केस स्टडी- 1
नाम ललिता श्री
आयु- 22 वर्ष
पत्नि- श्रीनू, विशाखापटनम
21 साल की छोटी सी उम्र में ललिताश्री के दोनों गुर्दे
खराब हो गए थे जिसके कारण उनको डायलिसिस पर रखना पड़ा। तब उनकी मां ने उन्हें अपनी
एक किडनी दान कर दी। लेकिन उस किडनी को ललिता के शरीर ने स्वीकार नहीं किया और एक
साल के अंदर ललिता की हालत बेहद खराब हो गई। पूरा शरीर फूल गया और खून का बनना
काफी कम हो गया। शहर के नामी अस्पताल में कई
दिनों भर्ती रहने के बावजूद और इलाज पर लगभग सवा पांच लाख रुपए खर्च हो जाने के
बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं आया और डॉक्टरों ने जवाब दे दिया कि अब वो
ज्यादा समय की महमान नहीं। उनका खाना-पीना सबकुछ बन्द हो चुका था और वो पूरी तरह
से पलंग पर ही रहती थीं। जब मालधनी गुप्ता को इस बारे में पता चला तो वो ललिता
श्री के घर गए, और उनके पति से कहा कि चूंकि ललिताश्री के बचने की कोई संभावना तो
वैसे भी नहीं है, तो एक बार इनका इलाज मुझे भी अपने देसी तरीकों से करने दीजिए,
क्या पता कोई चमत्कार हो जाए। बहुत समझाने पर ललिताश्री के पति मान गए और उन्होंने
ललिताश्री को मालधनी जी के साथ जाने की इजाज़त दे दी। मालधनी गुप्ता मे उन्हें अपने
घर के पास ही स्थित गौशाला में एक कमरे में ठहराया। वहीं ललिताश्री के रहने के लिए
पलंग लगवाया गया और मालधनी जी ने उनको रोज़ सुबह-शाम 7 सूती कपड़ों से छना हुआ
गौमूत्र देना शुरू किया। सप्ताह में एक दिन उनको गंगाजल भी देते थे। महीने भर में
ही ललिताश्री की स्थिति में काफी फर्क आ गया। उनका फूला हुआ शरीर सामान्य होने लगा
और उनकी स्थिति सुधरने लगी। उनके पति ने जब ललिताश्री की हालत में सुधार देखा तो
उन्होंने मालधनी जी को अपना इलाज जारी रखने के लिए कहा और ललिताश्री को वहीं छोड़
दिया। फिलहाल उन्हें वहां रहते हुए तीन महीने हो चुके हैं और इस दौरान वो नियमित
रूप से गौमूत्र और गौदुग्ध सेवन करती रही हैं और हफ्ते में एक बार गंगाजल लेती हैं
और अब उनकी हालत में आश्चर्यजनक सुधार है। उनकी हालत इतनी सुधर गई कि उन्होंने
उठकर घूमना शुरू कर दिया है। अब उन्होंने दवाईयां लेना भी बन्द कर दिया हैं, केवल
गौमूत्र लेती हैं और सुबह शाम गायों के बीच घूमती हैं और उनकी हालत बिल्कुल
सामान्य है। वो सभी तरह का भोजन ले रही हैं और धीरे-धीरे घर के अन्य काम जैसे खाना
बनाना भी शुरु कर दिया है। ललिताश्री अपनी हालत में सुधार के लिए मालधनी गुप्ता जी
को बेहद धन्यवाद देती हैं और कहती हैं कि यह सब केवल उनकी देसी गौचिकित्सा और देखभाल
के कारण संभव हुआ है। जो काम बड़े-बड़े डॉक्टर नहीं कर सके वो गौमूत्र के साधारण
से देसी इलाज ने कर दिखाया। गुप्ता जी बताते हैं कि ललिताश्री को अभी आठ महीने और
गौशाला के पास रहकर ही इलाज करवाना होगा और तब वो पूरी तरह से ठीक हो जाएंगी।
केस स्टडी-2
नाम- लक्ष्मी
उम्र- 48 वर्ष
पत्नि- सोमेश्वर राव, विशाखापटनम
46 वर्ष की उम्र में लक्ष्मी जी की किडनी में स्टोन बन गया
था। उनकी किडनी पहले से खराब होने के कारण डॉक्टर ने स्टोन निकालने के लिए ऑपरेशन
करने से मना कर दिया था। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि स्टोन तभी निकाला जा सकता है
जब किडनी ठीक हो जाए वरना लक्ष्मी जी की जान को खतरा हो सकता है। उनकी हालत
बिगड़ती गई। बीमारी के चलते घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ने के कारण, और लक्ष्मी जी
की खराब हालत के कारण उनकी बेटियों का विवाह भी नहीं हो पा रहा था। सोमेश्वर राव
ने मालधनी जी के बारे में सुना था कि वो गौमूत्र चिकित्सा के जरिए काफी लोगों की
किडनी ठीक कर चुके हैं। भरोसा तो नहीं था लेकिन सब तरफ से निराश हो जाने के बाद
सोमेश्वर राव ने सोचा कि एक बार इस चिकित्सा को भी अपना लिया जाए। अगस्त 2013 में वो
मालधनी जी के पास गए और तब गुप्ता जी ने उनका इलाज गौमूत्र और पंचगव्य से शुरू
किया। इस दौरान उनके मांस खाने और बैंगन, भिंडी, पालक, टमाटर और तोरई जैसी
सब्जियां खाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कुछ ही महीनों में नियमित गौमूत्र पान और
पंचगव्य चिकित्सा के चलते लक्ष्मी जी की किडनी 80 फीसदी तक ठीक हो गई और डॉक्टरों
ने ऑपरेशन करके स्टोन निकाल दिया। अब लक्ष्मी जी की हालत बहुत हद तक सुधर चुकी है।
लक्ष्मी जी के इलाज से प्रभावित सोमेश्वर राव ने अपने घर में गाय पाल ली। और उनके
घर के लोग नियमित रूप से गौमूत्र का सेवन करते हैं और लक्ष्मी जी भी पूरी तरह
स्वस्थ हैं।
खराब किडनी को पूरी तरह सिर्फ
पंचगव्य इलाज से ठीक करने का दावा करते हैं मालधनी गुप्ता, कैंसर और नारीजनित
रोगों के इलाज के लिए गौमूत्र पर शोध जारी..
