Wednesday, 19 February 2014

इन मुर्दों को सालों तक कब्र नसीब नहीं हुई...

विश्व के 6 ऐसे लोगों की दास्तान जिनके मर चुकने के कई वर्षों बाद तक भी लोगों को उनकी मौत का पता नहीं चला.., जिनके कंकाल में तब्दील हो चुके शरीर लम्बे अरसे बाद उनके घरों में मिले.....

कैसा दिल दहला देने वाला ख्याल है कि रिश्तों, दोस्तों और चाहने-मिलने वालों की इस दुनिया में अचानक कोई हमारा नाम भी लेने वाला न हो। ऐसी दुनिया ज़ेहन में उपजते ही दिल में ज़ोर का दर्द होने लगता है, चारों तरफ अंधेरा हो जाता है और इस तरह के ख्यालों को हम आम तौर पर पागलपन के दौरे का नाम देते हैं। क्योंकि ये संभव ही नही कि हम कभी दुनियादारी से दूर हो सकें। लेकिन ज़रा सोच के देखिए, जो तकलीफ हमें सिर्फ अकेलेपन का ख्याल से होने लगती है, वहीं तकलीफ इस दुनिया के कितने ही एकांकी जीवनों का सच है। दुनिया में ऐसे जाने कितने लोग हैं जो अपना जीवन अकेलेपन में गुज़ार रहे हैं। इस अंक में हम उन चंद बदकिस्मत लोगों की सच्ची दास्तान लेकर आए हैं, जिन्होंने अपनी मौत को भी जीवन की तरह एकांकी गुजारा और इंतजार किया कि शायद अपनी ही किसी गरज़ से कोई कभी उनको कब्र की मिट्टी तोहफे में देगा। लेकिन उनकी सुध किसी ने नहीं ली, सालों हो गए उन्हें मरे हुए और लोगों को पता ही नहीं चला कि वो मर चुके हैं। कब्र की मिट्टी की आस में कई शरीर मिट्टी हो गए तो कई की मिट्टी भी हवा में घुल गई:-


वर्ष-2008, क्रोएशिया

क्रोएशिया की हैडविका गोलिक, जो 42 साल तक मृत अवस्था में अपने टीवी के सामने बैठी रहींटीवी के सामने लम्बे समय तक बैठ के इंतजार करने के बाद आखिर कब्र में जाने का समय आ ही गया। हैडविगा गोलिक की उम्र उस समय 42 वर्ष थी जब उसने एक चाय के साथ टीवी का आनंद लेने का मन बनाया, पर न तो उसका टीवी कार्यक्रम ही कभी खत्म हुआ न ही चाय का वो प्याला। क्रोएशिया पुलिस के अनुसार हैडविगा के पड़ोसियों ने उन्हे आखरी बार 1966 में जीवित देखा था। लम्बे समय से उनके पड़ोसी ये समझते आ रहे हैं कि वो जगरेब के अपने घर को खाली करके जा चुकी है। शायद इसी लिए क्रोएशिया पुलिस उनके घर में घुस कर तथ्यों की छान बीन करने से चार दशकों तक बचती रही। पर आखिरकार मई 2008 में पुलिस को हैडविग के घर के मालिकाना अधिकार के मामले में घर में कदम डालने ही पड़े, जहां हैडविग का कंकाल 42 वर्षों से किसी की नजर का इंतजार करता पाया गया। पुलिस के अनुसार उनके घर के अंदर ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि लम्बे समय से वक्त वहां ठहरा हुआ हो। एक मुर्दा मातम और डरावनी खामोशी वहां छाई हुई थी और हैडविग की चाय का प्याला उनके बगल में वैसा ही रखा था जैसा उसे 42 साल पहले आखरी बार रखा गया होगा। 

वर्ष-2006, लंदन

तीन सालों तक जायॅस का कंकाल दुनियाभर की खबरों का मजा लेता रहा


25 जनवरी, 2006 को उत्तरी लंदन की हाउसिंग एसोसिएशन को याद आया कि वुड ग्रीन में रहने वाली जॉयस ने पिछले लगभग तीन साल से किराया नही अदा किया है। तब उसके घर पर कब्जा करने की इच्छा से एसोसिएशन और पुलिस ने घर पर धावा जा बोला। पर कई घंटियों के बाद भी दरवाजे के आस पास कोई आहट नहीं हुई। लेकिन घर से आ रही धीमी आवाजें घर में किसी न किसी की मौजूदगी का एहसास कराती रहीं थी। तब परेशान होकर उन्होंने दरवाज़े को तोड़कर घर में घुसने का मन बना लिया।

 और जब एसोसिएशन और पुलिस को घर का नज़ारा हुआ तो उन्हें मिला अपनी शिनाख्त के इंतजार का मजा लेता सोफे पर पसरा 38 वर्षीय जॉयस का कंकाल जिसकी नजरें ठीक सामने चल रहे टीवी पर टीकी हुई थीं जिस पर उस समय भी बीबीसी समाचार का कोई कार्यक्रम चल रहा था। पास ही कई खुले, अधखुले और बिन खुले क्रिसमस के उपहार पडे थे, किचन की सिंक बर्तनों के अम्बार से ढकी हुई थी, घर का प्रवेश द्वार बेतरतीबी से पड़ी डाक से भरा हुआ था लेकिन कहीं भी इंसानी सांस की कोई आहट नहीं थी। पूरे घर में बदबू आ रही थी।

पुलिस के अंदाज़े को सही माना जाए तो वर्ष 2003 के क्रिसमस का दिन जॉयस के जीवन का आखरी दिन था। जॉयस की जायज पहचान को साबित करने के लिए उनकी लाश पर कुछ भी शेष न था। इसके लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञों को उनके ढांचे और उनकी वास्तविक तस्वीर के बीच मिलान करना पड़ा। शरीर के पूरी तरह नष्ट हो चुकने के कारण उनकी मौत के कारणों का पता नहीं लगाया जा सका।

पर छान-बीन में सबसे हैरानी की बात यह सामने आई की 80 और 90 के दशक में लंदन की संगीत से जुडी कई प्रमुख हस्तियों के बीच अच्छी तरह से जानी जाने वाली जायस को तीन वर्षों के दौरान किसी ने एक बार भी याद नही किया। और उनके घर से बदस्तूर सड़ांध आने के बावजूद मौत की खबर को आम होने में लम्बा अरसा लगा। 

वर्ष-2013, ब्रिघटन

अगर मकान मालिक को घर की सफाई कराने का ख्याल न आता तो शायद सिमोन एलैन का 3 साल का इंतजार और लम्बा रहता...

