Tuesday, 18 February 2014

एक मुस्लिम महिला की जीवटता की दास्तान- केरल के समुद्र तट पर अवैध रेत खनन को रोकने की मांग लिए अपने तीन बच्चों के साथ दो महीने से जंतर मंतर पर धरना दे रही है जसीरा




दिल्ली में जंतर-मंतर धरना- प्रदर्शन और रैलियों के लिए बखूबी जाना जाता है। अभी हाल ही में एक धरने के सिलसिले में फिर से जंतर-मंतर जाना हुआ। शाम 7 बजे कुछ खाने की इच्छा से मैं और मेरे कुछ साथी केरल हाउस की ओर चलने लगे।

केरल हाउस के गेट पर एक टैंट में एक मुस्लिम महिला बुर्का पहने अपने छोटे बच्चे के साथ खेल रही थी। उस टेंट के बाहर एक बैनर लगा था जिस पर लिखा था “केरल के रेत माफियाओं को समुद्र में फेंक दो”.. उसके पास ही एक बड़ी लड़की, दो छोटी लड़कियों को यह वाक्य पढ़ने में मदद कर रही थी।

अब चूंकि जंतर मंतर पर तो हमेशा बहुत से धरना प्रदर्शन होते रहते हैं और सबको गंभीरता से नहीं लिया जा सकता, इसलिए सोचा ऐसे ही इस महिला से बात कर ली जाए। जब हमने उस महिला से बात करने की इच्छा जाहिर की तो उसने बताया कि उसे ना तो अच्छी तरह से अंग्रेजी आती थी और ना ही हिन्दी। पर मेरे एक केरल के साथी ने बताया कि वो मलयालम समझता है और बोलता भी है। तब उस साथी की सहायता से महिला से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

उस महिला का नाम जसीरा था। उसने बताया कि वो अपने तीन बच्चों के साथ इस टेंट में रह रही है। और फिर शुरू हुई संघर्ष की वो कहानी जिसे सुनकर लगा कि इतनी हिम्मत और ताकत हम सबमें क्यों नहीं।

31 वर्ष की जसीरा केरल के कन्नूर जिले के एक तटवर्ती गांव पुथियांग्दी में पैदा हुई और वहीं पली बढ़ी। ज़िंदगी में कुछ भी अनोखा नहीं। 17 साल की उम्र में उसकी शादी हो गई। शादी के बाद 6 साल तक जसीरा अपने पति की मारपीट सहती रही। इसी दौरान दो बच्चे भी हो गए लेकिन मारपीट का सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ। आखिरकार एक दिन उसने ठान लिया कि वो अब नहीं सहेगी। अपनी बड़ी बेटी को अपने साथ लेकर और अपनी छोटी बेटी को मां के पास छोड़कर वो घर से भाग गई।

जसीरा एर्नाकुनल पहुंच गई और यहां लोगों के घर में काम करने लगी। फिर कुछ दिनों तक उसने कोट्टायम में किताबें भी बेची। उसे एक प्रकाशक ने स्थानीय सेल्स एजेंट की नौकरी दे दी थी। किताबों की मार्केटिंग के दौरान उसे थाने, कोर्ट और सरकारी कामकाज की जानकारी होने लगी। उसके घरवालों ने उससे कहा कि वो वापस कन्नूर आ जाए। इस पर जसीरा ने शर्त रखी कि अगर उसका पति उसे तलाक देगा तभी वो लौटेगी। जसीरा की ज़िद के चलते उसके पति ने उसे तलाक दे दिया और वो घर लौट आई।

