सोचती हूँ मैं तुम्हे यह कैसे बतलाऊं,
के तुममें से भी एक ओज झलक सकता है।
जो प्रकाश तुम आरों में देखती हो,
वो प्रकाश तुममें से भी छलक सकता है।
ज़रूरत है तुम्हारे मन के दिए को जलाने की,
रस और रोमांच से तुमको वास्तविकता में लाने की।
फिर देखो क्या है..,
जो एक रौ में नही बदल सकता है!
जो एक रौ में नही बदल सकता है!
निधि रावत
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