अकेलेपन के अगले शिकार लोगों में अगली दास्तान हैं सिमोन एलैन की। ब्रिघटन में रहने वाले ब्रिटिश मूल के सिमोन को जिसने भी जाना उसे वो बेहद अकेले ही लगे। पड़ौसी हो या मकान मालिक सभी को वो हमेशा अपने अकेलेपन की इकलौती साथी शराब के साथ अपने आप में सीमित नज़र आए। और एक दिन अचानक वो नजर आना बंद हो गए।

 पड़ौसियों ने समझा शराबी सिमोन उनका पड़ौस छोड कर चले गए हैं। वहीं मकान मालिक को सिमोन द्वारा महीनों, सालों से किराया नहीं देने का ख्याल तक नही आया और जब ख्याल आया तो वो भी पडोसियों के सिमोन के घर के पास से गुजरने पर आने वाली सड़ांध की शिकायत करने पर। 

मालिक को लगा कि सिमोन बहुत पहले ही घर खाली करके जा चुके हैं तो शायद गंदगी की बदबू होगी। घर की सफाई के लिए उन्होंने कुछ लोगों को सिमोन के घर भेजा, जहां उन्हे रॉकिंग चेयर के पीछे फर्श पर पड़ा सिमोन का कंकाल मिला। 

पुलिस के अंदाज़े को सही माने तो सिमोन की मौत दिसम्बर 2010 में हो चुकी थी जबकि उनकी आयु 50 वर्ष के आसपास रही होगी। उनके शव रुपी कंकाल को फरवरी 2013 में उनके घर से प्राप्त किया गया। अन्य एकांकी लोगों की तरह भी उनका न तो कोई दोस्त ही मिल पाया, न ही कोई संबंधी सामने आया और न ही उनकी मौत का कारण तय हो पाया।

वर्ष 2013- फ्लोरिडा

फ्लोरिडा निवासी जिनेवा चैम्बर, जो कि मिलने से पहले शायद तीन साल से मृत थीं

अगस्त 2013 में फ्लोरिडा स्थित अपने घर से जिनेवा चैम्बर के विक्षिप्त शव को प्राप्त किया गया। 
छानबीन करने में पुलिस को पता चला कि जिनेवा एक सनकी किस्म की महिला थी। कभी वो गुस्सैल मिज़ाज महिला की तरह लोगों को अपने घर के सामने से गुजरने तक नही देती थी तो कभी उनका मुस्कान और कुकीज़ के साथ अभिवादन करती थकती न थी।

 जिनेवा के पड़ोसियों को जब उनकी मौत का पता चला तो वे आश्चर्य से भर गए कि इतने सालों तक जिनेवा के दोस्तो और रिश्तेदारों को उसका ख्याल क्यों नही आया। उन्होंने जिनेवा को हमेशा अकेला ही देखा था और इसी कारण से वो पिछले तीन सालों से जिनेवा की मौत से अनजान उसके बागीचे का ख्याल रख रहे थे। एक वर्ष पूर्व जब जिनेवा के विरुद्ध फौजदारी मुकदमा करते हुए प्रशाशन ने उसे दी जाने वाली सारी सुविधाओं को बंद कर दिया था, तब भी प्रशासन की ओर से किसी ने जिनेवा के कोई जवाब न दिए जाने की परवाह नहीं की।

 जिनेवा के पडोसियों की माने तो उसे आखरी बार लोगों को कुकीज़ खिलाते हुए अप्रैल 2010 में देखा गया था। उसके बाद से किसी ने भी उसे घर के बाहर नही देखा।


वर्ष-2012, मिलवॉकी, अमेरिका

डेविड ने आत्महत्या तो कर ली पर उन्हे ये नहीं पता था कि वो अपने चाहने वालों की नजरों से दूर होते ही उनके दिमाग से भी दूर हो गए हैं...


अमेरिका जैसे विकसित देश में लोगों को सभी सुख सुविधाएं तो आसानी से मिल जाती हैं पर उनके रिश्तों का ताना-बाना कभी व्यवस्थित नही हो पाता। बच्चे बड़े होते हैं तो मां बाप अकेले हो जाते हैं। नए रिश्ते बन जाते हैं तो पुराने कभी भूल से भी याद नही आते।

ऐसा ही कुछ किस्सा है अमरीका के एक बडे शहर मिलवॉकी में रहने वाले डेविड कार्टर का। डेविड एक खुशमिजाज़ नौकरीपेशा इंसान थे। वे मिलवॉकी में उपद्रव नियंत्रण अधिकारी के तौर पर कार्यरत थे और उनके मज़ाकिया स्वभाव और अच्छे चरित्र के कारण उनके चाहने और मिलने वालों की कोई कमी नहीं थी। फिर भी अचानक से 2007 में उन्होंने यह कहते हुए अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया कि अब वो न्यू मैक्सिको में जाकर बसना चाहते हैं और इस मामले में बेहद गंभीर हैं..। कितने गंभीर - कि हकीकत ये है कि नौकरी छोड़ने के कुछ समय बाद ही उन्होंने अपनी ही रिवॉल्वर से आत्महत्या कर ली थी।

 अब किन परिस्थितियों के चलते उन्होने ये कदम उठाया ये बात करना अब फिज़ूल है, पर यह कयास तो लगाया ही जा सकता है कि शायद उन्हें ये उम्मीद नहीं रही होगी कि हर समय उनके साथ की इच्छा करने वाले उनके यार दोस्त उन्हे कुछ ही दिनों में भुला कर आगे बढ़ जाने वाले हैं। 

वर्ष 2012 में उनके घर को खाली जान कर जब एक रीयल एस्टेट एजेंट ने उनके घर में घुसने का साहस किया तो घर के मालिक को सीढ़ियों के पास लगभग कंकाल हो चुकी अवस्था में पड़ा पाया। उसके सिर पर गोली का निशान था और हाथ जो कि सीने से चिपका हुआ था उसमें रिवाल्वर थमा हुआ था। और सबसे खास बात यह है कि वो दिन डेविड के 45वें जन्मदिन का दिन था।