कन्नूर में एक मुस्लिम महिला को ऑटो चलाते देखकर जसीरा ने भी यहीं काम करने का निर्णय लिया। उसने ऑटो चलाने का प्रशिक्षण लिया, लाइसेंस बनाया और प्रधानमंत्री रोजगार योजना की मदद से ऑटो खरीद कर उसे चलाना शुरू कर दिया। लेकिन बुर्के में एक महिला को रिक्शा चलाता देखना वहां के लोगों को हज़म नहीं हुआ। पुरुष ऑटो रिक्शा चालकों ने पुलिस से शिकायत करके उसका रिक्शा चलवाना बंद करवा दिया। लेकिन जसीरा कहां हार मानने वाली थी।

वो तिरुअनंतपुरम जाकर मुख्यमंत्री से मिली और पुलिस की शिकायत की। समस्या हल हो गई लेकिन जसीरा का मन फिर कन्नूर में नहीं लगा। वो कोट्टायम चली आई और वहां ऑटो चलाना शुरू किया। यहीं उसने एक मदरसा शिक्षक अब्दुल सलाम से शादी भी कर ली। अपने तीसरे बच्चे की पैदाइश के लिए उसे फिर से कन्नूर अपनी मां के पास जाना पड़ा और फिर यहीं से रेत माफिया के खिलाफ उसकी लड़ाई की शुरूआत हुई।




समुद्र के जिस किनारे पर बचपन में जसीरा खेला करती थी, वो अब वहां नहीं बचा था। रेत माफियाओं ने उस तट को पूरा का पूरा खत्म कर दिया था। उसके घर के आस-पास के लोगों की तरह उसका भाई भी रेत के खनन में लगा हुआ था। तो ज़ाहिर है जसीरा की लड़ाई घर से ही शुरू हुई। उसने अपने भाई से कहा कि यह काम छोड़कर कोई और काम करे।

गर्भवती जसीरा दिन-रात समुद्र के किनारे से रेत ले जाते हुए ट्रकों का फोटो खींचा करती थी। उसने खनन में लगे लोगों के फोटो और उनके खिलाफ काफी सारे सबूत इकट्ठे किए और स्थानीय पुलिस को दिए जिसके चलते पुलिस को कार्यवाही करने पर मजबूर होना पड़ा। इसी दौरान जसीरा का बेटा भी हो गया लेकिन उसने आराम करने के बजाय रेत माफिया के खिलाफ लड़ाई को तवज्जो दी।

वो रात में तट पर जाती थी, फोटी खींचती थी, पुलिस को फोन करती थी और यहां तक कि बार-बार स्थानीय थाने, पंचायत और जिला प्रशासन को भी लिखित शिकायत लिखती रहती थी। रेत माफिया से दुश्मनी के चलते उसके घर पर तीन बार हमला हुआ। जसीरा को चौतरफा विरोध झेलना पड़ा। उसको और उसकी बड़ी बेटी को स्थानीय लोगों ने पीटा भी क्योंकि उनकी आमदनी भी अवैध खनन रुकने के कारण प्रभावित हो रही थी। लेकिन उसकी शिकायतों और मेहनत के चलते रेत माफियाओं ने ज़रूर वो तट छोड़कर दूसरे तट पर अवैध खनन शुरू कर दिया था।

जसीरा को यह भी मंज़ूर नहीं था क्योंकि उसका मकसद सिर्फ उसके घर के पास वाले तट को बचाना नहीं बल्कि समंदर के किनारों को रेत माफिया से मुक्त कराना था। जसीरा ने 14 जून 2013 को अवैध रेत खनन को बंद करने की मांग को लेकर अपने गांव के थाने के सामने धरना देना शुरू कर दिया। अपने नवजात बच्चे और दो लड़कियों के साथ वो दिन रात धरने पर बैठी रहती थी। रात में सोने या बारिश से बचने के लिए चारों थाने के पास ही एक दुकान के बरामदे में चले जाते थे। हफ्ते भर तक यही सिलसिला चलता रहा। फिर कुछ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने उसका साथ दिया। आखिरकार डीएम ने जसीरा को बातचीत के लिए बुलाया और उसकी शिकायत पर ठोस कार्यवाही करने का आश्वासन भी दिया। लेकिन जब कई दिन बीत जाने पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई और अवैध रेत खनन जारी रहा तो उसने 10 जुलाई से फिर से कलैक्ट्रेट पर धरना देना शुरू कर दिया। परिणामस्वरूप 8 दिन बाद जिला प्रशासन उस क्षेत्र में 24 घंटे निगरानी के लिए एक पुलिस पोस्ट बनाने पर सहमत हुआ।

