Saturday, 24 May 2014

इसलिए कहते हैं अति का भला ना बोलना.. बड़े बोल तो बोल दिए, अब भुगतो...

मोदी के बारे में गलत कहने वालों के लिए शर्मसार होने का समय... 

मोदी के खिलाफ दिए गई 11 सबसे चर्चित बयान

ये उन लोगों के बोल हैं जिन्हें कभी यकीन नहीं था कि मोदी सत्ता में आएंगे। लेकिन ऐसा हो गया और जनता को आपके बयान याद भी हैं.. अब बोलो आपका क्या कहना है? जो कहा है वो करोगे, माफी मागोंगे या मुंह छिपाओगे..?

1-मणिशंकर अय्यर


मैं आपसे वादा करता हूं कि 21वीं शताब्दी में मोदी कभी भारत के प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। लेकिन अगर वो यहां चाय बेचना चाहते हैं तो हम उनके लिए एक जगह दे सकते हैं। 


2- अरविंद केजरीवाल-

दो दिनों तक वाराणसी में रहने के बाद मेरी यह राजनीतिक समीक्षा है कि मोदी जी वाराणसी से हार रहे हैं। इसलिए उन्हें वडोदरा पर ध्यान देना चाहिए। 








3- एचडी देवेगौड़ा-

अगर मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो मैं कर्नाटक छोड़ दूंगा। बीजेपी को बहुमत नहीं मिलेगा। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं। अगर ऐसा हुआ तो मैं कर्नाटक छोड़ कर कहीं और बस जाऊंगा।









4- कपिल सिब्बल- 

मेरा अनुभव कहता है कि नरेन्द्र मोदी कभी प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। क्या लोग ऐसा प्रधानमंत्री चाहते हैं जिसने अपने ही राज्य के लोगों को झूठे एनकाउंटर में मरवाया हो। मतदाता ऐसे इंसान को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहेंगे जो अल्पसंख्यको के विरुद्ध काम कर चुका हो। चाहे वो गुजरात के मुसलमान हों या सिक्ख।







5- कमाल राशिद खान-

यह मेरी चुनौती है, अगर मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो मैं ट्विटर छोड़ दूंगा और यह देश छोड़ दूंगा। 








6- संजय झा- 
इस ट्वीट को सेव करके रखिए। 2014 में कांग्रेस अकेली सबसे बड़ी पार्टी होगी और बहुमत के साथ गठबंधन की राजनीति का मजा लेगी। 









7 - लालू प्रसाद यादव- 

मैं या तो मोदी को बिहार से बाहर कर दूंगा या अपना नाम बदल लूंगा। 









8- नीतिश कुमार- 

मोदी को लगता है कि मैं उसके लिए एक बड़ी बाधा हूं। 













9- बेनी प्रसाद वर्मा-

कांग्रेस समेत किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिलेगा लेकिन हां कांग्रेस अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जरूर उभरेगी। इस स्थिति में सभी नॉन भाजपा पार्टियों को संगठित हो जाना चाहिए। मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए यही समय की मांग है।






10- नारायणसामी- 

कांग्रेस तीसरे मोर्चे की मदद से सरकार बनाएगी।








10- राहुल गांधी- 

मैं सफल होऊंगा। आप इंतज़ार करो और देखो।






वैश्विक पटल पर नमो-नमो.......... पाकिस्तान से ढाका तक, इंग्लेंड से अमेरिका तक... पड़ोसी मुल्कों से सुदूर देशों तक...विदेशी मीडिया में छाई मोदी की जीत

पूरा विश्व सांस बांधे भारत के इन चुनावों को देख रहा था और जब मोदी की जीत की खबर आई तो ग्लोबल मीडिया ने इसे प्रमुखता से दिखाया। मोदी की मां से आर्शिवाद लेते हुए तस्वीर कई गैर हिन्दी समाचार पत्रों के मुखप्रष्ठ का हिस्सा बनी। मोदी की जीत को लेकर भी अलग-अलग अखबारों में अलग-अलग मत दिखे। किसी ने इसे हिन्दुओं की जीत का नाम दिया तो किसी ने साम्प्रदायिक ताकतों की विजय कहा। लेकिन एक बात गौरतलब है..लगभग पूरे विदेशी मीडिया ने ‘भाजपा’ से ज्यादा ‘मोदी’ की जीत को अहमियत दी।