वर्ष-2011, न्यू साउथ वेल्स, ऑस्ट्रेलिया

ऑस्ट्रेलिया की बुजुर्ग महिला जिसने जीते जी तो किसी का साथ नहीं पाया पर मरने के बाद जायदाद के लिए रिश्तेदार कोर्ट तक जा पहुंचे


अचानक आठ साल के लम्बे अर्से के लिए नताली वुड कहां गायब हो गई, न तो किसी ने ये जानने में दिलचस्पी दिखाई और न ही किसी ने उसे याद करने का कष्ट ही किया।

 अब तक हमने जितने लोगों के बारे में पढ़ा वो हमेशा से अकेले थे और हमेशा के लिए अकेले ही रह गए। पर नताली के शव को रिश्तों से खचाखच भरे माहौल में भी कब्र तब पहुंचने में आठ सालों का लम्बा वक्त तय करना पड़ा..., जिनके 13 करीबी रिश्तेदार होते हुए भी उन्हें पूछने के लिए कोई न मिला। उन में से किसी ने भी पुलिस को उनकी गुमशुदगी की सूचना देने का कष्ट नहीं उठाया। 

उनके पडोसियों ने उनके अचानक से दिखना बंद हो जाने को सामान्य मान लिया, यहां तक कि प्रशासनिक अधिकारियों ने भी उनकी खोज-खबर नहीं ली और उनकी मौत को लम्बा अरसा गुजरने के बाद भी उनके बैंक खाते में उनकी वृद्धावस्था पेंशन जमा करवाते रहे जबकि उनके खाते में कोई निकासी दर्ज नही थी। जब तक वो जीवित थीं वो नियमित रुप से अपने भाई के घर रात के खाने पर जाती थीं लेकिन अचानक से यह सिलसिला रुकने पर उनके भाई के परिवार को भी कभी उनका ख्याल नही आया।

 वर्ष 2011 में आखिरकार उनकी भाभी डजैविलेन ने न्यू साउथ वेल्स की पुलिस को दरख्वास्त लगाई की
नताली वुड का  घर जहां वो मृत पाई गईं थी
उनहोने नताली को आखरी बार वर्ष 2003 में अपने घर पर रात के खाने के दौरान देखा था जब उन दोनों में जमकर कहा सुनी हुई थी और उसके बाद से उनकी कोई खोज खबर नही है।

 डजैविलेन के आग्रह पर पुलिस उनको साथ लेकर नताली के घर में घुसी और तब उन्हें नताली के कमरे के फर्श पर हड्डियों का एक कंकाल मिला जिसकी पहचान बाद में नताली के रुप में हुई। शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला कि नताली वुड की मृत्यु को 8 वर्ष का समय हो चुका है और उसके कंकाल को उसके निकट संबंधी को सौंप दिया गया। 

कुछ दिनों बाद जांच के सिलसिले में पता चला कि नताली के बैंक खाते में 74,000 डॉलर की राशि जमा है और सिडनी जैसे बड़े शहर के उच्चवर्गीय इलाके में स्थित उनका पैतृक घर जहां उन्हे मृत पाया गया था, वो भी 1000,000 डॉलर से कम का नही है। इस तथ्य के जगजाहिर होते ही सरकार के पास उनकी संपत्ति के दावेदारों का मज़मा सा लग गया है। संपत्ति की खींचतान को लेकर कुछ लोग अदालत के दरवाजे पर जा पहुंचे हैं हांलाकि उनकी संपत्ति को सौंपे जाने के विषय में अभी तक कोई निर्णय नही लिया जा सका है। 

भारत में भी हुआ था ऐसा, मशहूर अभिनेत्री परवीन बॉबी की मौत के पांच दिन बाद उनकी मृत्यू का पता चला। फ्लैट से उनकी अपघटित होती लाश बरामद हुई थी

बीते ज़माने की मशहूर अभिनेत्री परवीन बॉबी का मृत शरीर उनकी मौत के पांच दिन बाद 22 जनवरी 2005 को मुम्बई के जुहू स्थित उनके फ्लैट से बरामद किया गया था। उनके घर के बाहर अखबार और दूध के पैकेट देखकर पड़ौसियों ने पुलिस को सूचना दे दी थी और उनकी मौत का पता चल गया।



तो यह था कुछ ऐसे लोगों का संकलन जिनका जीवन और मौत तो सूनेपन के सन्नाटे से भरे हुए थे पर उनकी कहानी आप औप हम जैसे करोड़ों लोगों के लिए दिलचस्प बन गई।
निधि रावत, ऑस्ट्रेलिया संवाददाता


पांच साल पहले ऑस्ट्रेलिया में हिट एंड रन केस में एक की जान लेने के बाद सजा से बचने के लिए भारत भाग आया था पुनीत, पर ऑस्ट्रेलिया पुलिस ने उसे भारत में भी ढूंढ निकाला, अब केस चलाने के लिए वापस ऑस्ट्रेलिया भेजने की तैयारी




पुनीत कुमार रावल को यह अहसास बुरी तरह डरा रहा है कि अगर उसे ऑस्ट्रेलिया भेज दिया गया तो वो वापस भारत कभी नहीं आ पाएगा। वो रो रहा है, पुलिस की मिन्नतें कर रहा हैं कि वो किसी भी हाल में ऑस्ट्रेलिया नहीं जाना चाहता। पुलिस को जो भी सुनवाई करनी है भारत में ही करे।

वो बार-बार कह रहा है कि वो उसे मारना नही चाहता था, उसने तो उसको देखा ही नही। हां ये उसकी ग़लती है कि उसने शराब पीकर तेज रफ्तार से गाड़ी दौड़ाई। उसकी ग़लती है वो मान रहा है। पर अब पांच साल बाद क्या पुनीत का ये मान लेना ही सब कुछ बदलकर वापस पहले जैसा कर सकता है। एक गलती की सज़ा से बचने के लिए उसने जो कई और गलतियां कर ली हैं, क्या वो सब ठीक हो सकती हैं। क्या पुनीत वाकई माफ़ी के लायक है? क्या उसे अपनी जिंदगी अपने ढ़ग से जीने के लिए आजाद कर देना चाहिए? आईए सही गलत के रास्तों में भटकने से पहले ये जान लेते हैं कि आखिर पांच साल पहले ऐसा क्या हुआ था कि अतीत पुनीत को तलाशता हुआ पंजाब के राजपुरा तक पहुंच गया।
पुलिस कर्मियों की भारी चहल-पहल के बीच पुनीत को राजपुरा न्यायालय लाया गया

