भाजपा की जीत की घोषणा होते ही सोशल साइट्स पर आई प्रतिक्रियाओं की बाढ़.. भाजपा और मोदी की जनता ने तारीफ की तो विरोधियों की जमकर टांग खिचाईं की गई। जनता ने अपनी प्रतिक्रियाओं से बता दिया कि अब वो समझदार हो गई है और राजनेताओं की चालाकियां समझती है। उसे वेवकूफ बनाना आसान नहीं। इन सबके बीच एक खुशी की बात यह कि जनता की प्रतिक्रियाओं में नई सरकार और मोदी को लेकर आशा और सकारात्मकता की लहर दिखी।
लोकतंत्र के लिए दुख का दिन
1) राकेश राय, बैंगलोर
आज भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बहुत ही दुखद दिन है। कई चीज़ें जिनकी हमें पिछले 30 वर्षों से आदत हो चुकी हैं अब वो अगले 5 वर्षों तक नहीं होंगीं। ये वास्तव में निराशाजनक है।
· समर्थन देने और वापस लेने का नाटक अब और नहीं होगा।
· हम संसद में किसी भी मतदान से पहले होने वाली बहन मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस से वंचित हो जाएंगे, लेकिन आपको ये मानना पड़ेगा कि वो दूरदर्शी हैं, उन्होंने पहले ही घोषणा की है की वो किसी को समर्थन नहीं देंगी। अरे भाई आपके पास कोई सीट होगी तब न समर्थन की बात होगी।
· हमे बाहरी समर्थन देने के मुलायम सिंह के नखरे बहुत याद आएंगे।
· किसी भी विश्वास मत से पहले ममता बनर्जी का एक दिन में दिल्ली और कोलकाता के बीच 3 बार चक्कर लगाना बहुत याद आएगा।
· सलमान खुर्शीद, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी आदि के बिना अर्थ के भाषण की कमी खलेगी।
· हमे लालू यादव के ‘सिकुलर’ भाषण याद आएंगे।
· अब अरनब टाइम्स नाउ पर चिल्लाता नहीं मिलेगा।
· हमे चन्द्र बाबू नायडू की बार-बार राजग गठबंधन से जाने की धमकी और नखरे याद आएंगे।
· झाड़ू की कीमतें आखिरकार स्थिर हो जाएंगी।
· साइकिल और हाथी उत्तर प्रदेश में बहुतायत में नहीं पाये जाएंगे।
· नीतीश कुमार का तीर कमान का खेल बंद हो जाएगा और लालू की भी लालटेन बिहार में हमेशा के लिए बुझा दी जाएगी।
सच में बहुत दुखद दिन है, हमे इतना मज़ा फिर पता नहीं कब आएगा।
टाइगर नहीं, कांग्रेस बचाएं
2) चन्द्र पांडे, गुड़गांव
टाइगर बचाएँ ?????????, नही - नही कांग्रेस को बचाएँ, केवल 44 शेष हैं। 5 सालों के अंदर इनके वास्तविक संख्या -44 रह जायगी। सार्वजनिक हित में जारी।
‘ज़ीरो फिगर’ से परेशान माया
3) सारिका चौधरी, देहरादून
वैसे सब मायावती के मोटापे को लेकर बोलते थे ....... आज जब उनके पास " जीरो फिगर " है तो सब हँस रहे हैं .......... गलत बात है न
किसको मिली कितनी सीट
4) आलोक सिंह नेगी, बंगाल
मोदी जी नीतीश कुमार से - तुमको कितने सीट मिली ?
नितीश कुमार - 2 सीट।
मोदी - मुझे भी 2 सीटें मिली। एक बड़ोदा से और दूसरी बनारस से। अब तुम क्या करोगे ?
नितीश - अपने राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दूंगा।
मोदी - में भी ;)
नितीश- तू फोन रख...
अब आपकी परीक्षा शुरू होती है.
