“नेता कहते हैं कि एवरेस्ट पर जाना क्या बड़ी
बात है, इसके लिए तुम्हें सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती। एवरेस्ट पर जाने वाली एक
लड़की को तो डीएसपी बना दिया और मैं सब्ज़ी बेच रहा हूं। ऐसा क्यों? सरकार को हमारी कदर नहीं...” कहते हैं रामलाल शर्मा
जो एवरेस्ट फतह करने के बावजूद सब्जी का ठेला लगाने को मजबूर हैं
हरियाणा के फतेहाबाद जिले
में टोहना कस्बे के निवासी 24 वर्षीय रामलाल ने 21 मई 2013 को नेपाल में एवरेस्ट
की चोटी पर भारतीय तिरंगा फहराया था। उनकी इस शानदार उपलब्धि के लिए भूपेन्द्र
सिंह हुड्डा सरकार ने उन्हें पांच लाख रुपए का नगद ईनाम देने की घोषणा की थी।
लेकिन उन्हें आज तक सरकार से एक रुपया तो दूर वो पहचान तक नहीं मिली है जिसके कि
वो हकदार है। उनके साथ ही एवरेस्ट फतह करने वाली दो महिलाओं कान्ता और रजनी के लिए
भी ईनाम की घोषणा की गई थी लेकिन उन दोनों को भी सरकार ने अब तक कुछ भी नहीं दिया
है। यहीं नहीं रामलाल द्वारा उन्हें सरकारी नौकरी दिलाए जाने की अपील को भी राज्य
प्रशासन ने ठुकरा दिया है।
रामलाल बताते हैं कि उन्हें
ईनाम की दरकार इसलिए ज्यादा है क्योंकि उनके पिता रीढ़ की बीमारी के कारण पूरी तरह
से बिस्तर पर हैं, जिनके इलाज और रोज़ी रोटी चलाने के लिए उन्हें पैसे की सख्त
ज़रूरत है। हांलाकि रामलाल खेल विज्ञान में स्नातक हैं और शारीरिक शिक्षा में
डिप्लोमा भी प्राप्त कर चुके हैं, लेकिन चूंकि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती सिर्फ
इसलिए उन्हें ढंग की प्राइवेट नौकरी भी नहीं मिलती। इसलिए मजबूरन रामलाल को ठेले
पर सब्ज़ियां बेचनी पड़ रही हैं।
राज्य सरकार द्वारा उपेक्षा
के शिकार रामलाल को इस बात की नाराज़गी है कि उन्हें वो सम्मान और ईनाम नहीं दिया
गया जो हर एवरेस्ट विजेता को मिलता है। उनके अनुसार वो इस सिलसिले में गांव के
सरपंच से लेकर राहुल गांधी तक से मिल चुके हैं। लेकिन हर कोई उन्हें सिर्फ आश्वासन
दे देता है कि उनके मामले में ज़रूर कुछ किया जाएगा। उनके राज्य के बहुत से नेता
जिनके सामने रामलाल कई बार गुहार लगा चुके हैं, अब तो यह कहने लगे हैं कि एवरेस्ट
पर चढ़ना कौन सी बड़ी बात है, तुमने एवरेस्ट पर चढ़ाई कर ली तो क्या अजूबा कर
दिया।
रामलाल को इस रवैये से सख्त ऐतराज़ है, वो कहते हैं कि- “नेता कैसे इसे छोटी बात मान सकते हैं, अगर कोई भी
एवरेस्ट चढ़ सकता हैं तो वो चढ़ कर दिखाएं ना। सिर्फ बेस कैम्प तक ही पहुंच कर
दिखा दें..।”
रामलाल बताते हैं कि एक अन्य
पर्वतारोही ममता सोढ़ा जिन्होंने कुछ समय पहले एवरेस्ट फतह किया था, को 21 लाख
रुपए के ईनाम के साथ डीएसपी का पद दिया गया है, अभी हाल में ही उन्हें पद्मश्री भी
मिला है। तो ऐसा भेदभाव क्यों कि सिर्फ एक ही पर्वतारोही की उपलब्धियों को मान
दिया गया और अन्य लोगों की उपलब्धि को कोई उपलब्धि मानने तक को तैयार नहीं। यह तो
राज्य की प्रतिभाओं को उत्साहित करने की
बजाय निराश करने वाली बात है।
हरियाणा के खेल एवं युवा
मामलों के डायरेक्टर जनरल सुधीर राजपाल का कहना है कि रामलाल को ईनाम देने के लिए
ज़रूरी सत्यापन आदि की प्रक्रिया चल रही है, एक बार वो पूरी हो जाए उसके बाद
रामलाल को उनका 5 लाख रुपए का ईनाम दे दिया जाएगा। लेकिन उनके अनुसार रामलाल की
सरकारी नौकरी के लिए सिफारिश नहीं की जा सकती क्योंकि यह सिर्फ प्रतियोगी खेलों
में पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के मामले में किया जाता है।
हांलाकि रामलाल यह नहीं समझ
पा रहे हैं कि लगभग 9 महीने गुज़र जाने के बाद भी अभी तक उनका सत्यापन क्यों नहीं
हो पाया और जब पदक नहीं जीतने के बावजूद सिर्फ एवरेस्ट फतह करने के आधार पर ममता
सोढ़ा को डीएसपी बनाया जा सकता है तो फिर उन्हें सरकारी नौकरी क्यों नहीं दी जा
सकती।
हिन्द प्रहरी संवाददाता


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