इनसेट में पुनीत, हादसे का शिकार डीन हाफस्टी और पुनीत की क्षतिग्रस्त वी 8 गोल्डन कार
1 अक्टूबर, 2008: आधी रात के बाद लगभग 12 बजकर 50 मिनट पर 19 वर्षीय पुनीत ने ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर के साउथबैंक इलाके में सड़क पर जा रहे गोल्ड कोस्ट विश्वविद्यालय के नर्सिंग के दो छात्रों डीन हाफस्टी और क्लैंसी कोकर को अपनी वी8 होल्डन कार से कुचल दिया। हादसे में 19 वर्ष के डीन हाफस्टी की मौके पर ही मृत्यु हो गई जबकि 20 वर्षीय कोकर बुरी तरह से जख्मी हो गए। आरंभिक जांच में पता चला कि पुनीत 60 किमी प्रति घंटे के क्षेत्र में 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से कार चला रहे थे। इतना ही नही उन्होने लर्निंग लाइसेंस के नियमों का उल्लंघन करते हुए शराब भी पी हुई थी, जिसकी पुष्टि उनके खून के नमूनों से भी हुई।

2 अक्टूबर, 2008: शुरुआती पूछ ताछ में पुनीत ने कहा कि उसने एक्सीडेंट से पहले कोला में मिलाकर व्हिस्की के मात्र चार पैग पिए थे, पर गहन पूछ ताछ में उसने स्वीकार किया कि वो दोस्तों के साथ पार्टी के दौरान कई घंटो तक शराब पीता रहा था और इसी के कारण कार पर से उसका नियंत्रण बिगड़ गया था।

4 फरवरी, 2009: पुनीत को जानलेवा ड्राइविंग से हाफस्टी की जान लेने और कोकर को गंभीर रुप से घायल करने का दोषी पाया गया। उसके खिलाफ कोर्ट में एक चश्मदीद ने बताया कि उसकी गाड़ी की रफ्तार देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो खुदखुशी के मिशन पर घर से निकला हो। पुनीत को सख्त हिदायतों के साथ ज़मानत दी गई और उसे अपना पासपोर्ट कोर्ट में जमा कराना पड़ा।

मेलबोर्न कोर्ट के बाहर चेहरा छुपाते पुनीत

12 जून, 2009: पुनीत पर केस चलाए जाने के दौरान वो अपने दोस्त सुखचरनजीत सिंह के पासपोर्ट पर इंडिया भाग खड़ा हुआ।



20अगस्त, 2009: दो महीनों तक पुनीत के पुलिस को रिपोर्ट न करने पर पुलिस की छानबीन में ये बात सामने आई कि पुनीत लम्बे समय पहले ही ऑस्ट्रेलिया पुलिस को धत्ता बता कर वहां से भाग चुका है। कोर्ट ने तत्काल उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट ज़ारी कर दिया। उसके दोस्त सुखचरनजीत सिंह को हिरासत में ले लिया गया। पुनीत को भगाने में सहायता करने और उसे अपना पासपोर्ट मुहैया कराने के इल्ज़ाम में उस पर केस चलाया गया। बाद में उसे अठ्ठारह महीने की सख्त कैद हुई।


21 अगस्त, 2009: विक्टोरिया राज्य के मेलबोर्न में हुए इस हादसे के दोषी को पकड़ने के लिए विक्टोरिया सरकार ने घोषणा की कि किसी भी कीमत पर पुनीत को भारत से वापस लाया जाएगा। लेकिन सरकार के आगे सारे रास्ते रुके हुए थे क्योंकि ऑस्ट्रेलिया और भारत के मध्य कोई प्रत्यर्पण संधि नही थी। लोक अभियोजन के निदेशक ने यह बात साफ की कि ऑस्ट्रेलिया पुलिस अगर भारत में पुनीत का पता लगा लेती है तो वो भारत से प्रत्यर्पण संधि के विषय में बात चलायेंगे।

उसके बाद से ऑस्ट्रेलिया स्थित एम.सी.आई.यू के जासूसों ने पुनीत को भारत में तलाशने में कोई कोर कसर बाकी नही रखी। उन्हे हमेशा ये उम्मीद थी की वो पुनीत को पकड़ लेंगे और डीन हाफस्टी के माता पिता को इंसाफ दिलायेंगे, जिन्होंने कि बड़ी ही हिम्मत और सब्र के साथ पुनीत के पकड़े जाने का इंतजार किया है।

पुलिस को हमेशा से ही विश्वास था कि पुनीत भारत में कहीं काम कर रहा है और सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है। पुलिस को ये भी अंदेशा था कि वो अकसर ऑस्ट्रेलिया में रह रहे अपने दोस्तों से फोन पर बात किया करता है और विक्टोरिया में ऐसे कई लोग मौजूद हैं जो ये जानते हैं कि वो भारत में कहां है। इतना ही नही विक्टोरिया की यातायात पुलिस ने वर्ष 2012 में पुनीत को पता बताने वाले के लिए 100,000 डॉलर के ईनाम की घोषणा भी की।

आखिर 2013 में भारत स्थित ऑस्ट्रेलियाई फेडेरल पुलिस अधिकारी रिचर्ड मोसेस और इंटरपोल की सहायता से एम.सी.आई.यू के जासूसों की मेहनत रंग लाई और 29 नवम्बर 2013 को हरियाणा में पानीपत के छोटे से होटल रीजेंसी से पुनीत को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया जब वो अपने माता पिता गीता रानी और नरेश कुमार रावल सहित कई रिश्तेदारों के साथ उस लड़की के परिवार से मिलने पहुंचा था जिससे वो शादी करने वाला था।

पुनीत को क्या पता था कि जिस हादसे को हादसा मान कर वो अपने अतीत में पीछे छोड आया है वो उससे आगे निकल कर उसका इंतजार कर रहा है। वो तो भारत आने के बाद नोएडा में बसने का उपक्रम कर चुका था। इतना ही नही उसने इस दौरान गुडगांव स्थित एक बीपीओं में नौकरी भी कर ली थी। अब तो बस कमी घर बसाने की थी जिसकी राह टोहता हुआ वो पुलिस के हाथों आ पहुंचा था।