ऐसी रही विश्व के प्रमुख अखबारों की सुर्खियां

‘भारत ने गुजरात के कसाई को प्रधानमंत्री चुन लिया है’ – उम्मत, पाकिस्तान

‘भारत ने चुना मोदी को’ -डेली ऑब्ज़र्वर, ढाका

‘सत्ता में मोदी तूफान’ - डेली सन, ढ़ाका

‘भाजपा ने दिखाया कांग्रेस को बहार का रास्ता’ - डॉन, कराची

‘हिन्दुओं ने दिया हिंदू पार्टी को स्पष्ट जनादेश’ - द न्यूयॉर्क टाइम्स, न्यूयॉर्क

‘भारतीय विपक्ष की भारी बहुमत से जीत, मोदी ने चलाया मतदान का जादू’ - शंघाई डेली, शंघाई

‘मोदी और भाजपा ने दर्ज की भारी जीत’ - द गार्डियन, ब्रिटेन

‘नरेंद्र मोदी की चुनावी जीत ने की भारत में नए युग की शुरुआत’ - द वॉल स्ट्रीट जर्नल, अमरीका

‘राष्ट्रीय चुनावों में बाजी मारने की राह पर भारतीय विपक्ष’ - टाइम, अमेरिका

‘भारत का विपक्ष भारी बहुमत से जीत दर्ज करने की ओर’ - बी.बी.सी, ब्रिटेन

‘मोदी होंगे भारत के नए प्रधानमंत्री’ - जंग, लाहौर

कट्टरपंथी बीजेपी और उसके सहयोगियों को मिला बहुमत – नवा-ए-वक्त, पाकिस्तान

कैसा दिखेगा मोदी का भारत? - सी.एन.एन, लंदन

“देश के 175 मिलियन मुसलमानों के प्रति मोदी के रवैये को लेकर संदेह की स्थिति बरकरार” - फाइनेंशियल टाइम्स, यूके

संकलन- निधि रावत
















यह चुटकुले भी खूब चले...














संकलन- निधि रावत

जन का मत यह..... पब्लिक है भाई, तारीफ करना भी जानती है और टांग खींचना भी...


भाजपा की जीत की घोषणा होते ही सोशल साइट्स पर आई प्रतिक्रियाओं की बाढ़.. भाजपा और मोदी की जनता ने तारीफ की तो विरोधियों की जमकर टांग खिचाईं की गई। जनता ने अपनी प्रतिक्रियाओं से बता दिया कि अब वो समझदार हो गई है और राजनेताओं की चालाकियां समझती है। उसे वेवकूफ बनाना आसान नहीं। इन सबके बीच एक खुशी की बात यह कि जनता की प्रतिक्रियाओं में नई सरकार और मोदी को लेकर आशा और सकारात्मकता की लहर दिखी।

लोकतंत्र के लिए दुख का दिन 



1) राकेश राय, बैंगलोर

आज भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बहुत ही दुखद दिन है। कई चीज़ें जिनकी हमें पिछले 30 वर्षों से आदत हो चुकी हैं अब वो अगले 5 वर्षों तक नहीं होंगीं। ये वास्तव में निराशाजनक है।

· समर्थन देने और वापस लेने का नाटक अब और नहीं होगा।

· हम संसद में किसी भी मतदान से पहले होने वाली बहन मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस से वंचित हो जाएंगे, लेकिन आपको ये मानना पड़ेगा कि वो दूरदर्शी हैं, उन्होंने पहले ही घोषणा की है की वो किसी को समर्थन नहीं देंगी। अरे भाई आपके पास कोई सीट होगी तब न समर्थन की बात होगी।

· हमे बाहरी समर्थन देने के मुलायम सिंह के नखरे बहुत याद आएंगे।

· किसी भी विश्वास मत से पहले ममता बनर्जी का एक दिन में दिल्ली और कोलकाता के बीच 3 बार चक्कर लगाना बहुत याद आएगा।

· सलमान खुर्शीद, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी आदि के बिना अर्थ के भाषण की कमी खलेगी।

