Saturday, 10 May 2014

ब्लॉग से... छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से... सारी वादी भर दी गुलजार साहब ने...


गुल्जारिश


हाल ही में अज़ीम शायर और कवि गुलज़ार साहब को दादा साहब फाल्के सम्मान से नवाज़ा गया है। इस मौके पर हम आपके लिए गुलज़ार साहब की एक मुरीद द्वारा, उनकी शख्सियत और कैफियत पर लिखा हुआ ब्लॉग लेकर आए हैं। विज्ञापनों, फिल्मों, गीतों, किस्से कहानियों, कविताओं और समाचार पत्रों की खबरों से तो आपने गुलज़ार साहब को बहुत जाना है, लेकिन एक बार उनकी प्रशंसक के शब्दों से भी उन्हें जानिए, तो शायद जान पाएं कि गुलज़ार साहब इस सम्मान के सही हकदार हैं...


प्रस्तुत ब्लॉग ‘लम्हों के झरोखों से’ (http://lamhon-ke-jharokhe-se.blogspot.in/ ) ब्लॉग से लिया गया है। इसे लखनऊ की निवासी रिचा ने लिखा है जो गुलज़ार साहब की लेखनी की बहुत बड़ी प्रशंसक हैं। रिचा पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और और खाली समय में लिखना, पढ़ना और संगीत सुनना पसंद करती हैं। गुलज़ार साहब के ऊपर उन्होंने काफी ब्लॉग्स लिखे हैं, हम उन्हीं में से एक आपके लिए लेकर आए हैं।


वो जो शायर है...

"कुछ तो ज़रूर है तुम्हारे शब्दों में कि हर वो शख्स जिसने भूले से भी पढ़ लिया तुम्हें, बकौल तुम्हारे उसकी आदत ही बिगड़ जाती है.., तुम्हारी नज्में ऊंगली थामे जिंदगी के हर मोड़ पर मिल जाती हैं.., कभी बचपन के भेस में, कभी यादों के देस में.., कभी चांद पे सवार, कभी बादलों के पार। तुम्हारे अनोखे मेटाफर्स को जीने लगते हैं हम, हंसी सौंधी लगने लगती है, नैना ठगने लगते हैं तो कभी जगते जादू फूंकती हैं तुम्हारी नज़्में, कभी नींदे बंजर कर देती हैं।

कोई कोई दिन तो ऐसा भी आता है सुबह से शाम बस तुम्हारे गाने सुनते बीत जाती है.. कतरा-कतरा मिलती है, कतरा कतरा जीने दो.., फिर से आईयो बदरा बिदेसी.., थोड़ी सी ज़मीं, थोड़ा आसमां.., तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं.., तुझसे नाराज नहीं जिंदगी.., ओ माझी रे.., ऐ जिंदगी गले लगा ले.., दिल ढूंढता है फिर वहीं फुर्सत के रात दिन.. तुम सारा दिन यूं ही घेरे रहते हो और हम कहते हैं- आज कैफियत बड़ी गुल्ज़ाराना है। जलन भी होती है कभी तुमसे., तुम्हारे कितने चाहने वाले हैं। इतनी शिद्दत से परस्तिश करते हैं तुम्हें कि एक नया धर्म ही बना दिया है तुम्हारे चाहने वालों ने.. गुल्ज़ारियत।

जानते हो तुम्हारे नाम का एक फोल्डर हर उस कम्प्यूटर, फोन और आई पॉड में बना हुआ है जिसे हम इस्तेमाल करते हैं। और हां किसी से कहना नहीं पर हमारा दोस्त ना, जलता है तुमसे J, हमारा ही क्या, हर उस लड़की का जो तुम्हें पसंद करती है। तुम्हारी नज़्मों में हर इक रिश्ते को जिया है हमने.., जब कभी चल ‘गुड्डी चल पक्के जामुन टपकेंगे’ चिल्लाते हुए ‘रोशन आरा के खेत की जानिब’ भागते हो तो बचपन का कोई भूला बिसरा दोस्त याद आ जाता है जिसके साथ जाने कितनी ही दोपहरें ऐसी ही बचकानी हरकतें करते बितायी हैं, जब कहते हो बोस्की बेटी मेरी, चिकनी सी रेशम की डली, तो लगता है जैसे खुद हमारे पापा हमें आवाज़ लगा रहे हों।

बोस्की में तुम्हारी जान बसती है ना.., जानती हूं। उसे दो चोटियां बना कर स्कूल जाना होता था और वो भी एक बराबर कोई छोटी-बड़ी नहीं होनी चाहिए, तो तुमने चोटी बनाना सीखा बोस्की के लिए। हर साल उसके जन्मदिन पर खास उसके लिए लिखी कविताओं की एक किताब गिफ्ट किया करते थे... बोस्की का पंचतंत्र.. और तुम्हारे घर का नाम भी तो ‘बोस्कियाना’ है ना..?