पुनीत का परिवार चंढीगड़ के सटे हरियाणा के शहर पंचकुला के सैक्टर 15 में बसा हुआ है। उसके पिता एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। लेकिन लम्बी बीमारी के कारण उनका कईं सालों से घर से निकलना लगभग बंद है। पुनीत की मां गीता रानी एक फैक्टरी में काम करती हैं और उसकी बहन दसवीं कक्षा की छात्रा है। पुनीत को उसके माता पिता ने अच्छे और कामयाब भविष्य की तलाश में ऑस्ट्रेलिया पढ़ने भेजा था। पर हाय री किस्मत! पुनीत वहां से उनके लिए अच्छी खबर की सूरत में अपनी जान बचा लाया और साथ लाया कानूनन अपराधी का तमगा।

पुलिस के हिरासत में लेते ही पुनीत को उस गलती का पछतावा और एहसास सताने लगा जिसे वो आराम से भूलने में कामयाब रहा था। उसने पुलिस वालों को दुनियाभर की दुहाई दे डाली। वो कहता रहा कि वो महज़ एक हादसा था और ऐसे हादसे होते रहते हैं। पर अपने अंदर उसे पता चल चुका था कि अब वो और नही भाग पाएगा। फिलहाल वो जेल में बंद है। उसने भारत सरकार को गुहार लगाई है कि वो ऑस्ट्रेलिया नही जाना चाहता वहां उसकी जान को खतरा है। वो भारत में ही रहकर न्यायिक जांच कराने की मांग कर रहा है।

सच ही है ऑस्ट्रेलिया में ऐसे हादसे भूल जाने के लिए नही होते। हमारे देश की समायोज्य और लचीली कानून प्रक्रिया की तुलना में वहां के कानून सख्त हैं और वर्ष 2011में भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य हुई प्रत्यर्पण संधि के बाद पुनीत को ऑस्ट्रेलिया पुलिस को सौंप दिया जाना महज़ वक्त की बात है। वहां वो यातायात के नियमों का उल्लंघन करने का दोषी तो है ही साथ ही वो एक गैर-मकसद खूनी, धोखेबाज़ और फरार मुज़रिम भी है जिसका इंतजार हाफ्स्टी परिवार लम्बे समय से कर रहा है।

निधि रावत

रंग-ए-जहान

क्या यह मुकम्मल मोहब्बत की दास्तान है... ??


ताज्जुब होता है, कोई कैसे अपनी मोहब्बत को इतने ज़ख्म दे सकता है। 

17 साल पहले किसी चाहने वाले की सनक ने तेजाब से ‘मुस्कान’ का सबकुछ छीन लिया। मुस्कान आज मुस्कुराते हुए भी रोती हुई नज़र आती है।

वायएमसीए में एक दोस्त से मिलने गया था। दोस्त को आने में देर हो गई। तभी मेरी निगाह एक अजनबी से चेहरे पर पड़ी...।उसने अपना चेहरा आधा ढका हुआ था। कुछ अलग नज़र आया तो मैंने उसकी एक तस्वीर खींच ली। तभी वो मेरे पास आई और बोली.. मेरी तस्वीर दिखाओ, आजतक किसी ने मेरी तस्वीर नहीं खींची।



मैं समझ गया क्यों। जब मैंने उसे तस्वीर दिखाई तो भरे हुए गले से हंसने लगी। बोली- आप राजस्थान से हो.. मैंने कहा हां.., और वो मुस्कुराते हुए मुझसे बात करने लगी। उसका चेहरा देखकर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। मैंने पूछा- क्या भीख मांगने के लिए तुमने अपने आपको ऐसा किया है? मुस्कान बोली.. नहीं साहब, मेरे चाहने वाले ने मेरी ज़िंदगी खराब कर दी। आजतक उसी के दिए ज़ख्मों को ठीक करने की लड़ाई लड़ रही हूं। 


इससे पहले कि कुछ और पूछता वो खुद ही बोली...17 साल पहले मैं भी सुंदर थी। मेरा भी घर था। भरा-पूरा परिवार था। लेकिन आज मुझे कोई नहीं पूछता सिवाय मेरे सड़क पर रहने वाले दोस्तों के।

 


रूप कितना ज़रूरी है, इसका जवाब उसने बिना पूछे दे दिया। बताया..गांव वालों ने, समाज ने इसलिए गांव से निकाल दिया क्योंकि बच्चे डरते थे मेरी शक्ल देख कर।.. खैर साहब आप पत्रकार हैं? मैंने कहा.. दोस्त, बस तस्वीरों से ज़िंदगी बयां करता हूं..? मुस्कान ने पूछा..आप मेरी तस्वीरें दुनिया को दिखाओगे? मैंने कहा.. ज़रूर। इसलिए आपके सामने चाहने वाले द्वारा दिए गए ज़ख्मों की सच्चाई चंद तस्वीरों में बयां की है..



अमित कुमार शर्मा
फोटो जर्नलिस्ट
हमेशा अपना कैमरा साथ लेकर घूमने वाले अमित ज़िंदगी के रंगों को तस्वीरों में उतारते हैं। उनके द्वारा ली गईं ऐसिड विक्टिम की तस्वीरें और उसकी दास्तान ही आपने ऊपर पढ़ी है



ऐसा क्यों...?

नेता कहते हैं कि एवरेस्ट पर जाना क्या बड़ी बात है, इसके लिए तुम्हें सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती। एवरेस्ट पर जाने वाली एक लड़की को तो डीएसपी बना दिया और मैं सब्ज़ी बेच रहा हूं। ऐसा क्यों? सरकार को हमारी कदर नहीं...कहते हैं रामलाल शर्मा जो एवरेस्ट फतह करने के बावजूद सब्जी का ठेला लगाने को मजबूर हैं



हरियाणा के फतेहाबाद जिले में टोहना कस्बे के निवासी 24 वर्षीय रामलाल ने 21 मई 2013 को नेपाल में एवरेस्ट की चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराया था। उनकी इस शानदार उपलब्धि के लिए भूपेन्द्र सिंह हुड्डा सरकार ने उन्हें पांच लाख रुपए का नगद ईनाम देने की घोषणा की थी। 

लेकिन उन्हें आज तक सरकार से एक रुपया तो दूर वो पहचान तक नहीं मिली है जिसके कि वो हकदार है। उनके साथ ही एवरेस्ट फतह करने वाली दो महिलाओं कान्ता और रजनी के लिए भी ईनाम की घोषणा की गई थी लेकिन उन दोनों को भी सरकार ने अब तक कुछ भी नहीं दिया है। यहीं नहीं रामलाल द्वारा उन्हें सरकारी नौकरी दिलाए जाने की अपील को भी राज्य प्रशासन ने ठुकरा दिया है।