· हमे लालू यादव के ‘सिकुलर’ भाषण याद आएंगे।

· अब अरनब टाइम्स नाउ पर चिल्लाता नहीं मिलेगा।

· हमे चन्द्र बाबू नायडू की बार-बार राजग गठबंधन से जाने की धमकी और नखरे याद आएंगे।

· झाड़ू की कीमतें आखिरकार स्थिर हो जाएंगी।

· साइकिल और हाथी उत्तर प्रदेश में बहुतायत में नहीं पाये जाएंगे।

· नीतीश कुमार का तीर कमान का खेल बंद हो जाएगा और लालू की भी लालटेन बिहार में हमेशा के लिए बुझा दी जाएगी।

सच में बहुत दुखद दिन है, हमे इतना मज़ा फिर पता नहीं कब आएगा।


टाइगर नहीं, कांग्रेस बचाएं 



2) चन्द्र पांडे, गुड़गांव

टाइगर बचाएँ ?????????, नही - नही कांग्रेस को बचाएँ, केवल 44 शेष हैं। 5 सालों के अंदर इनके वास्तविक संख्या -44 रह जायगी। सार्वजनिक हित में जारी।







‘ज़ीरो फिगर’ से परेशान माया 



3) सारिका चौधरी, देहरादून

वैसे सब मायावती के मोटापे को लेकर बोलते थे ....... आज जब उनके पास " जीरो फिगर " है तो सब हँस रहे हैं .......... गलत बात है न












किसको मिली कितनी सीट 



4) आलोक सिंह नेगी, बंगाल

मोदी जी नीतीश कुमार से - तुमको कितने सीट मिली ?

नितीश कुमार - 2 सीट।

मोदी - मुझे भी 2 सीटें मिली। एक बड़ोदा से और दूसरी बनारस से। अब तुम क्या करोगे ?

नितीश - अपने राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दूंगा।

मोदी - में भी ;)

नितीश- तू फोन रख...



अब आपकी परीक्षा शुरू होती है. 



5) गरिमा अग्रवाल, दिल्ली

आदरणीय नरेंद्र भाई मोदी ………

भारत की जनता ने अपने कार्य कर दिया है। भारत की जनता ने अपने मतों के साथ आप और आपकी पार्टी को ऐतिहासिक जीत देकर चुना है। और ये सब हमने एक विशेष उद्देश्य के लिए किया है। अब आपकी परीक्षा शुरू होती है। हमारा आपसे अनुरोध है कि अपने सारे भाषणों को एक बार याद कर लें जिनमें आपने कहा है की आप अपने वादों को पूरा करने के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करेंगे। आशा है कि आप आपको प्राप्त जनादेश को निराश नहीं करेंगे।

इन सब के लिए आपको अभी से धन्यवाद है।

भवदीय,

विश्वास के साथ आपको वोट देने वाला प्रत्येक मतदाता

आज की रात हम एक बेहतर भारत की कामना के साथ सो सकेंगे। आज हम एक नए भारत को जगाने के लिए सोएंगे। आज भारत अगले 5 सालों तक कठिन परिश्रम करने के लिए सोएगा। आज मेरे मन में वहीं एहसास है जो 14 अगस्त 1947 को लाखों लोगों को हुआ था। (अनुवादित)


