “आज तक तो ऐसी घटना हुई नही, हां खरोंच आ जाना या थोड़ा बहुत चोट लग जाना तो आम है, पर वो तो घर में भी लग सकती है, उसे दुर्घटना नही कह सकते। यहां लोग 100 माले की इमारत के शीर्ष पर काम करते हैं पर कभी कोई हादसा नही हुआ। क्योंकि दुबई की सरकार नियमों को लेकर बहुत सख्त है और परिणामों को लेकर तल्ख़ भी।”
निधि रावत की रिपोर्ट

(अगले अंक में पढ़िए किस तरह बड़ी संख्या में भारतीय मजदूरों की लाशें अरब देशों के अस्पतालों में लावारिस पड़ी हैं और जिनको क्लेम करने वाला कोई नहीं और साथ ही जानिए इस बारे में क्या है भारतीय दूतावास के अधिकारियों का रुख)



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