रामलाल बताते हैं कि उन्हें ईनाम की दरकार इसलिए ज्यादा है क्योंकि उनके पिता रीढ़ की बीमारी के कारण पूरी तरह से बिस्तर पर हैं, जिनके इलाज और रोज़ी रोटी चलाने के लिए उन्हें पैसे की सख्त ज़रूरत है। हांलाकि रामलाल खेल विज्ञान में स्नातक हैं और शारीरिक शिक्षा में डिप्लोमा भी प्राप्त कर चुके हैं, लेकिन चूंकि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती सिर्फ इसलिए उन्हें ढंग की प्राइवेट नौकरी भी नहीं मिलती। इसलिए मजबूरन रामलाल को ठेले पर सब्ज़ियां बेचनी पड़ रही हैं। 

राज्य सरकार द्वारा उपेक्षा के शिकार रामलाल को इस बात की नाराज़गी है कि उन्हें वो सम्मान और ईनाम नहीं दिया गया जो हर एवरेस्ट विजेता को मिलता है। उनके अनुसार वो इस सिलसिले में गांव के सरपंच से लेकर राहुल गांधी तक से मिल चुके हैं। लेकिन हर कोई उन्हें सिर्फ आश्वासन दे देता है कि उनके मामले में ज़रूर कुछ किया जाएगा। उनके राज्य के बहुत से नेता जिनके सामने रामलाल कई बार गुहार लगा चुके हैं, अब तो यह कहने लगे हैं कि एवरेस्ट पर चढ़ना कौन सी बड़ी बात है, तुमने एवरेस्ट पर चढ़ाई कर ली तो क्या अजूबा कर दिया।

 रामलाल को इस रवैये से सख्त ऐतराज़ है, वो कहते हैं कि- नेता  कैसे इसे छोटी बात मान सकते हैं, अगर कोई भी एवरेस्ट चढ़ सकता हैं तो वो चढ़ कर दिखाएं ना। सिर्फ बेस कैम्प तक ही पहुंच कर दिखा दें..।



रामलाल बताते हैं कि एक अन्य पर्वतारोही ममता सोढ़ा जिन्होंने कुछ समय पहले एवरेस्ट फतह किया था, को 21 लाख रुपए के ईनाम के साथ डीएसपी का पद दिया गया है, अभी हाल में ही उन्हें पद्मश्री भी मिला है। तो ऐसा भेदभाव क्यों कि सिर्फ एक ही पर्वतारोही की उपलब्धियों को मान दिया गया और अन्य लोगों की उपलब्धि को कोई उपलब्धि मानने तक को तैयार नहीं। यह तो राज्य की  प्रतिभाओं को उत्साहित करने की बजाय निराश करने वाली बात है।
  
हरियाणा के खेल एवं युवा मामलों के डायरेक्टर जनरल सुधीर राजपाल का कहना है कि रामलाल को ईनाम देने के लिए ज़रूरी सत्यापन आदि की प्रक्रिया चल रही है, एक बार वो पूरी हो जाए उसके बाद रामलाल को उनका 5 लाख रुपए का ईनाम दे दिया जाएगा। लेकिन उनके अनुसार रामलाल की सरकारी नौकरी के लिए सिफारिश नहीं की जा सकती क्योंकि यह सिर्फ प्रतियोगी खेलों में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के मामले में किया जाता है।

हांलाकि रामलाल यह नहीं समझ पा रहे हैं कि लगभग 9 महीने गुज़र जाने के बाद भी अभी तक उनका सत्यापन क्यों नहीं हो पाया और जब पदक नहीं जीतने के बावजूद सिर्फ एवरेस्ट फतह करने के आधार पर ममता सोढ़ा को डीएसपी बनाया जा सकता है तो फिर उन्हें सरकारी नौकरी क्यों नहीं दी जा सकती।
हिन्द प्रहरी संवाददाता

क्या आपके बच्चे जानते हैं, साड़ी का फॉल क्या होता है.... किशोर वय के बच्चों को भी नहीं मालूम इसका मतलब, किसी ने पल्लू को कहा साड़ी का फॉल तो किसी ने साड़ी पर लगी लेस को ही साड़ी का फॉल बता दिया...




आजकल फिल्म आर राजकुमार का एक गाना बड़ा चल रहा है... साड़ी के फॉल सा कभी मैच किया रे...।
 

लखनऊ के स्टैला मैरिस स्कूल में आठवीं कक्षा की छात्रा नविका को भी यह गाना बेहद पसंद है। पूरे समय यहीं गाती रहती है। एक दिन कक्षा में उसी के साथ पढ़ने वाले आर्यन ने पूछ लिया- तू दिन भर यह साड़ी का फॉल सा.. गाना गाती रहती है, तुझे पता भी है, साड़ी का फॉल होता क्या है? नविका चुप.., थोड़ी देर सोचने के बाद बोली- जो कुछ-कुछ साड़ियों पर लेस लगी रहती है ना, उसे साड़ी का फॉल कहते हैं। आर्यन हंसने लगा- “नहीं पागल वो साड़ी का फॉल नहीं होता।” “ तो फिर मुझे नहीं पता”। आर्यन ने पूरी क्लास से पूछा, किसी को पता है इसके बारे में.. पूरी क्लास चुप। तब आर्यन ने नविका को बोला “ठीक है अपनी मम्मी से पूछ कर आना ।”

घर जाकर नविका ने मम्मी को सारी बात बताई और उनसे पूछा कि साड़ी का फॉल क्या होता है? मम्मी ने कहा- मैं तो तुझे बता दूंगी लेकिन जब तेरी पूरी क्लास को नहीं पता तो आर्यन को कैसे पता है। तू पहले आर्यन से पूछना कि उसे पता है साड़ी का फॉल क्या होता है।

दूसरे दिन नविका ने पूरी कक्षा के सामने आर्यन से पूछा कि तुझे तो पता है ना, तो तू ही बता दे साड़ी का फॉल क्या होता है? आर्यन तुरंत अपने कंधे पर हाथ मारते हुए बोला- देख यहां से जो साड़ी नीचे गिरती है ना, उसे साड़ी का फॉल कहते हैं...... ;-) (जिसे दरअसल पल्ला कहा जाता है)।