यह मोदी की जीत है 




पुण्य मित्र, पटना

यह न कांग्रेस की हार है, न भाजपा की जीत... यह सिर्फ और सिर्फ मोदी की विजय है। यह एक अकेले व्यक्ति का अभियान था, जो इस देश को कंविंस करना चाह रहा था कि कांग्रेस के बगैर भी देश में स्थायी सरकार बनायी जा सकती है। यह अभियान किसी सूरत में उपहार में मिली सफलता जैसा नहीं था। सबसे पहले मोदी को इसके लिए अपनी पार्टी भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस को कंविंस करना पड़ा। अपनी पार्टी के उन दिग्गजों को किनारे लगाना पड़ा जो मानते थे कि एक राज्य का मुख्यमंत्री राष्ट्रीय राजनीति का हकदार नहीं हो सकता। फिर उसने भाजपा जैसी ब्राह्मणवादी पार्टी में खुद को पीएम कैंडिडेट घोषित करवाया। उसके बाद उसका अभियान शुरू हुआ।
उसकी उम्मीदवारी भी बहुत आसान नहीं थी। उस पर दंगों के दाग थे। कांग्रेस, वाम और देश के इंटेलेक्चुअल उसे मौत का सौदागर करार देते थे और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उसके पीछे जासूसों की तरह पड़ा था। मगर मोदी का पता था कि उन पर होने वाला हर प्रत्यक्ष वार लोगों में उनके प्रति समर्थन को मजबूत करेगा। और ऐसा ही हुआ। मणिशंकर अय्यर का चायवाला कहना उनके लिए किस तरह वरदान हुआ यह बताने की जरूरत नहीं। पहले भी सोनिया ने उन्हें मौत का सौदागर कहा था और इससे गुजरात में उनकी जीत पक्की हो गयी थी।
मगर यह जीत सिर्फ भावनाओं औऱ खुद को लोगों के हमलों का निशाना बनता दिखाने की वजह से नहीं मिली। लगातार रैलियां करके उन्होंने लोगों को कंविंस किया कि उन्हें विकास करना आता है और गुजरात इसका उदाहरण है। यूपी-बिहार जैसे राज्यों के लोगों के लिए गुजरात निश्चित तौर पर आज भी स्वर्ग जैसा है। आप कुपोषण और पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के आंकड़े सुनाकर उन्हें कंफ्यूज नहीं कर सकते और ऐसा ही हुआ। इसके अलावा उन्हें सोशल इंजीनियरिंग भी करनी पड़ी। उदित राज और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को मिलाकर उन्होंने दलित समुदाय में पैठ बनायी और रामकृपाल को मिलाने से यादवों के बीच भी दावेदारी मजबूत की। हालांकि बाद के दिनों में गिरिराज जैसे नेताओं के गैरजिम्मेदार बयानों का भी उन्हें लाभ मिला औऱ ध्रुवीकरण तेज हुआ, जिससे अति पिछड़ा वर्ग भी उनके समर्थन में आ गया। बग्लादेशी घुसपैठियों का सवाल उठाने का फायदा उन्हें असम में मिला।
इस बात में भी कोई विरोध नहीं है कि पूंजीपतियों का साथ उन्हें भरपूर मिला औऱ प्रचार में काफी पैसा खर्च किया गया। मगर इसकी वजह भी यही थी कि पूंजीपतियों को उनकी दावेदारी में दम लगा और उन्हें लगा कि यह बंदा आया तो आर्थिक विकास की राह में पड़े रोड़ों को हटा सकता है। वरना अंबानी-अडानी या टाटा किसी पार्टी के खास नहीं होते।
इन तमाम तरीकों से ही सही मोदी ने ऐसी जीत हासिल की है जो 1984 के बाद से किसी को नसीब नहीं थी। उससे पहले जीतने वाले एक ही परिवार के लोग थे जो आजादी की लड़ाई की कीमत वसूल कर भारी बहुमत हासिल करते थे। मोदी पहले ऐसे व्यक्ति हैं जो आम नागरिक रहते हुए इतनी बड़ी सफलता हासिल कर पाये हैं। यह उनकी जीत है, न उन्हें विरासत मिली है और न ही आजादी का मेहनताना। इस लिहाज से मोदी ने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अपना नाम पहले गैर कांग्रेस, गैर गांधी-नेहरू परिवार के सदस्य के रूप में दर्ज करा लिया है, जो अपने दम पर अपनी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिला सका है।

संकलन- निधि रावत 






मोदी उवाच



‘आडवाणी जी ने एक शब्द प्रयोग किया, मेरी आडवाणी से प्रार्थना है कि वो यह शब्द उपयोग ना करें। उन्होंने कहा कि नरेन्द्र भाई ने कृपा की.. क्या बेटा मां पर कभी कृपा कर सकता है। जैसे भारत मेरी मां है वैसे ही बीजेपी भी मेरी मां है। कृपा तो पार्टी की है जो मां की सेवा करने का अवसर मुझे दिया।’

‘यह जो मोदी आपको दिख रहा है, इसलिए नहीं कि बहुत बड़ा है। इसलिए दिख रहा है कि मेरी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने मुझे अपने कंधे पर बैठाया है।’

