सऊदी अरब के विभिन्न शहरों के मुर्दाघरों में साढ़े तीन हज़ार से ज्यादा प्रवासी मजदूरों के शव लावारिस पड़े हैं। इनमें से कई नेपाली हैं, कई पाकिस्तानी, कई बांग्लादेशी, कई श्रीलंकाई और हज़ारों भारतीय हैं। संबधित दूतावासों की उदासीनता, मालिकों की बेपरवाही और कुछ मामलों में परिजनों की अनदेखी के चलते इन कामगारों के शव ना स्वदेश लौट पा रहे हैं और ना वहां इनकी अंतिम क्रिया हो पा रही है। कई शव तो सालों से शवगृहों में पड़े हैं..
मजदूरों को काम के लिए बुलाने वाले मालिक उनके शवों की वतन वापसी के लिए पैसा खर्चने को तैयार नहीं... दूतावास के अधिकारियों ने भी जिम्मेदारी से हाथ खींचे
सऊदी अरब के गैजेट में अंकित है कि उनके देश के विभिन्न मुर्दाघरों में पिछले साल कुल 5,555 प्रवासी मजदूरों और कामगारों के शव प्राप्त किए गए। जिसमें से 1,791 शवों को या तो उनके परिवारों के पास उनके देश भेज दिया गया है या दफना दिया गया है। पर अभी भी 3,764 शव विभिन्न मुर्दाघरों में अपने देश वापसी का इंतजार कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर शव ऐसे मजदूरों के हैं जिन्हें काम करने के लिए भारत, नेपाल, बांगलादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों से किसी कंपनी द्वारा स्पांसर करके लाया गया था। गैजेट में दी गई जानकारी के अनुसार रियाद के फारेंसिक विभाग में मृतक मामलों के मुखिया अल बवाजीर ने इन मृतकों को उनके देश वापस भेजने में होने वाली देरी या नाकामी के लिए इन मजदूरों के स्पांसर मालिकों को जिम्मेदार बताया है।
उन्होंने कहा है कि स्पांसर कंपनियां और मालिक, मृतक मजदूरों को वापस उसके देश भेजने के लिए कार्रवाई करने में सरकारी अधिकारियों का सहयोग नहीं कर रहे हैं। जिसके कारण अंदेशा लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में यह संख्या कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जाएगी। हम आपको बता दें कि मृतक शरीर को उसके देश भेजने के लिए ताबूत और हवाई जहाज का खर्च मजदूरों को काम पर रखने वाली कंपनी या मालिक को वहन करना होता है जिसके नहीं किये जाने के कारण बहुत से शव वतन नहीं लौट पाए हैं।
मालिकों के चंगुल में मजदूरों की जिंदगी और मौत.. मजदूरों की मौत के बाद कागज़ी कार्यवाही पूरी नहीं करने के कारण स्वदेश नहीं पहुंच पाते मजदूरों के शव
अरब के बड़े और विकसित शहरो में काम करने वालों प्रवासियों के चारों ओर उन्हें स्पांसर करने वाले मालिक काफ़ला का सहारा लेकर एक जेल का ढांचा सा बना देते हैं जिसमें वो खुद को जकड़ा महसूस करते हैं। यह मालिक तय करता है कि उसके द्वारा लाए गए मजदूर कहां काम करेंगे, कब तक काम करेंगे और कितने पैसे पर काम करेंगे। भारत, नेपाल, बांगलादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे अविकसित या अल्पविकसित देशों में सरकारी नीतियों ने भले ही महंगाई को सर पर उठा लिया है पर रोजगार जैसे संवेदनशील और सबसे जरुरी मुद्दे को स्थिर ज़मीन तक नसीब नहीं हो पा रही है। ऐसे में घर की जिम्मेदारियों और रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए ये कामगार, अरब देशों में बंधुआ मजदूर की तरह काम करने को आसानी से तैयार हो जाते हैं और जो तैयार नहीं होते वो भी कर कुछ नहीं सकते क्योंकि एक बार अच्छी कमाई और विदेश में काम करने का लालच लेकर जब वो अरब देश पहुंच जाते हैं तो उन्हें खबर लगती है कि उन्होनें अपने परिवार के लिए खुशियों का नही बल्कि खुद का सौदा कर लिया है।