जसीरा को लगा कि वो यह लड़ाई जीत गई लेकिन जल्दी ही उसे समझ में आ गया कि उसके साथ धोखा हुआ है। पुलिस पोस्ट तो बन गई थी लेकिन पुलिसवाले यह कहने लगे कि हमारा काम सिर्फ डेढ़ किलोमीटर क्षेत्र में होने वाले खनन को रोकना है और उसके आगे हम कुछ नहीं करेंगे।

जसीरा जान गई थी कि लड़ाई अभी बहुत लम्बी चलनी है। उसने अपने बच्चों को साथ लिया और तिरुवनंतपुरम चल दी। अपने संघर्ष के अगले दौर में उसने 2 अगस्त से सचिवालय के सामने धरना देना शुरू कर दिया। इस दौरान पति ने भी जसीरा का साथ दिया। एक मुस्लिम महिला का अपने तीन बच्चों के साथ यह सत्याग्रह वहां के कई अखबारों की सुर्खियां बना। कई पर्यावरणविद और मानव अधिकार कार्यकर्ता उसके समर्थन में आए। तीन दिन बाद मुख्यमंत्री ओमेन चेंडी ने उसे बातचीत के लिए बुलाया और उसकी शिकायत पर कार्यवाई का आश्वासन भी दिया पर उन्होंने लिखित में कुछ भी देने से इनकार कर दिया। इस पर जसीरा ने भी अपना धरना जारी रखा। उसने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को भी इस मामले से अवगत कराया।

जसीरा की लड़ाई अब दिल्ली पहुंच चुकी है। पिछले एक महीने से वो जंतर-मंतर पर केरल के इस रेत माफिया के ख़त्म करने के इरादे से अपने बच्चों के साथ डटी हुई है। जसीरा की 13 साल की बेटी रिज़वाना और 9 वर्षीय शिफाना अपने 22 महीने के भाई मोहम्मद का ख़्याल रखने में अम्मी की मदद करते हैं और जसीरा दिन रात इस कोशिश में है कि किसी तरह अवैध खनन को रोका जाए।

अपनी कहानी सुनाने के बाद जसीरा जब खामोश हुई तो मैंने पूछा –यहां रहना आसान तो नहीं है, खर्चे के लिए पैसे कहां से लाती हो? तो जसीरा ने बताया कि उसके शौहर एकाउंट में डाल देते हैं और वो एटीएम से निकाल लेती है। उसने यह भी कहा कि जल्दी ही उसके पति भी उन लोगों के साथ आकर इस धरने में बैठने वाले हैं।

जब मैंने पूछा कि इतनी हिम्मत कहां से लाई हो जसीरा कि अपना घर बार छोड़कर रेत माफिया के खिलाफ लड़ाई के लिए यहां जमी हुई हो और बच्चों की भी फिक्र नहीं, तो जसीरा हंस पड़ी और बोली..

“मेरे बच्चे यहां स्कूल से ज्यादा सीख रहे हैं और मज़बूत बन रहे हैं और जहां तक हिम्मत की बात है तो जब पूरे कोट्टायम में मैं अकेली महिला ऑटो रिक्शा चलाती थी तब भी डर नहीं लगा तो अब तो मैं मज़बूत
हो गई हूं। अब ना तो अंधेरे से डर लगता है और ना ही सुनसान सड़कें किसी अनहोनी से डराती हैं। मुझमें लड़ने की हिम्मत है।”

दिल्ली से उमेश गुप्ता 








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