‘नई सरकार देश के गरीबों को समर्पित है। देश के कोटि-कोटि युवकों को समर्पित है और मान-सम्मान के लिए तरसती हमारी मां-बहनों को समर्पित है। गांव हो, गरीब हो, पीड़ित हो, वंचित हो, यह सरकार उनके लिए है।’

‘जितनी भी सरकारें आई, सबने अपनी अपनी तरह से देश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। जो अच्छा हुआ उसके लिए वे सरकारें और उनका नेतृत्व करने वाले बधाई के पात्र हैं। हमारा दायित्व है, अच्छाई को लेकर आगे बढ़ें और अच्छा करने का प्रयास करें। यह भाव रहा तो देशवासियों को निराश होने की नौबत नहीं आएगी’।

‘मैं स्वभाव से आशावादी व्यक्ति हूं। डीएनए में लिखा है। पता नहीं निराशा क्या होती है। एक कॉलेज में भाषण हुआ था तो एक बात कही थी। उसे फिर कह रहा हूं। यह गिलास आधा पानी और आधा हवा से भरा है। सकारात्मक मार्ग के लिए आशावादी होना बहुत बड़ी आवश्यकता है। आशावादी व्यक्ति ही देश में आशा का संचार कर सकते हैं’।

‘मैं देश को बताना चाहता हूं कि पुराने अनुभव कितने ही बुरे क्यों न हों, निराशा छोड़नी होगी।’

‘हम सबका विकास चाहते हैं, लेकिन सबका साथ उतना ही अनिवार्य है। इसी मंत्र को लेकर हम आगे बढ़ना चाहते हैं’।


क्षेत्रीय क्षत्रप भी हुए धराशायी ---------- माया, एम करुणानिधि और अजित सिंह को मिला अंडा, मुलायम को परिवार और भाजपा से अलग हुए नीतिश कुमार के हाथ आईं मात्र दो सीटें


भाजपा की शानदार जीत ने कांग्रेस जैसी मज़बूत पार्टी का तो सफाया कर ही डाला, साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में आने की इच्छा रखने वाली बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियों के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया। बात-बात पर केन्द्रीय सरकार को आंख दिखाने वाली सपा, बसपा और डीएमके जैसी पार्टियों का हाल बुरा रहा तो भाजपा से अलग हुए पुराने साथी नीतिश कुमार भी कोई करिश्मा नहीं कर पाए।

हाथ मलते रह गए बसपा, डीएमके और रालोद-
में जयललिता और केन्द्र में भाजपा... बिगड़ गया मेरा बुढ़ापा..
ना मंत्रीपद बचा ना पार्टी... क्या होगा अब...?
क्यों बोले मैंने बड़े बोल..। अब तो केंद्र में भाजपा आ गई, मुझे सीबीआई से कौन बचाएगा..?



चुनावों के नतीजे आने से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने ऐलान किया था कि वो किसी हालत में सांप्रदायिक पार्टी भाजपा को समर्थन नहीं देंगी। लेकिन नतीजे आने के बाद उनकी किसी को मुंह दिखाने लायक हालत भी नहीं रही। दलितों के दम पर संसद पहुंचने का दावा करने वाली बसपा को दलितों ने भी नहीं पूछा। जहां 2009 के चुनावों में मायावती को 21 सीटें हासिल हुई थीं वहीं इस बार उन्हें एक भी सीट नहीं मिली। वहीं पिछले चुनावों में 18 सीटें हासिल करने वाली एम करुणानिधि की डीएमके को भी इस बार सभी सीटों पर हार मिली। केंद्रीय मंत्री अजीत सिंह की पार्टी रालोद का भी खाता नहीं खुला। खुद अजित सिंह और उनके पुत्र जयन्त चौधरी अपनी सीटें तक नहीं बचा पाए। चुनावों में मिली इस हार ने इन क्षेत्रीय पार्टियों के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। 

साइकिल भी हुई पंक्चर-

मुलायम सिंह- बेटा अपना टोपी पहनना भी काम ना आया, और अब तो टोपी उतरने की नौबत आ गई है..।
अखिलेश यादव- क्या करूं नेताजी मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा। कहीं पहलवानी ही ना करनी पड़ जाए।

तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने का सपना देखने वाली समाजवादी पार्टी की उम्मीदों पर भी मोदी लहर ने पानी फेर दिया। सपा को केवल पांच सीटों पर विजय मिली जिनमें से दो सीटें खुद मुलायम सिंह और बाकी सीटें उनके परिवार की थीं। अबु आज़मी और आज़म खान जैसे नेताओं के बूते मुस्लिम वोट पाने की उम्मीद कर रही सपा को मुस्लिम वोट की जगह मिली शर्मनाक हार। यहां तक कि मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर भी भाजपा की जीत हुई।

नीतिश चले थे छब्बे जी बनने ‘दूबे’ जी बनकर लौटे- 

यह क्या हो गया नीतिश बाबू.... अहंकार में दोनों गए- भाजपा का साथ और बिहार की कुर्सी..


राजनीति विश्लेषणों का कहना है कि यह दौर जनता दल (यूनाइटेड) का सबसे बुरा दौर है। भाजपा से 18 साल पुराना नाता तोड़कर नीतिश इस बात पर अलग हुए थे कि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को पीएम उम्मीदवार क्यों चुना। तब शायद नीतिश भी नहीं जानते होंगे कि मोदी भाजपा की नहीं समय और पूरे देश की मांग हैं। इन चुनावों में मोदी वेव के आगे धराशायी हुई उनकी पार्टी केवल दो सीटों पर सिमटकर रह गई। हार की जिम्मेदारी लेते हुए नीतिश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अब उन्होंने अपने पुराने दुश्मन लालू यादव से हाथ मिलाया है।

हिंद प्रहरी संवाददाता


पिटे प्यादे ----मोदी की आंधी में साफ हो गई मनमोहन कैबिनेट


देश के 16वें चुनावों के नतीजे क्या आए मानो चौंकाने वाले तथ्यों का भूचाल आ गया। कांग्रेस के अलावा भारतीय जनता पार्टी देश की दूसरी पूर्ण बहुमत पाने वाली विशुद्ध गैर कांग्रेसी पार्टी बन गई। देश की राजनीति ने केवल दो बार ऐसे जबरदस्त बहुमत से सरकारें बनती देखी हैं। एक 1984 में जब कांग्रेस को ऐसा बहुमत मिला था और एक 2014 में जब भाजपा ने ऐसा जबरदस्त बहुमत पाया है। याद रहे कि यह वहीं भाजपा है जो 1984 में केवल 2 सीटें लेकर आई थी और 30 सालों बाद वहीं भाजपा नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में 282 सीटें लेकर आई है। 30 सालों में 2 सीटों से 282 सीटों तक का सफर तय करने वाली भाजपा की जीत तो इन चुनावों की अहम खबर रही ही, साथ ही राजनीति के दिग्गजों की हार ने भी इस चुनाव को अभूतपूर्व बना दिया। मोदी की सुनामी में मनमोहन की कैबिनेट भी साफ हो गई। आईए एक नज़र डालते हैं राजनीति के उन बरगदों पर जो, मोदी नाम की आंधी में जड़ से उखड़ गए....

मम्मी ने इतनी मेहनत करवाई फिर भी हार गया
खुशी के आंसू रुक ही नहीं रहे, शुक्र है अब मैडम की नौकरी नहीं बजानी पड़ेगी

केवल 44, अब तो लगता है मायके जाना पड़ेगा

मनमोहन कैबिनेट से केवल 16 मंत्रिय़ों ने चुनाव लड़ा, जिनमें से 13 हार गए


 देश में सबसे ज्यादा समय तक सत्तारूढ़ रही कांग्रेस पार्टी ने कल्पना भी नहीं की थी कि उसे इस करारी हार का सामना करना पड़ेगा कि सत्ता तो दूर, प्रमुख विपक्षी पार्टी बनने के लिए भी हाथ पांव मारने की नौबत आ जाएगी। कांग्रेस को केवल 44 सीटें हासिल हुई और कुछ राज्यों में तो उसका खाता तक नहीं खुला। यूपीए के 28 कैबिनेट मंत्रियों में से केवल 16 कैबिनेट मंत्रियों ने यह चुनाव लड़ा था, जिनमें से 13 मंत्रियों को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। मिलते हैं इन बिगेस्ट लूजर्स से- 


