भारतीय मतदाताओं द्वारा रिकॉर्ड मतदान हो या भाजपा के आडवाणी जी का रूठना-मनाना.., मोदी जी की मशहूर चाय हो या केजरीवाल को एक के बाद एक पड़ने वाले थप्पड़... या फिर नेताओं और समर्थकों द्वारा एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की प्रतिस्पर्धा हो, भारत के 16वें लोकसभा चुनाव बहुत वजहों से याद किए जाएंगे। नेताओं के मशहूर बयानों की बात तो हमने आगे के पृष्ठ पर की है, लेकिन हम उन महत्वपूर्ण घटनाओं को भी नहीं भूल सकते जिनकी वजह से यह चुनाव सबसे खास रहे। बहुत सारी बातें इन चुनावों में पहली बार हुईं। आप भी एक बार फिर से याद कर लीजिए चुनाव की सुर्खियों को-
1-रिकॉर्ड मतदान- भारत के 16वें आम चुनावों में अब तक का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत- 66.38 फीसदी, रिकॉर्ड किया गया। इससे पहले 84-85 के चुनावों में सबसे ज्यादा लोगों (64.01 फीसदी) ने मतदान किया था लेकिन यह रिकॉर्ड इस बार टूट गया। छोटे राज्यों समेत, कई बड़े राज्यों में भी लोगों ने बढ़-चढ़ कर मतदान में हिस्सा लिया। 79.03 फीसदी मतदान के साथ पश्चिम बंगाल मतदान करने में सबसे अव्वल राज्य रहा। दूसरे स्थान पर 58 फीसदी मतदान के साथ बिहार और तीसरे स्थान पर 55.29 फीसदी मतदान के साथ उत्तर प्रदेश ने अपनी जगह बनाई। लगभग 15 अन्य राज्यों और केन्द्र शासित राज्यों में अब तक का सबसे ज्यादा मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया। क्या युवा, क्या महिलाएं, क्या बुज़ुर्ग, सभी भारतीयों ने इस बार के मतदान में जमकर भागीदारी की। और सबसे सबसे अहम् बात- अब से पहले के चुनावों में जहां ग्रामीण इलाकों में मतदान प्रतिशत ज्यादा देखने को मिलता था, वहीं इस बार शहरी मतदाताओं का मतदान प्रतिशत भी बढ़ा।
2-अब तक के सबसे लम्बे और सबसे महंगे आम चुनाव
- देश के इतिहास में पहली बार 9 चरणों में चुनाव सम्पन्न कराए गए। 16वें आम चुनाव भारत के इतिहास में सबसे लम्बी अवधि तक चलने वाले आम चुनाव बने। 7 अप्रेल को पहली बार वोट डाले गए और 12 मई को इस चुनाव मैराथन की समाप्ति हुई। लगभग 35 दिनों तक चले इन चुनावों में 8163 प्रत्याशियों ने अपनी किस्मत आज़माई। ये अब तक के सबसे महंगे चुनाव भी रहे जिन्हें सम्पन्न कराने में सरकार को 3,426 करोड़ रुपए खर्च करने पड़े। महंगाई के अलावा चुनाव आयोग की तरफ से मतदाताओं को मतदान के प्रति जागरूक करने के लिए जो कदम उठाए गए, उनके कारण भी इन चुनावों का खर्च इतना ज्यादा रहा। 3-सोशल मीडिया का जमकर इस्तमाल-
इन चुनावों में जिस व्यापक स्तर पर फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया ने कुछ नेताओं के प्रति लहर बनाने और कुछ की बनी हुई लहर को बिगाड़ने का काम किया, उसके बाद शायद आगे कोई भी पार्टी सोशल मीडिया के लिए चुनाव रणनीति बनाने की अहमियत को अनदेखा नहीं कर पाएगी। सोशल मीडिया पर विभिन्न पार्टी के समर्थकों ने बाकायदा जंग छेड़ रखी थी। ऐसी बहुत सी खबरें जो खबरिया चैनलों से जनता तक नहीं पहुंचती थी, सोशल मीडिया के जरिए पहुंची। बिना रोक-टोक लोगों ने हर उम्मीदवार के प्रति खुलकर राय व्यक्त की और अपने पसंदीदा नेता का खूब प्रचार भी किया। ये देश के पहले ऐसे लोकसभा चुनाव थे, जबकि किसी पार्टी से सीधे तौर पर जुड़े ना होने के बावजूद उसके समर्थकों ने सोशल मीडिया के जरिए पार्टी के हित में आम राय बनाने में योगदान दिया।
4-‘आप’ के अर्श पर पहुंचने से फर्श पर गिरने तक का सफर-
4-‘आप’ के अर्श पर पहुंचने से फर्श पर गिरने तक का सफर-
