Wednesday, 19 February 2014

पांच साल पहले ऑस्ट्रेलिया में हिट एंड रन केस में एक की जान लेने के बाद सजा से बचने के लिए भारत भाग आया था पुनीत, पर ऑस्ट्रेलिया पुलिस ने उसे भारत में भी ढूंढ निकाला, अब केस चलाने के लिए वापस ऑस्ट्रेलिया भेजने की तैयारी




पुनीत कुमार रावल को यह अहसास बुरी तरह डरा रहा है कि अगर उसे ऑस्ट्रेलिया भेज दिया गया तो वो वापस भारत कभी नहीं आ पाएगा। वो रो रहा है, पुलिस की मिन्नतें कर रहा हैं कि वो किसी भी हाल में ऑस्ट्रेलिया नहीं जाना चाहता। पुलिस को जो भी सुनवाई करनी है भारत में ही करे।

वो बार-बार कह रहा है कि वो उसे मारना नही चाहता था, उसने तो उसको देखा ही नही। हां ये उसकी ग़लती है कि उसने शराब पीकर तेज रफ्तार से गाड़ी दौड़ाई। उसकी ग़लती है वो मान रहा है। पर अब पांच साल बाद क्या पुनीत का ये मान लेना ही सब कुछ बदलकर वापस पहले जैसा कर सकता है। एक गलती की सज़ा से बचने के लिए उसने जो कई और गलतियां कर ली हैं, क्या वो सब ठीक हो सकती हैं। क्या पुनीत वाकई माफ़ी के लायक है? क्या उसे अपनी जिंदगी अपने ढ़ग से जीने के लिए आजाद कर देना चाहिए? आईए सही गलत के रास्तों में भटकने से पहले ये जान लेते हैं कि आखिर पांच साल पहले ऐसा क्या हुआ था कि अतीत पुनीत को तलाशता हुआ पंजाब के राजपुरा तक पहुंच गया।
पुलिस कर्मियों की भारी चहल-पहल के बीच पुनीत को राजपुरा न्यायालय लाया गया

इनसेट में पुनीत, हादसे का शिकार डीन हाफस्टी और पुनीत की क्षतिग्रस्त वी 8 गोल्डन कार
1 अक्टूबर, 2008: आधी रात के बाद लगभग 12 बजकर 50 मिनट पर 19 वर्षीय पुनीत ने ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न शहर के साउथबैंक इलाके में सड़क पर जा रहे गोल्ड कोस्ट विश्वविद्यालय के नर्सिंग के दो छात्रों डीन हाफस्टी और क्लैंसी कोकर को अपनी वी8 होल्डन कार से कुचल दिया। हादसे में 19 वर्ष के डीन हाफस्टी की मौके पर ही मृत्यु हो गई जबकि 20 वर्षीय कोकर बुरी तरह से जख्मी हो गए। आरंभिक जांच में पता चला कि पुनीत 60 किमी प्रति घंटे के क्षेत्र में 150 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से कार चला रहे थे। इतना ही नही उन्होने लर्निंग लाइसेंस के नियमों का उल्लंघन करते हुए शराब भी पी हुई थी, जिसकी पुष्टि उनके खून के नमूनों से भी हुई।

2 अक्टूबर, 2008: शुरुआती पूछ ताछ में पुनीत ने कहा कि उसने एक्सीडेंट से पहले कोला में मिलाकर व्हिस्की के मात्र चार पैग पिए थे, पर गहन पूछ ताछ में उसने स्वीकार किया कि वो दोस्तों के साथ पार्टी के दौरान कई घंटो तक शराब पीता रहा था और इसी के कारण कार पर से उसका नियंत्रण बिगड़ गया था।

4 फरवरी, 2009: पुनीत को जानलेवा ड्राइविंग से हाफस्टी की जान लेने और कोकर को गंभीर रुप से घायल करने का दोषी पाया गया। उसके खिलाफ कोर्ट में एक चश्मदीद ने बताया कि उसकी गाड़ी की रफ्तार देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो खुदखुशी के मिशन पर घर से निकला हो। पुनीत को सख्त हिदायतों के साथ ज़मानत दी गई और उसे अपना पासपोर्ट कोर्ट में जमा कराना पड़ा।

मेलबोर्न कोर्ट के बाहर चेहरा छुपाते पुनीत

12 जून, 2009: पुनीत पर केस चलाए जाने के दौरान वो अपने दोस्त सुखचरनजीत सिंह के पासपोर्ट पर इंडिया भाग खड़ा हुआ।



20अगस्त, 2009: दो महीनों तक पुनीत के पुलिस को रिपोर्ट न करने पर पुलिस की छानबीन में ये बात सामने आई कि पुनीत लम्बे समय पहले ही ऑस्ट्रेलिया पुलिस को धत्ता बता कर वहां से भाग चुका है। कोर्ट ने तत्काल उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट ज़ारी कर दिया। उसके दोस्त सुखचरनजीत सिंह को हिरासत में ले लिया गया। पुनीत को भगाने में सहायता करने और उसे अपना पासपोर्ट मुहैया कराने के इल्ज़ाम में उस पर केस चलाया गया। बाद में उसे अठ्ठारह महीने की सख्त कैद हुई।


