हमारे धर्म में ऐसे बहुत से रिवाज़, परम्पराएं और मान्यताएं हैं जिन्हें हम बेकार और अंधविश्वास कहकर या तो स्वीकार नहीं करते या फिर उन्हें बेकार करार देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बहुत सी मान्यताओं का मजबूत वैज्ञानिक आधार है। हम साप्ताहिक कॉलम में आपको ऐसी ही मान्यताओं और उनसे जुड़े तर्क व वैज्ञानिक आधार से परिचित करवाएंगे। हमारी कोशिश आपको धर्मान्ध बनाने या अंधविश्वास फैलाने की नहीं है बल्कि उन विश्वासों के पीछे क तर्क और आधार आपके सामने रखने की है जो आपको विरासत में मिले हैं।
हिन्दू मान्यता के अनुसार ईश्वर एक है और वो सभी जगह मौजूद है केवल उसके रूप अलग अलग हैं। आखिर एक ही ईश्वर कैसे सृष्टि के कण कण में विद्यमान हो सकता है, कैसे वो एक ही ईश्वर सभी जगह रह सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए हम संख्याओं का उदाहरण लेते हैं। अंक 1 अकेली अंक है। इसके बाद जितने भी अंक या संख्याएं हैं जैसे 2, 3, 4, 5, 6.... आदि सभी अंक 1 से ही मिलकर बनी हैं। उदाहरण के तौर पर अंक 2 में दो 1 हैं, अंक 3 में तीन 1 हैं, अंक 4 में चार 1 हैं... और इसी तरह संख्या 100 में सौ 1 हैं, 5000 में पांच हज़ार 1 हैं... यानि 1 के अतिरिक्त हर संख्या अंक अनेक 1 अंको से मिलकर बनी हैं। लेकिन हर नए अंक और संख्या का रूप अलग है, नाम अलग है, यहां तक कि गुण-धर्म भी अलग हैं जैसे कि 1 विषम अंक है, लेकिन दो 1 से बना 2 विषम अंक है, अंक 4 विभाज्य है तो अंक 5 अभिवाज्य है... ठीक इसी तरह ईश्वर जिसे कि हम परमात्मा (परम+ आत्मा) कहते हैं वो ‘एक’ ही है लेकिन वो हर एक इंसान में आत्मा या जीवन या चेतना के रूप में मौजूद है। और अंको की तरह ही वो हर इंसान, वस्तु या चीज़ के साथ मिलकर अलग रूप, रंग और गुण-धर्म को धारण करता है, अलग और मौलिक गुण का निर्माण करता है। जिस तरह अंक 1 हर संख्या चाहे वो कितने भी अंकों की क्यों ना हो, का मूल अंक है, उसी तरह परमात्मा या ईश्वर सृष्टि के कण-कण में, हर मनुष्य, जीव जन्तु में विद्यमान है और उनका मूल तत्व है।
हिन्द प्रहरी संवाददाता

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