5) गरिमा अग्रवाल, दिल्ली
आदरणीय नरेंद्र भाई मोदी ………
भारत की जनता ने अपने कार्य कर दिया है। भारत की जनता ने अपने मतों के साथ आप और आपकी पार्टी को ऐतिहासिक जीत देकर चुना है। और ये सब हमने एक विशेष उद्देश्य के लिए किया है। अब आपकी परीक्षा शुरू होती है। हमारा आपसे अनुरोध है कि अपने सारे भाषणों को एक बार याद कर लें जिनमें आपने कहा है की आप अपने वादों को पूरा करने के लिए कठिन से कठिन परिश्रम करेंगे। आशा है कि आप आपको प्राप्त जनादेश को निराश नहीं करेंगे।
इन सब के लिए आपको अभी से धन्यवाद है।
भवदीय,
विश्वास के साथ आपको वोट देने वाला प्रत्येक मतदाता
आज की रात हम एक बेहतर भारत की कामना के साथ सो सकेंगे। आज हम एक नए भारत को जगाने के लिए सोएंगे। आज भारत अगले 5 सालों तक कठिन परिश्रम करने के लिए सोएगा। आज मेरे मन में वहीं एहसास है जो 14 अगस्त 1947 को लाखों लोगों को हुआ था। (अनुवादित)
यह मोदी की जीत है

पुण्य मित्र, पटना
यह न कांग्रेस की हार है, न भाजपा की जीत... यह सिर्फ और सिर्फ मोदी की विजय है। यह एक अकेले व्यक्ति का अभियान था, जो इस देश को कंविंस करना चाह रहा था कि कांग्रेस के बगैर भी देश में स्थायी सरकार बनायी जा सकती है। यह अभियान किसी सूरत में उपहार में मिली सफलता जैसा नहीं था। सबसे पहले मोदी को इसके लिए अपनी पार्टी भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस को कंविंस करना पड़ा। अपनी पार्टी के उन दिग्गजों को किनारे लगाना पड़ा जो मानते थे कि एक राज्य का मुख्यमंत्री राष्ट्रीय राजनीति का हकदार नहीं हो सकता। फिर उसने भाजपा जैसी ब्राह्मणवादी पार्टी में खुद को पीएम कैंडिडेट घोषित करवाया। उसके बाद उसका अभियान शुरू हुआ।
उसकी उम्मीदवारी भी बहुत आसान नहीं थी। उस पर दंगों के दाग थे। कांग्रेस, वाम और देश के इंटेलेक्चुअल उसे मौत का सौदागर करार देते थे और मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उसके पीछे जासूसों की तरह पड़ा था। मगर मोदी का पता था कि उन पर होने वाला हर प्रत्यक्ष वार लोगों में उनके प्रति समर्थन को मजबूत करेगा। और ऐसा ही हुआ। मणिशंकर अय्यर का चायवाला कहना उनके लिए किस तरह वरदान हुआ यह बताने की जरूरत नहीं। पहले भी सोनिया ने उन्हें मौत का सौदागर कहा था और इससे गुजरात में उनकी जीत पक्की हो गयी थी।
मगर यह जीत सिर्फ भावनाओं औऱ खुद को लोगों के हमलों का निशाना बनता दिखाने की वजह से नहीं मिली। लगातार रैलियां करके उन्होंने लोगों को कंविंस किया कि उन्हें विकास करना आता है और गुजरात इसका उदाहरण है। यूपी-बिहार जैसे राज्यों के लोगों के लिए गुजरात निश्चित तौर पर आज भी स्वर्ग जैसा है। आप कुपोषण और पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के आंकड़े सुनाकर उन्हें कंफ्यूज नहीं कर सकते और ऐसा ही हुआ। इसके अलावा उन्हें सोशल इंजीनियरिंग भी करनी पड़ी। उदित राज और रामविलास पासवान जैसे नेताओं को मिलाकर उन्होंने दलित समुदाय में पैठ बनायी और रामकृपाल को मिलाने से यादवों के बीच भी दावेदारी मजबूत की। हालांकि बाद के दिनों में गिरिराज जैसे नेताओं के गैरजिम्मेदार बयानों का भी उन्हें लाभ मिला औऱ ध्रुवीकरण तेज हुआ, जिससे अति पिछड़ा वर्ग भी उनके समर्थन में आ गया। बग्लादेशी घुसपैठियों का सवाल उठाने का फायदा उन्हें असम में मिला।
इस बात में भी कोई विरोध नहीं है कि पूंजीपतियों का साथ उन्हें भरपूर मिला औऱ प्रचार में काफी पैसा खर्च किया गया। मगर इसकी वजह भी यही थी कि पूंजीपतियों को उनकी दावेदारी में दम लगा और उन्हें लगा कि यह बंदा आया तो आर्थिक विकास की राह में पड़े रोड़ों को हटा सकता है। वरना अंबानी-अडानी या टाटा किसी पार्टी के खास नहीं होते।
इन तमाम तरीकों से ही सही मोदी ने ऐसी जीत हासिल की है जो 1984 के बाद से किसी को नसीब नहीं थी। उससे पहले जीतने वाले एक ही परिवार के लोग थे जो आजादी की लड़ाई की कीमत वसूल कर भारी बहुमत हासिल करते थे। मोदी पहले ऐसे व्यक्ति हैं जो आम नागरिक रहते हुए इतनी बड़ी सफलता हासिल कर पाये हैं। यह उनकी जीत है, न उन्हें विरासत मिली है और न ही आजादी का मेहनताना। इस लिहाज से मोदी ने भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में अपना नाम पहले गैर कांग्रेस, गैर गांधी-नेहरू परिवार के सदस्य के रूप में दर्ज करा लिया है, जो अपने दम पर अपनी पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिला सका है।
संकलन- निधि रावत





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