21 अगस्त, 2009: विक्टोरिया राज्य के मेलबोर्न में हुए इस हादसे के दोषी को पकड़ने के लिए विक्टोरिया सरकार ने घोषणा की कि किसी भी कीमत पर पुनीत को भारत से वापस लाया जाएगा। लेकिन सरकार के आगे सारे रास्ते रुके हुए थे क्योंकि ऑस्ट्रेलिया और भारत के मध्य कोई प्रत्यर्पण संधि नही थी। लोक अभियोजन के निदेशक ने यह बात साफ की कि ऑस्ट्रेलिया पुलिस अगर भारत में पुनीत का पता लगा लेती है तो वो भारत से प्रत्यर्पण संधि के विषय में बात चलायेंगे।

उसके बाद से ऑस्ट्रेलिया स्थित एम.सी.आई.यू के जासूसों ने पुनीत को भारत में तलाशने में कोई कोर कसर बाकी नही रखी। उन्हे हमेशा ये उम्मीद थी की वो पुनीत को पकड़ लेंगे और डीन हाफस्टी के माता पिता को इंसाफ दिलायेंगे, जिन्होंने कि बड़ी ही हिम्मत और सब्र के साथ पुनीत के पकड़े जाने का इंतजार किया है।

पुलिस को हमेशा से ही विश्वास था कि पुनीत भारत में कहीं काम कर रहा है और सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है। पुलिस को ये भी अंदेशा था कि वो अकसर ऑस्ट्रेलिया में रह रहे अपने दोस्तों से फोन पर बात किया करता है और विक्टोरिया में ऐसे कई लोग मौजूद हैं जो ये जानते हैं कि वो भारत में कहां है। इतना ही नही विक्टोरिया की यातायात पुलिस ने वर्ष 2012 में पुनीत को पता बताने वाले के लिए 100,000 डॉलर के ईनाम की घोषणा भी की।

आखिर 2013 में भारत स्थित ऑस्ट्रेलियाई फेडेरल पुलिस अधिकारी रिचर्ड मोसेस और इंटरपोल की सहायता से एम.सी.आई.यू के जासूसों की मेहनत रंग लाई और 29 नवम्बर 2013 को हरियाणा में पानीपत के छोटे से होटल रीजेंसी से पुनीत को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया जब वो अपने माता पिता गीता रानी और नरेश कुमार रावल सहित कई रिश्तेदारों के साथ उस लड़की के परिवार से मिलने पहुंचा था जिससे वो शादी करने वाला था।

पुनीत को क्या पता था कि जिस हादसे को हादसा मान कर वो अपने अतीत में पीछे छोड आया है वो उससे आगे निकल कर उसका इंतजार कर रहा है। वो तो भारत आने के बाद नोएडा में बसने का उपक्रम कर चुका था। इतना ही नही उसने इस दौरान गुडगांव स्थित एक बीपीओं में नौकरी भी कर ली थी। अब तो बस कमी घर बसाने की थी जिसकी राह टोहता हुआ वो पुलिस के हाथों आ पहुंचा था।

पुनीत का परिवार चंढीगड़ के सटे हरियाणा के शहर पंचकुला के सैक्टर 15 में बसा हुआ है। उसके पिता एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। लेकिन लम्बी बीमारी के कारण उनका कईं सालों से घर से निकलना लगभग बंद है। पुनीत की मां गीता रानी एक फैक्टरी में काम करती हैं और उसकी बहन दसवीं कक्षा की छात्रा है। पुनीत को उसके माता पिता ने अच्छे और कामयाब भविष्य की तलाश में ऑस्ट्रेलिया पढ़ने भेजा था। पर हाय री किस्मत! पुनीत वहां से उनके लिए अच्छी खबर की सूरत में अपनी जान बचा लाया और साथ लाया कानूनन अपराधी का तमगा।

पुलिस के हिरासत में लेते ही पुनीत को उस गलती का पछतावा और एहसास सताने लगा जिसे वो आराम से भूलने में कामयाब रहा था। उसने पुलिस वालों को दुनियाभर की दुहाई दे डाली। वो कहता रहा कि वो महज़ एक हादसा था और ऐसे हादसे होते रहते हैं। पर अपने अंदर उसे पता चल चुका था कि अब वो और नही भाग पाएगा। फिलहाल वो जेल में बंद है। उसने भारत सरकार को गुहार लगाई है कि वो ऑस्ट्रेलिया नही जाना चाहता वहां उसकी जान को खतरा है। वो भारत में ही रहकर न्यायिक जांच कराने की मांग कर रहा है।

सच ही है ऑस्ट्रेलिया में ऐसे हादसे भूल जाने के लिए नही होते। हमारे देश की समायोज्य और लचीली कानून प्रक्रिया की तुलना में वहां के कानून सख्त हैं और वर्ष 2011में भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य हुई प्रत्यर्पण संधि के बाद पुनीत को ऑस्ट्रेलिया पुलिस को सौंप दिया जाना महज़ वक्त की बात है। वहां वो यातायात के नियमों का उल्लंघन करने का दोषी तो है ही साथ ही वो एक गैर-मकसद खूनी, धोखेबाज़ और फरार मुज़रिम भी है जिसका इंतजार हाफ्स्टी परिवार लम्बे समय से कर रहा है।

निधि रावत

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