लोगों को शायद नहीं पता कि तुम्हें टेनिस खेलना कितना पसंद है, और आज भी सुबह उठकर तुम टेनिस ज़रूर खेलते हो। और क्या पसंद है तुम्हें..? बैंगन बिल्कुल भी नहीं पसंद खाने में J, है ना? हां, कलफ किया हुआ सफेद कुर्ता पायजामा बहुत पसंद है तुम्हें, जिसे तुमने अपना सिग्नेचर स्टायल बना लिया है। कलफ भी इतना कड़क कि जाने कितने कुर्ते तो पहनते वक्त ही शहीद हो गए.. तुम्हारी नज़्में भी तुम्हारे कुर्तों की तरह ही हैं, कभी सीधी, सपाट, चिकनी तो कभी उसकी सलवटों की तरह ही पेचीदा।

अब सुनती हूं कि तुम मीना कुमारी के लिए पूरे रमजान रोजे रखते थे, सिर्फ इसलिए कि उनकी तबीयत नासाज थी और वो रोजे ना रख पाने की वजह से बेहद उदास थीं.., तो दिल से दुआ निकलती है कि ऐसा दोस्त सबको मिले। और जब कहते हो मैं अकेला हूं धुंध में पंचम, तो जी करता है तुम्हारे दोस्त को कहीं से भी ढूंढ कर वापस ला दूं तुम्हारे पास., तुम्हारी और पंचम की क्या कमाल की जोड़ी थी। वो संगीत के साथ एक्सपेरिमेंट करते थे और तुम शब्दों के साथ। कितने गाने तो ऐसे खेल-खेल में ही बन जाते थे…तुम्हारा कोई फ्रेज पसंद आता था उन्हें, तो कहते थे, इसे इलैबोरेटे करो.. और करते-करते पूरा गाना बन जाता था। तुमने भी तो पंचम के कितने बंगाली गानों की धुनें चुरा-चुरा के उस पर अपने बोल लिख दिए।

तुमसे जब बात नहीं होती किसी दिन और तुम खामोश, उदास से हो जाते हो, तो जी करता है जी करता है तुम्हारे गले में बाहें डाल कर, तुम्हें गुदगुदा कर पूंछू कहो यार कैसे हो?

बरसों पहले जब उर्दू का एक हर्फ भी समझ में नहीं आता था तो तुमने गालिब को हमसे मिलवाया था, अपने सीरियल के ज़रिए। पंजाबी नहीं आती थी तो तुमने अमृता से मिलवाया था उनकी नज़्में पढ़के... यह तुम्हारी आवाज़ का ही जादू था कि पंजाबी सीखने, समझने की इच्छा हुई.. और अब टैगोर से मिलवाने जा रहे हो उनकी लिखी बंगाली कविताओ का तर्जुमा करके.. इतना कुछ करते हो हम सबके लिए कि जी करता है तुम्हारी पीठ थपथपा दूं।

तुम शब्दों के जादूगर तो हो ही, पर तुम्हारी फिल्मों में खामोशियां भी बोलती हैं यह ‘कोशिश’ के जरिए तुमने साबित कर दिया.., जहां मौन ना सिर्फ बोला उसने लोगों के दिलों को छुआ भी, उन्हें रुलाया भी। कैसे कर पाते हो ऐसा... कैसे इतनी आसानी से समझ पाते हो इतने पेचीदा इन्सानी रिश्तों को..?

कितने ग्रेसफुल लगते हो आज भी सफेद कुर्ते में, सफेद बालों, पकी हुई दाढ़ी और मोटे फ्रेम के चश्मे में... तुम्हें देखती हूं तो लगता है हमारे बाबा होते तो ऐसे ही दिखते शायद.., दिल करता है कभी कि बढ़ कर चरण स्पर्श कर लूं तुम्हारे.., और आशीर्वाद ले लू उनकी तरफ से... तो कभी दिल करता है कि सिर पर हाथ फेर के ढेर सारी दुआएं दूं तुम्हें.. हमेशा स्वस्थ रहो और अपनी नज्मों और गीतों से अपने चाहने वालों के दिल ऐसे ही गुलज़ार करते रहो सदा..। "

हिंद प्रहरी संवाददाता

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