विधानसभा चुनावों में जिस तरह आम आदमी पार्टी को जनता ने भारी मात्रा में वोट देकर अर्श पर पहुंचाया था, लोकसभा चुनावों में उसी पार्टी को वापस फर्श पर पहुंचा दिया। जितनी तेज़ी से पार्टी ऊपर पहुंची थी, उतनी ही तेज़ी से धड़ाम हो गई। हांलाकि नई-नई जन्मी इस पार्टी ने जिस मजबूती से भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी (वाराणसी में अरविंद केजरीवाल द्वारा) और कांग्रेस के राहुल गांधी (अमेठी में कुमार विश्वास द्वारा) को सीधे तौर पर टक्कर दी, उसे भी याद रखा जाएगा। आम आदमी पार्टी की भागीदारी ने इन चुनावों और मुकाबलों को और दिलचस्प बना दिया। चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल को थप्पड़, अंडे और स्याही के वार भी झेलने पड़े। सोशल मीडिया पर उनके लिए एक चुटकुला भी चल पड़ा कि अरविंद केजरीवाल सबसे छोटे राजनीतिक कैरियर में सबसे ज्यादा थप्पड़ और जनता का गुस्सा झेलने वाले भारत के पहले नेता बन गए हैं।
5-नारों का ज़ोर-
5-नारों का ज़ोर-
इस बार के चुनावों में नारों और विज्ञापनों की लड़ाई भी खूब हुई और उन्होंने हंगामा भी बेहद बरपाया। हर हर मोदी, हर घर मोदी पर जमकर हंगामा बरपा तो कांग्रेस के हर हाथ शक्ति, हर हाथ तरक्की विज्ञापनों की भी सोशल मीडिया में खूब खिंचाई हुई। मोदी समर्थक सब जगह ‘नमो नमो’ जपते पाए गए। ‘अबकी बार मोदी सरकार’ नारा तो इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोगों ने सोशल मीडिया साइट्स पर इसके हज़ारो नए रूप गढ़ डाले जैसे- रोटी के संग खाओ अचार, अबकी बार मोदी सरकार.. उतारो मजनुओं के प्यार का बुखार, अबकी बार मोदी सरकार... जितने लोग उतने नारे।
6-नीतिश कुमार और जसवंत सिंह द्वारा भाजपा का साथ छोड़ना और आडवाणी का रूठना-मानना-
6-नीतिश कुमार और जसवंत सिंह द्वारा भाजपा का साथ छोड़ना और आडवाणी का रूठना-मानना-
लोकसभा चुनावों से ठीक पहले भाजपा के 17 साल पुराने साथी जनता दल(यूनाइटेड) ने भाजपा का साथ छोड़ दिया। नीतिश भारद्वाज इसलिए भाजपा से दूर हो गए क्योंकि पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को पीएम उम्मीदवार के तौर पर चुना जो उन्हें मंजूर नहीं था। वहीं भाजपा के पुराने नेता जसवंत सिंह को पार्टी ने इसलिए बाहर का रास्ता दिखा दिया क्योंकि वो पार्टी द्वारा उन्हें टिकट नहीं दिए जाने पर निर्दलीय लड़ने को तैयार हो गए थे। इस बीच पार्टी के लौहपुरुष कहे जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी का भी लगातार रूठना-मनाना जारी रहा। कभी वो सीटों के चुनाव को लेकर रूठे तो कभी मोदी की पीएम पद पर उम्मीदवारी को लेकर। 7-मोदी की चाय और चाय पर चर्चा-
नरेन्द्र मोदी की चाय ने इन चुनावों में जमकर सुर्खियां बटोरी। नरेन्द्र मोदी ने जब यह बताया कि उन्होंने कभी चाय बेची थी तो विरोधियों ने इस उनका जम कर मज़ाक उड़ाया। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने इसे ही अपने प्रचार का अनूठा माध्यम बना डाला। जगह-जगह मोदी ने चाय पर चर्चा कार्यक्रम आयोजित करके सीधे जनता और कार्यकर्ताओं से बात की। हांलाकि उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में जब चाय पर चर्चा के दौरान मतदाताओं को मुफ्त चाय पिलाई गई तो चुनाव आयोग से इसकी शिकायत भी की गई और आयोग ने इसे मतदाताओं को दी जा रही रिश्वत करार दिया।
8- एक दूसरे के ऊपर निजी हमलों का चुनाव-
8- एक दूसरे के ऊपर निजी हमलों का चुनाव-
इन चुनावों में नेताओं ने एक दूसरे पर निजी हमले करने में भी कोई कोर कसर नहीं रखी। नेताओं की निजी ज़िंदगी को भी चुनावी मैदान में खींचा गया और एक दूसरे पर चारित्रिक प्रहार किए गए। नरेन्द्र मोदी ने पहली बार नामांकन में अपने पत्नि जसोदाबेन का नाम लिखा और बस मिल गया विरोधियों को मौका। नेताओं और भाजपा विरोधी जनता ने मोदी की राजनीति में खामियां निकालने की बजाय उनकी निजी जिंदगी की खामियां बतानी शुरू कर दी। लोग इस बात को लेकर मोदी की टांग खींचने पर उतर आएं कि उन्होंने अपनी पत्नि को मझधार में छोड़ दिया। हांलाकि इस मामले पर मोदी ने हमेशा चुप्पी साधे रखी। वहीं दिग्विजय सिंह और टीवी चैनल एंकर