मत पूछिए जब नविका ने यह बात अपनी मम्मी को बताई तो उनका हंसते-हंसते क्या हाल था। तब उन्होंने नविका को साड़ी दिखाई और बताया कि साड़ी का फॉल दरअसल साड़ी के नीचे, साड़ी से मिलती जुलती एक चौड़ी पट्टी होती है जो साड़ी पर इसलिए लगाई जाती है ताकि उसमें थोड़ा भार आ जाए। एक समय था जब हमारी मम्मियां घर पर साड़ी में में फॉल टांका करती थी और हम जानते थे कि फॉल क्या होता है। लेकिन आजकल एक तो वैसे ही साड़ी पहनने का फैशन कम होता जा रहा है और अगर साड़ी तैयार करवाई भी जाती है तो उसे फॉल लगवाने के लिए बाहर भेज दिया जाता है। शायद यहीं वजह है कि बच्चे जानते ही नहीं फॉल क्या होता है। एक बार आप भी अपने बच्चों से पूछ कर देखिए... ।

हिन्द प्रहरी संवाददाता

“मैं जीना चाहती हूं”

खातीजा अकबर द्वारा लिखी गई मधुबाला की जीवन की कहानी द स्टोरी ऑफ मधुबाला से चुने हुए अंश



हिन्दी फिल्मों की बेहतरीन अभिनेत्री मधुबाला जिनको सभी पसंद करते हैं, दादा-दादी की पीढ़ी से आज के जेट युग की पीढ़ी तक के लोग। उनका जन्म 14 फरवरी, 1933 को हुआ था। 14 फरवरी यानि वो दिन जिसे हम आजकल वैलेंटाइन डे के रूप में मनाते हैं। लेखिका खातीजा अकबर ने उनकी ज़िंदगी के ऊपर एक किताब लिखी है जिसमें से कुछ अंश हम आपके लिए चुनकर लाए हैं, जिससे आप भी जान सकें कि यह शानदार शख्सियत दरअसल क्या थीं और उनकी ज़िंदगी में क्या और कैसे घटा..


मेरे छोटे से मन में,छोटी सी दुनिया रे....

ये गीत सभी की जुबान पर चढ़ गया। बिना संकोच के बेहद सहजता से कैमरे के सामने,बिना जल्दबाजी किए - जो कि सभी बाल कलाकारों के लिए भारी मुसीबत होता है - मधुबाला ने अपनी पहली फिल्म को एक दक्ष नाविक के समान खेया , उसका आत्मविश्वास प्रचुर प्रतिभा का प्रमाण था।
पृष्ठ संख्या 44


पूरा परिवार उन पर आश्रित था...

व्यावसायिक तौर पर किशोर आयु में ही मधुबाला लोगों के लिए ईर्ष्या का पर्याय हो गई थीं। लेकिन ये स्थिति उनके लिए किस्मत का तोहफा नहीं बल्कि उनके अथक परिश्रम का उपहार था। उन्होंने आठ वर्ष की उम्र से फिल्मों में काम करना शुरू किया, इस बात से पूरी तरह सचेत कि उनके परिवार और उनकी भलाई उनपर आश्रित है। इस तथ्य ने उनके स्वभाव को सही वक्त से कहीं पहले परिपक्व बना दिया और यह बात किसी के लिए भी आश्चर्य से कम नही कि जब उन्होने फिल्मों में काम करना बंद किया तो उनकी आयु मात्र सत्ताईस वर्ष थी।
पृष्ठ संख्या 61


दिल दे दिया सह कलाकार को...

निजी तौर पर तराना फिल्म को साइन करने के साथ ही नवयुवा और चुलबुली मधुबाला ने खुद को एक ऐसे मोड़ पर ला छोड़ा था, जहां से कदम सिर्फ एक ही दिशा में जा सकते थे। उन्होने अपना दिल तराना के अपने सह कलाकार को दे दिया, और ये उम्रभर का सच था.... दुनिया से आगे जिस रास्ते को उन्होने प्रेम और आनंद से सजाया वो जाके चरम दुख, क्रांति और सदमे पर थमा।
पृष्ठ संख्या 105


चलचित्र की कहानी सरीखा था दिलीप साहब और मधुबाला का प्यार
मधुबाला और दिलीप कुमार के प्यार में दिलचस्प चलचित्र के सभी अवयव तत्व मौजूद थे। सुंदरता का उत्कर्ष, अनुराग, गलतफ़हमी, नफ़रत, अदालत का दृश्य और सबसे चरम.. दिलों के टूटने की झनकार। नहीं था तो केवल यह -कि ये कोई परिकल्पना नही थी। यह सभी कुछ बेहद वास्तविक था। और जब ये अपने विनाशकारी अंत पर पहुंचा, तो इसके सभी किरदारों पर इस तूफान के अमिट निशां ही शेष बचे।
पृष्ठ संख्या 39


मुझे जीने दो भगवान...

अपनी मौत से कुछ दिन पहले मधुबाला बुदबुदा रही थीं: “अल्लाह मैं मरना नहीं चाहती। मैं जीना चाहती हूं...... भगवान मुझे जीने दो।” फिर भी उनकी रुह उन्हें छोड कर चली गई। 14 फरवरी को अपने छत्तीसवें जन्मदिन के नौ दिन बाद 23 फरवरी 1969 को मधुबाला अपनी जिंदगी के संघर्ष में हार गईं।
पृष्ठ संख्या 226


ऐसे लोग मरते नहीं...

इस दुनिया में ऐसे कुछ ही लोग हैं जिन्हें हम उनकी जिंदादिली, मुस्कुराहट और खिलखिलाहट में हमेशा याद रखना चाहते हैं। आप उनकी कभी मृत कल्पना कर ही नही सकते। वे हमेशा के लिए जीते हैं और हमेशा तक जीते हैं। मधुबाला उन्ही लोगों में से एक नाम है।
पृष्ठ संख्या 226

संकलन- निधि रावत



लक्ष्मी को मिल गई मोहब्बत..! आलोक को उसकी मासूमियत और हिम्मत के आगे उसका तेजाब से झुलसे चेहरा कहीं नज़र नहीं आता। स्टॉप एसिड अटैक कैम्पेन के ज़रिए साथ आए आलोक और लक्ष्मी कहते हैं.. ज़िंदगी भर साथ रहेंगे...