गुलामी के आधुनिक परिवेश के फंसे इन मजदूरों की जिंदगी तो उनके मालिक के आधीन हो ही जाती है, मरने के बाद भी उनकी मिट्टी उनके मालिक पर आश्रित रहती है। नियम के अनुसार अगर किसी मजदूर की किसी भी कारण मृत्यु हो जाती है तो उसके शरीर को उसके परिवार के पास वापस उसके वतन भेजने के लिए आने वाले खर्च सहित सारी काग़जी कार्रवाई को पूरा करके संबंधित दूतावास में जमा कराने की जिम्मेदारी उस मजदूर के मालिक की होती है। जिससे कि अधिकतर मालिक अपना पल्ला मजदूर की मौत के साथ ही झाड़ लेते हैं। मालिकों की इसी बेरुखी का शिकार कई परिवार अपने प्रियजनों के शरीर को प्राप्त करने के लिए लम्बे समय से इंतजार कर रहे हैं। परिणामस्वरुप विभिन्न अस्पतालों के मुर्दाघरों में मौजूद लावारिस शरीरों की गिनती बढ़ती जा रही है।
और भी हैं मुश्किलें..
मालिकों की बेरुखी के साथ ही कुछ अन्य कारण भी हैं जिसके चलते ये शव अपने देश वापस नही जा पा रहे हैं जैसे कि लम्बे समय तक मालिक के पास पासपोर्ट रहने के कारण कई लोगों का समय से पासपोर्ट रिन्यू नहीं हो पाया है और अब इस प्रक्रिया में दुनियाभर की मुसीबतें आ रही हैं, या किसी मामले में संबंधित देश का दूतावास ही कोई दिल्चस्पी नही ले रहा है, परिवार के लोगों की सही प्रक्रिया की जानकारी नही है, तो कई मामलों में परिवार के लोग अपने संबंधी के मृत शरीर को प्राप्त करना ही नहीं चाहते।
संबंधित दूतावास के अधिकारियों की बेपरवाही भी है एक कारण
आम तौर पर अरब देश में किसी प्रवासी भारतीय की मृत्यू होने पर ये दूतावास की जिम्मेदारी होती है कि वो सारी काग़जी कार्रवाई करने के लिए मजदूर के मालिक को निर्देश दे या किसी स्पांसर मालिक के न होने की स्थिति में इस प्रक्रिया को पूरा करने में मृतक के परिवार की सहायता करे। लेकिन ज्यादातर मामलों में दूतावास यह काम नहीं करना चाहता। उनका मानना है कि अगर सारी काग़जी कार्रवाई पूरी करके उन्हे समय से दे दी जाए तो वो मृतक के शरीर को उसके परिवार के सदस्य के साथ भारत रवाना कर देंगे नहीं तो वो इस मामले में कुछ नही कर सकते। दूतावास में दरकार जिस काग़जी कार्रवाई की मैं बात कर रही हूं उसकी सूची देख कर तो जिंदा इंसान के पसीने छूट जाएं तो बेचारा मृतक कहां से इस काग़जों का इंतजाम करे, लिहाजा परेशान परिवार सउदी अरब या अमीरात स्थित अस्पताल जहां कि मृतक का शरीर जमा है, भारतीय दूतावास और भारत स्थित विदेश मंत्रालय के बीच गेंद के समान इधर उधर चक्कर ही लगाता रहता है। कई मामलो में गरीब परिवार मृतक के शरीर को वापस भारत लाने का खर्च वहन नहीं कर सकते, और उनका इंतजार बढ़ता जाता है।
