Saturday, 24 May 2014

क्षेत्रीय क्षत्रप भी हुए धराशायी ---------- माया, एम करुणानिधि और अजित सिंह को मिला अंडा, मुलायम को परिवार और भाजपा से अलग हुए नीतिश कुमार के हाथ आईं मात्र दो सीटें


भाजपा की शानदार जीत ने कांग्रेस जैसी मज़बूत पार्टी का तो सफाया कर ही डाला, साथ ही राष्ट्रीय राजनीति में आने की इच्छा रखने वाली बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियों के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया। बात-बात पर केन्द्रीय सरकार को आंख दिखाने वाली सपा, बसपा और डीएमके जैसी पार्टियों का हाल बुरा रहा तो भाजपा से अलग हुए पुराने साथी नीतिश कुमार भी कोई करिश्मा नहीं कर पाए।

हाथ मलते रह गए बसपा, डीएमके और रालोद-
में जयललिता और केन्द्र में भाजपा... बिगड़ गया मेरा बुढ़ापा..
ना मंत्रीपद बचा ना पार्टी... क्या होगा अब...?
क्यों बोले मैंने बड़े बोल..। अब तो केंद्र में भाजपा आ गई, मुझे सीबीआई से कौन बचाएगा..?



चुनावों के नतीजे आने से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने ऐलान किया था कि वो किसी हालत में सांप्रदायिक पार्टी भाजपा को समर्थन नहीं देंगी। लेकिन नतीजे आने के बाद उनकी किसी को मुंह दिखाने लायक हालत भी नहीं रही। दलितों के दम पर संसद पहुंचने का दावा करने वाली बसपा को दलितों ने भी नहीं पूछा। जहां 2009 के चुनावों में मायावती को 21 सीटें हासिल हुई थीं वहीं इस बार उन्हें एक भी सीट नहीं मिली। वहीं पिछले चुनावों में 18 सीटें हासिल करने वाली एम करुणानिधि की डीएमके को भी इस बार सभी सीटों पर हार मिली। केंद्रीय मंत्री अजीत सिंह की पार्टी रालोद का भी खाता नहीं खुला। खुद अजित सिंह और उनके पुत्र जयन्त चौधरी अपनी सीटें तक नहीं बचा पाए। चुनावों में मिली इस हार ने इन क्षेत्रीय पार्टियों के भविष्य पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। 

साइकिल भी हुई पंक्चर-

मुलायम सिंह- बेटा अपना टोपी पहनना भी काम ना आया, और अब तो टोपी उतरने की नौबत आ गई है..।
अखिलेश यादव- क्या करूं नेताजी मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा। कहीं पहलवानी ही ना करनी पड़ जाए।

तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने का सपना देखने वाली समाजवादी पार्टी की उम्मीदों पर भी मोदी लहर ने पानी फेर दिया। सपा को केवल पांच सीटों पर विजय मिली जिनमें से दो सीटें खुद मुलायम सिंह और बाकी सीटें उनके परिवार की थीं। अबु आज़मी और आज़म खान जैसे नेताओं के बूते मुस्लिम वोट पाने की उम्मीद कर रही सपा को मुस्लिम वोट की जगह मिली शर्मनाक हार। यहां तक कि मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट पर भी भाजपा की जीत हुई।

नीतिश चले थे छब्बे जी बनने ‘दूबे’ जी बनकर लौटे- 

यह क्या हो गया नीतिश बाबू.... अहंकार में दोनों गए- भाजपा का साथ और बिहार की कुर्सी..


राजनीति विश्लेषणों का कहना है कि यह दौर जनता दल (यूनाइटेड) का सबसे बुरा दौर है। भाजपा से 18 साल पुराना नाता तोड़कर नीतिश इस बात पर अलग हुए थे कि भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को पीएम उम्मीदवार क्यों चुना। तब शायद नीतिश भी नहीं जानते होंगे कि मोदी भाजपा की नहीं समय और पूरे देश की मांग हैं। इन चुनावों में मोदी वेव के आगे धराशायी हुई उनकी पार्टी केवल दो सीटों पर सिमटकर रह गई। हार की जिम्मेदारी लेते हुए नीतिश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और अब उन्होंने अपने पुराने दुश्मन लालू यादव से हाथ मिलाया है।

हिंद प्रहरी संवाददाता


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