अपने बारे में बात करते हुए मालधनी जी बताते हैं कि गाय
और गौचिकित्सा के बारे में उन्होंने गुरु गोपालमणि महाराज द्वारा रचित ग्रंथ
धेनुमानस से प्रेरणा ली है। पंचगव्य चिकित्सा संबंधी सारे शोध भी वो मुख्य रूप से
इसी किताब को केंद्र में रखकर कर रहे हैं। तकरीबन 12 साल पहले उन्होंने एक
ऑस्ट्रेलियन नस्ल की गाय खरीदी थी। लेकिन बाद में उन्हें धेनुमानस पढ़कर पता चला
कि उससे कहीं ज्यादा खूबियां देसी गाय में होती हैं। तब उन्होंने अपनी वो गाय
औने-पौने दामों में बेच दी और 30,000 रुपए में एक देसी गाय खरीदी। मालधनी जी बताते
हैं कि गत 10 वर्षों से संयुक्त परिवार
में रहने वाले उनके घर के सभी सदस्य सुबह चाय नहीं पीते बल्कि गौमूत्र का सेवन
करते हैं। शाम को पूरा परिवार गाय का दूध लेता है। उनके परिवार में सभी स्वस्थ हैं
और बच्चों के दिमाग शुरू से ही पढ़ने लिखने में काफी तेज़ हैं। अपने परिवार की
प्रगति का कारण भी वो गौमाता के आशिर्वाद को ही मानते हैं और कहते हैं कि फिलहाल
वो कैंसर पर रिसर्च कर रहे हैं। उनका ध्येय है कि गाय के मूत्र से कैंसर जैसे
रोगों का इलाज किया जाए। गाय और उसकी दो बछिया को पालने के लिए मालधनी जी कोई कोर
कसर नहीं रखते। वो बताते हैं कि चूंकि आंध्र प्रदेश में भूसा आसानी से नहीं मिलता
वो हर साल 12,000 रुपए का उड़द का भूसा और पुआल मंगाते हैं जो गाय के लिए ज़रूरी
है।
उनके द्वारा की जा रही गौमूत्र चिकित्सा से प्रभावित
होकर धीरे-धीरे आसपास के लोग भी गाय पालने के लिए जागरूक बन रहे हैं। उन्होंने घर
के पास ही एक गौशाला खुलवाने में सहायता की है और वहां 4-5 गाएं रखवायी हैं। मालधनी
जी उत्तर प्रदेश में भी जाकर गौकथा वाचन करते हैं जिससे लोगों को गाय और उसकी
चिकित्सा का महत्व पता चल सके। मालधनी जी बताते हैं कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के
जमनिया जिले में एक ऐसे आदमी का भी इलाज किया है जिसका बदन पूरी तरह सिकुड़ चुका
था और जो चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ था। लेकिन गौमूत्र चिकित्सा के प्रभाव से
अब वो बिल्कुल ठीक हो चुका। गौमूत्र चिकित्सा के बारे में जानने या मालधनी जी से
निशुल्क अपना इलाज करवाने की चाह रखने वाले लोग उनसे सम्पर्क कर सकते हैं। उनका
पता है-
मालधनी गुप्ता,
पी पालम,
एनटीपीसी, सिम्हाद्रि के पास
परवाड़ा मंडल
विशाखापटनम
आंध्र प्रदेश- 531021
मोबाइल- 9440608681
हिंद प्रहरी संवाददाता



गौ माता की महिमा अनंत है जिसने किया उसे अवश्य फल मिला
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