अरब देशों का कानून है कि अगर मरने वाला मुस्लिम होता है, तो वो उसके परिवार से स्वीकृति लेकर उसे अरब देश में ही दफ़ना देते हैं। लेकिन अगर मरने वाला किसी और धर्म का होता है, तो उसके शरीर को उसके देश वापिस भेजना आवश्यक है, फिर चाहे इस कार्रवाई में सालों का वक्त गुजर जाए। और अगर किसी वजह से ऐसे शव को वापस नहीं भेजा जा सकता तो अधिकारी उसे संबंधित दूतावास या फिर किसी समाज सेवी संस्था को सौंप देते हैं जो मृत व्यक्ति के धार्मिक रीति रिवाज़ों द्वारा उसके शव की अंतिम क्रिया करते हैं।
काम के दौरान हादसों में हो रही मृत्यु के साथ ही प्रवासी मजदूरों द्वारा अकेलेपन के कारण आत्महत्या के मामले भी बढ़ रहे हैं-
क़तर, सउदी अरब, संयुक्त राष्ट्र अमीरात जैसे देशों में काम के दौरान हादसों, सांस की बीमारी या किसी अन्य प्राकृतिक या अप्राकृतिक घटना में रोज ही किसी न किसी प्रवासी भारतीय की जान जाती ही रहती है। लेकिन एक खतरनाक बीमारी जिसने हाल के समय कई जाने ली हैं वो है अकेलेपन की बीमारी, लम्बे समय तक परिवार से दूर रहने की बीमारी, जिसके चलते कई लोगों ने खुदकुशी जैसा कदम तक उठाया है। एक बार अरब की धरती पर पहुंच कर मालिक जब पासपोर्ट जब्त कर लेता है तो सालों तक परिवार से मिलने का मौका नहीं आता और कई मामलो में तो जीवनभर।
भारतीय दूतावास के अधिकारियों को अपने देश के मजदूरों के शवों की चिन्ता नहीं, कोई सहयोग नहीं देते अधिकारी
कुछ समय पहले ब्रिटेन के द गार्डियन अखबार में खबर छपी थी कि संयुक्त राष्ट्र अमीरात के कई शहरों के अस्पतालों में लावारिस भारतीय शवों की गिनती बढ़ती जा रही है, और कई शव तो अस्पताल के मुर्दाघर में दो वर्षों के लम्बे समय से मौजूद हैं। इसी सिलसिले में अबू दाबी स्वास्थ्य प्राधिकरण में प्रबंधक डा ज़माल अल मुतावा का कहना है कि “यह सच है और ऐसे कई शव आबू धाबी स्थित शेख खलीफा अस्पताल के मुर्दाघर में मौजूद हैं। हम उनके संबंधित दूतावासों को पत्र लिखते हैं पर कोई सहयोग प्राप्त नही होता, जिसके कारण अस्पताल के मुर्दाघर को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है”।
उदाहरण के तौर पर भारतीय मूल के कुमार विहारा की मृत्यु अस्पताल के रिकार्ड में 9 जून 2012 अंकित है और अभी तक अस्पताल प्रबंधन उनके शरीर को उनके परिजनों को सौंपे जाने के संबंध में उचित कार्रवाई का इंतजार कर रहा है। अस्पताल के अधिकारी इस संबंध में कई मर्तबा भारतीय दूतावास में गुहार लगा चुके हैं पर कोई सकारात्मक पहल देखने को नही मिली है। मुतावा बताते हैं कि “अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में शव को तब तक मुर्दाघर में रखा जाता है जब तक स्थानीय पुलिस से अनुमति प्राप्त न हो जाए। एक बार पुलिस द्वारा मामले को क्लीन चिट देने के बाद उस शव को उसके परिवार को सौंपे जाने या उसके मूल देश भेजे जाने या यहीं उसके दाहसंस्कार की कार्रवाई करने की शुरूआत की जाती है। लेकिन समस्या उस समय आती है जब या तो मृतक की पहचान नहीं हो पाती या उसके परिवार वाले न तो उसके शव के लिए दावा प्रस्तुत करते हैं न ही उसके संस्कार की अनुमति देते हैं।”
निधि रावत


No comments:
Post a Comment