1. सलमान खुर्शीद- विदेश मिनिस्टर, फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश से हारे

2. सुशील कुमार शिंदे- गृहमंत्री, सोलापुर, महाराष्ट्र से हारे


3. कपिल सिब्बल- कानून मंत्री, चांदनी चौक, दिल्ली से हारे


4. फारुख अब्दुल्ला- न्यू एंड रिन्यूएबल ऊर्जा मंत्री, श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर से हारे


5. अजीत सिंह- नागरिक उड्डयन मंत्री, बागपत, उत्तर प्रदेश से हारे


6. गुलाम नबीं आजाद- स्वास्थ्य मंत्री, ऊधमपुर, जम्मू-कश्मीर से हारे


7. एम एम पल्लम राजू- एचआरडी मंत्री, काकीनाड़ा, आंध्र प्रदेश से हारे


8. प्रफुल्ल पटेल- भारी उद्योग मंत्री, भंडारा-गोंदिया, महाराष्ट्र से हारे


9. श्रीप्रकाश जैसवाल- कोयला मंत्री, कानपुर, उत्तर प्रदेश से हारे 


10. बेनी प्रसाद वर्मा- स्टील मंत्री, गोंडा, उत्तर प्रदेश से हारे


11. गिरिजा व्यास- हाउसिंग एंड अर्बन पॉवर्टी एलीविएशन मंत्री, चित्तोड़गढ़, राजस्थान से हारीं


12. जयपाल रेड्डी- साइंस एंड टेक्नोलॉजी मंत्री, महबूबनगर से हारे


13. चंद्रेश कुमारी- संस्कृति मंत्री, जोधपुर, राजस्थान से हारीं..


कांग्रेस के मंत्रियों को मिली शर्मनाक हार

  • मनमोहन कैबिनेट के 28 मंत्रियों में से 12 या तो राज्यसभा सदस्य हैं या उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया जिनमें पी चिदम्बरम, एके एन्टोनी जैसे वरिष्ठ नेता शामिल हैं। जिन 16 मंत्रियों ने चुनाव लड़ा उनमें से केवल संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ, तेल मंत्री वीरप्पा मोईली और रेलवे मंत्री मल्लिकार्जुन खड़गे ही अपनी सीट बचा पाए। बाकी सभी 13 मंत्रियों को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। 
  • स्वतंत्र प्रभार वाले वाले 11 केंद्रीय राज्य मंत्रियों में से कुल 9 मंत्रियों ने चुनाव लड़ा था जिनमें से 6 को करारी हार मिली। हारने वाले इन मंत्रियों में कृष्णा तीरथ, सचिन पायलट, जितेन्द्र सिंह और  श्रीकांत जेना भी शामिल है। कृष्णा तीरथ की तो जमानत भी जब्त हो गई। जीत केवल ज्योतिरादित्य सिंधिया, केएच मुनियप्पा और केवी थॉमस को मिली। यह भी बता दें कि इन ग्यारह मंत्रियों में से एक राज्यसभा सदस्य हैं जबकि एक मनीष तिवारी ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। 
  • अब बचे 32 केन्द्रीय राज्य मंत्री, जिनमें से 6 या तो राज्यसभा सदस्य हैं, या उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। इनमें राजीव शुक्ला और तारिक अनवर भी थे। बचे हुए 26 चुनाव लड़ने वाले मंत्रियों में से केवल 8 जीत पाए जिनमें शशि थरूर, ई अहमद, केसी वेणुगोपाल और एएच खान प्रमुख हैं जबकि 18 मंत्री चुनाव हार गए। हारने वाले प्रमुख मंत्री रहे मिलिंद देवरा, आरपीएन सिंह, वी नारायणस्वामी और जितिन प्रसाद।
  • कांग्रेस के अन्य प्रमुख हारने वाले नेताओं में लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार, अंबिका सोनी, रीता बहुगुणा जोशी प्रिया दत्त, अजय माकन, संदीप दीक्षित और जेपी अग्रवाल रहे।  

 हिंद प्रहरी संवाददाता