लक्ष्मी की ज़िंदगी में मोहब्बत बन कर आए हैं आलोक दीक्षित। स्पॉट एसिड कैम्पेन के ज़रिए एसिड अटैक का शिकार बनी लड़कियों की सहायता करने वाले और लोगों में इसके प्रति जागरूकता जगाने वाले आलोक दीक्षित की लक्ष्मी से मुलाकात 2012 में हुई थी। और कुछ ही महीनों में दोनों के बीच प्यार ने जड़े जमा लीं।

हम और आप जैसे लोगों को कुछ अजीब लग सकता है... आज के ज़माने में जब खूबसूरती को किसी भी रिश्ते के लिए बहुत बड़ी चीज़ माना जाता है, ऐसे में 25 साल के आलोक ने लक्ष्मी  के तेजाब से जले चेहरे को नकारते हुए उसकी खूबसीरत से प्यार किया। वहीं लड़कों की फितरत और ज़माने की अच्छाईयों से विश्वास खो चुकी 24 साल की लक्ष्मी को भी आलोक के निडर व्यक्तित्व और स्पष्टता ने फिर से ज़िंदगी से प्यार करना सिखा दिया।   

इन दोनों का प्यार बहुत खूबसूरत है। हमने जब इस रिश्ते के बारे में जानने के लिए इनसे मुलाकात की तो यह दोनों पूरे समय साथ ही बैठे रहे। पूरी बातचीत के दौरान कभी लक्ष्मी आलोक को समझा रही थीं, तो कभी आलोक लक्ष्मी को। दोनों एक दूसरे को थाम रहे थे, सही कर रहे थे, समझा रहे थे, बीच में रोक रहे थे और प्यार से डपट भी रहे थे...। दोनों, खासतौर से लक्ष्मी तो अपने प्यार की शुरुआत के दिनों के बार में बात करती हुई बेहद उत्साहित थी। उनसे हुई बातचीत के कुछ खास अंश उन्हीं की ज़ुबानी आपके लिए-


लक्ष्मी (आलोक का हाथ पकड़ कर)- सब इनसे बहुत डरते थे। यह बहुत कम बोलते थे ना और बाबा टाइप भी थे। जब सुप्रीम कोर्ट में हमारा केस चल रहा था तो सब लोग आपस में गले मिले। लेकिन इनको गले लगाने की हिम्मत किसी में नहीं हो रही थी। तब मैं ज़बरदस्ती इनसे गले मिली।

आलोक- जब 17 मई 2013 को यह पहली बार हमसे मिलने आई थी तो हमें बड़ा अच्छा लगा। इसने औरों की तरह चेहरा नहीं ढका हुआ था। बड़ी हिम्मत से बातें कर रही थी। फिर जब यह कैम्पेन से जुड़ गई तो फिर हम रोज़ मिलने लगे। हमारी मीटिंग में कई बार लोग बातें करते रहते थे और हम एक ही कमरे में बैठे फोन पकड़कर आपस में वॉट्स अप पर चैटिंग करते रहते थे।

लक्ष्मी- एक बार ना क्या हुआ मैं बाहर थी और यह अन्दर काम कर रहे थे। मैं खांस रही थी तो इन्होंने काढ़ा बनाया और मुझे दिया। तब पहली बार इन्होंने मुझसे कहा- लक्ष्मी यह सब जो हमारे बीच हो रहा है ना सही नहीं हो रहा...। यह ऐसे कहे जा रहे थे और मेरे मन में लड्डू फुट रहे थे। (आलोक मुस्कुराते हुए लक्ष्मी से कहते हैं- लक्ष्मी लड्डू फुटते नहीं हैं, फूटते हैं...)

आलोक- (लक्ष्मी के सिर पर हाथ रखते हुए) हमने भी नहीं सोचा था ऐसा कुछ होगा पर क्या करें अब तो हो गया। हमें इनकी मासूमियत बहुत पसंद है। यह बिल्कुल बच्चों जैसी हैं। और बहुत हिम्मत वाली हैं। किसी से डरती नहीं।

लक्ष्मी (सामने एक कमरे की तरफ इशारा करते हुए)- वो रूम देख रही हैं। वो हमारे प्यार का गवाह है। वहां इन्होंने हमें 7 अगस्त 2013 को प्रपोज़ किया था।

आलोक- हम तो कानपुर से हैं। पहले पहल मम्मी पापा को परेशानी हुई थी कि हम लक्ष्मी को पसंद करते हैं लेकिन उन्हें मालूम था कि हम उनकी सुनने वाले तो हैं नहीं। वहीं करेंगे जो करना है, तो अब उन्होंने भी धीरे-धीरे लक्ष्मी को अपनाना शुरु कर दिया है। बाकी रिश्तेदारों से हमें कोई मतलब नहीं।

लक्ष्मी- भले ही हमारी औपचारिक शादी नहीं हुई लेकिन हम दोनों तो खुद को शादीशुदा ही मानते हैं। हमें साथ रहने के लिए किसी सामाजिक बंधन की ज़रूरत नहीं हैं। मैं इन्हें प्यार करती हूं, यह मुझे प्यार करते हैं, बस यहीं ज़रूरी है।

आलोक- हमें बच्चे-वच्चे करने हुए, परिवार बनाना हुआ, तो उसके लिए शादी की क्या ज़रूरत है। हम तो बल्कि इसके लिए भी कैम्पेन चलाने वाले हैं कि दो प्यार करने वालों को साथ रहने के लिए, परिवार बनाने के लिए शादी की ज़रूरत नहीं है। मर्ज़ी होनी चाहिए बस।

लक्ष्मी (आलोक का हाथ कसकर पकड़ते हुए) यह मुझे छोड़कर कभी जा ही नहीं सकते। मैं जाने ही नहीं दूंगी और यह कभी जाएंगे भी नहीं।

आलोक (लक्ष्मी की तरफ देखते हुए मुस्कुराते हुए) हां बाबू हमें पता है तुम नहीं जाने दोगी। हम भी तुम्हें नहीं जाने देंगे...।

और मैं... बुत बनी, चेहरे पर मुस्कान लिए इन दोनों की देख रही थी...इनकी बातें सुन रही थी और सोच कर रही थी... प्यार क्या ऐसा होता है...? हां प्यार ऐसा ही होता है...। पता नहीं आगे जाकर यह रिश्ता क्या रंग ले लेकिन फिलहाल तो इसमें सिर्फ प्यार का रंग है और वो हर कोई महसूस कर सकता है। 
दिल्ली से चित्रलेखा अग्रवाल