अमृता पुरी के रिश्ते भी सामने आए और दिग्विजय सिंह ने इन्हें सार्वजनिक तौर पर स्वीकार भी किया जिसको लेकर उनको भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। भाजपा ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के ऊपर बाकायदा सीडी जारी की तो प्रियंका ने भी मोदी की राजनीति को नीच राजनीति का नाम दे दिया। इस दौरान गांधी परिवार का झगड़ा भी सामने आया जब वरुण गांधी द्वारा अमेठी में राहुल के काम की तारीफ करने पर प्रियंका ने कहा कि वरुण गलत रास्ते पर चले गए हैं, जनता उन्हें सही रास्ता दिखाएगी तो वरुण ने भी प्रियंका गांधी पर जुबानी हमला करते हुए उन्हें सीमा ना लांघने की सलाह दी।
9- चुनावी मौसम में किताब बम-
9- चुनावी मौसम में किताब बम-
चुनावों में बम बनकर आईं संजय बारू और संजय पारिख की किताबें, जिन्होंने कांग्रेस को जबरदस्त परेशानी में डाल दिया। प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारु की किताब ‘दी एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर-मेकिंग एंड अनमेकिंग ऑव दी प्राइममिनिस्टर’ और पूर्व कोयला सचिव संजय पारिख की किताब ‘क्रूसेडर ऑर कॉन्सपिरेटर: कोलगेट एंड अदर ट्रुथ’ जैसी किताबों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को लेकर जो खुलासे किए गए थे उसने कांग्रेस की सरकार में असली शक्ति और प्रधानमंत्री पद की सच्चाई को सामने ला दिया। इन किताबों में बताया गया था कि प्रधानमंत्री मंत्रियों को काबू नहीं रख पाते थे और सारे अहम् फैसलों में सोनिया गांधी की भागीदारी रहती थी। इन बमों से निपटने में कांग्रेस को खासी मशक्कत करनी पड़ी।
10- अमेठी में दस साल बाद हुई सोनिया की रैली-
10- अमेठी में दस साल बाद हुई सोनिया की रैली-
यह देश में पैदा हो रही कांग्रेस विरोधी लहर का ही असर था कि सोनिया गांधी दस साल बाद राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र अमेठी में रैली करने पहुंची। भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी और आप प्रत्याशी कुमार विश्वास द्वारा अमेठी में राहुल गांधी के विरुद्ध चुनाव लड़ा जाना भी एक कारण रहा जिसने सोनिया को वहां रैली करके राहुल गांधी के लिए प्रचार करने को मजबूर किया।
11- राहुल ने किया मतदान केंद्रो का दौरा-
11- राहुल ने किया मतदान केंद्रो का दौरा-
7 मई को अमेठी में मतदान के दौरान राहुल गांधी पहली बार खुद मौजूद रहे और उन्होंने बूथ दर बूथ जाकर मतदान का जायदा लिया। पूरे दिन राहुल गांधी अपनी 24 कारों के काफिले के साथ पोलिंग बूथो पर घूमते रहे। इस दौरान उनकी एक पोलिंग बूथ पर ईवीएम को देखते हुए तस्वीर भी सामने आई जिसपर चुनाव आयोग को एक्शन लेने को कहा गया। हालांकि चुनाव आयोग ने इस मामले पर कोई कार्यवाई नहीं की।
12-मोदी को नहीं मिली वाराणसी में रैली की इजाज़त-
12-मोदी को नहीं मिली वाराणसी में रैली की इजाज़त-
ऐसा पहली बार हुआ जबकि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को उसके संसदीय क्षेत्र में रैली करने की इजाज़त नहीं दी गई। स्थानीय चुनाव अधिकारी और प्रशासन ने मोदी की सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें वाराणसी में रैली करने की इजाज़त नहीं दी। भाजपा ने इसे उत्तर प्रदेश सरकार का षणयंत्र बताया और अरुण जेटली जैसे वरिष्ठ पार्टी नेताओं ने इसके विरोध में धरना भी दिया। यहीं नहीं वाराणसी में मतदान से ठीक एक दिन पहले चुनाव अधिकारियों ने वाराणसी स्थित भाजपा कार्यालय पर रेड करके सारी चुनाव सामग्री को अपने कब्जे में ले लिया। यह कार्यवाही इस शिकायत के बाद की गई थी कि भाजपा कोड ऑफ कंडक्ट लागू हो जाने के बाद भी चुनाव सामग्री लोगों में वितरित कर रही है।
हिंद प्रहरी संवाददाता
हिंद प्रहरी संवाददाता


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