एक महिला के दो बेटे थे। एक बहुत बड़ा अफसर था, दूसरा बहुत बड़ा अफसर तो नहीं था, लेकिन ठीकठाक कमाता खाता था। दोनों के दो-दो बच्चे थे। महिला के पति नहीं रहे, दोनों बहुएं बुलाती रहीं। वो बड़ी बहू के यहां गई। महीने भर बाद लौट आई। फिर छोटी बहू के यहां गई। आठ महीने रहकर गांव लौटी। बड़ी बहू ने उलाहना दिया कि मां जी, आपकी सेवा में कौन सी कमी रह गई थी, जो मेरे यहां एक महीना और छोटी के पास आठ महीने रहीं। मां जी ने उससे तो कुछ नहीं कहा, लेकिन जब यही बात मां जी की एक सहेली ने पूछा तो उसने बताया। बोली कि बड़ी बहू के पास गई। सारी सुख सुविधाएं थी, बैठकर रहने की तो आदत नहीं थी। एक दो दिन बाद मन हुआ बच्चों के लिए खुद कुछ बनाकर खिलाऊं। बहू बोली-रहने दीजिए मांजी, नौकर तो हैं। एक दिन सब्जी काटने बैठी, बहू बोली-मां जी रहने दीजिए, नौकर किस दिन के लिए हैं। बच्चे मेरे पास आते तो कहती-दादी को परेशान मत करो, जाओ पढ़ो, बाहर खेलो। बेटे को फुरसत नहीं थी, बहू एक भी काम को हाथ नहीं लगाने देती थी, बच्चे भी दूर रहते थे। एक-एक दिन बरस की तरह बीता, बड़ी मुश्किल से महीना बीता और फिर गांव लौट आई।
इसके बाद बुझे मन से छोटी बहू के पास गई। अगले ही दिन उसने मुझे चावल की थाली पकड़ा दी, बोली, मां जी आप थोड़ा चावल बीन दीजिए, तब तक मैं सब्जी छौंक देती हूं। खाना बनाने जाती, बोलती मां जी किचेन में ही आ जाइए काम भी होता रहेगा, आपसे बातें भी होती रहेंगी। जब भी बच्चे उसके पास जाते, तंग करते, तब बोलती- जाओ दादी के पास, कहानियां सुनो उनसे। जब तक छोटी बहू के यहां रही। दोनों बच्चे मेरे ही पास सोते थे, रोज रात कहानियां सुनते। मेरे ही हाथ का खाना पसंद करते। रोज फरमाइश- दादी ये बनाओ, दादी वो बनाओ। बेटा तो मेरा... जैसे अभी भी बचपना नहीं गया, बोलता कढ़ी-चावल तो मां के हाथ का ही अच्छा लगता है। बहू कहती- मां जी जरा ये बनाना सिखा दीजिए, जरा वो बनाना सिखा दीजिए। सास-बहू मिलकर कभी अचार बनातीं, तो कभी किचेन में जाकर कोई डिश। बहू कभी कॉपी कलम लेकर बैठ जाती, बोलती- मां जी जरा ब्याह के गीत, सोहर और कजरी लिखवा दीजिए, आपको तो बहुत याद हैं, मैं जानती ही नहीं। अपनी सहेली से यह किस्सा बताते-बताते उस महिला के आंख से आंसू झरने लगे। बोली, बहन, बड़ी बहू ने बड़ा मान दिया, फिर भी एक महीना एक युग की तरह बीता। छोटी बहू के साथ आठ महीने कैसे बीत गए, पता नहीं चला। वो तो आने ही नहीं दे रही थी। बच्चे जिद कर रहे थे, दादी मत जाओ। बड़ी मुश्किल से यहां आ पाई हूं।
यह सिर्फ कहानी नहीं है, हमें आगाह भी कर रही थी कि मां, मौसी, बुआ, चाची.. जब हमारे यहां आएं तो हम उन्हें किस तरह रखें। उनको सम्मान देने का ख्याल रखें, लेकिन परिवार में उनकी भूमिका बनाना भी महत्वपूर्ण है जिससे उन्हें उनके महत्व का अहसास रहे।
हिन्द प्रहरी संवाददाता
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