अरुण शौरी राजनीति और इतिहास पर भारत के सबसे बड़े लेखकों में से एक माने जाते हैं। वे विश्व बैंक के अर्थशास्त्री, योजना आयोग के सलाहकार और इंडियन एक्सप्रेस अखबार के संपादक रह चुके हैं। अपनी रचनाओं के जरिए बहुत से पुरस्कार और सम्मान जीत चुके अरुण शौरी अपने सटीक विश्लेषण और बारीक रिसर्च के कारण जाने जाते हैं। इनके द्वारा लिखी गई किताब मिशनरीज़ इन इन्डिया: कन्ट्यूनिटीज़, चेंजेस एंड डिलेमाज़ (Missionaries in India: Continuities, Changes and Dilemmas) इस पर प्रकाश डालती है कि किस तरह कई शताब्दियों से ईसाई मिशनरियां हमारे धर्म और संस्कृति पर प्रभाव डाल रही हैं और हिन्दुओं को ईसाईं बनाने में जुटी हैं। इस किताब के अनुसार-
-ईसाई मिशनरियों ने अपने स्वार्थ के अनुसार हमारे धर्मग्रंथों की विवेचना की है। मिशनरी स्कूल इस तरह से उच्च वर्गीय छात्रों का दिमाग बदल चुके हैं कि वो सच्चाई देखते और जानते हुए भी इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं।
-आज़ादी से पहले अंग्रेज़ी शासन के जरिए ईसाई हमें शारीरिक रूप से गुलाम बना रहे थे लेकिन देश भर में फैला मिशनरी का जाल हमें हमारी संस्कृति और धर्म से अलग करके हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने में जुटा हुआ है।
-पहले तरह की गुलामी से तो हम आज़ादी पा चुके हैं लेकिन दूसरी तरह की गुलामी को हम खुशी-खुशी अपना रहे हैं।
-मिशनरी जो भी दावे कर लें, लेकिन यह सच है कि वो सभी गरीब लोगों, अशिक्षित आदिवासियों और दलितों को बहुत से सब्जबाग दिखाकर, धोखा और प्रलोभन देकर उन्हें ईसाईयों में परिवर्तित करने का ही काम कर रही हैं।
-ईसाई मिशनरीज ने संस्कृत ग्रंथों को इसलिए अंग्रेजी में अनुवाद नहीं किया क्योंकि उन्हें संस्कृत से प्यार है बल्कि इसलिए किया क्योंकि वो इनकी विवेचना अपने तरीके से कर सकें और हर हिन्दू को ईसाईं बना सकें।
-ईसाई मिशनरीज कबाइली इलाकों में सरकार द्वारा स्कूल और अस्पताल खोले जाने का विरोध करती हैं लेकिन खुद वहां अपने चेरिटेबल अस्पताल और स्कूल शुरू करती हैं ताकि लोगों की हमदर्दी और प्रशंसा पा सकें और उन्हें ईंसाईयों में परिवर्तित कर सकें।
-इस किताब के अनुसार सौ साल पहले, यूएस में अपनी ऐतिहासिक यात्रा के दौरान, स्वामी विवेकानन्द ने लिखा था कि यहां बच्चों के लिए रविवार को दी जाने वाली शिक्षाओं का एक अंश यह भी है कि ईसाई बच्चे हर उस इंसान से नफरत करें जो ईसाई नहीं है और खास तौर पर हिन्दुओं से।
-किताब के मध्य भाग में- डिवीजन ऑफ लेबर के अंतर्गत- शौरी ने ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर कहा है कि ब्रिटिश शासक, मिशनरीज और यूरोपियन इंडोलॉजिस्ट के एक अग्रीमेंट के अनुसार- भारत अज्ञानता, असामानता और झूठ से भरी भूमि है और इसका मुख्य कारण हिन्दुत्व है जो कि ब्राह्मणों के कारण फल-फूल रहा है। क्योंकि वहां लोग बहुत दर्द में हैं और जीजस ने भी अपने अंतिम शब्दों में यहीं कहा था, इसलिए यह हमारा फर्ज है कि हम उन्हें ईसाईयत के अन्तर्गत लाएं। और इसके लिए हिन्दुत्व को हराना ज़रूरी है।
-मैकुले का प्रसिद्ध भाषण जिसमें उसने भारत में शिक्षा के माध्यम को अंग्रेजी करने को कहा है, भारत के लिए अत्यधिक दुर्भावना से भरा है, खासतौर पर हिन्दुत्व, हमारी भाषा और हमारे साहित्य के लिए। मैकुले अपनी शिक्षाओं के जरिए ऐसे भारतीयों को जन्म देना चाहता था जो जन्म और रंग से तो भारतीय होंगे, लेकिन सोच से ब्रिटिश होंगे।
-शौरी ने उन्नीसवीं शताब्दी के दो गणमान्य ब्रिटिश प्रशासकों रिचर्ड टेम्पल और चार्ल्स ट्रेविलिन की लिखी बातों में से कुछ को क्वोट किया है- रिचर्ड टेम्पल लिखते हैं- “भारत में मिशन जो काम कर रहे हैं वो ब्रिटिश शक्ति की राजसी नींव को और मजबूत करेगें। जितना खर्चा होगा उतने ही परिणाम मिलेंगे”।
-वहीं ट्रेविलिन कहते हैं कि “ एक ऐसी जनरेशन बड़ी हो रही है जो मूर्तियों को पसंद नहीं करती। एक जवान हिन्दु जो कि अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कर चुका है, को अगर उसका परिवार काली माता के मंदिर में जबरदस्ती ले जाएगा तो वो मादाम काली के लिए अपनी टोपी उतारेगा, हल्का सा झुक कर अभिवादन करेगा और आशा करेगा कि मादाम काली खुश रहें”।
-चर्च का दृष्टिकोण बताने के लिए, अरुण शौरी ने कैथोलिक बिशप द्वारा एक कॉन्फ्रेन्स में बांटी गई 50 पेज की रिपोर्ट भी शामिल की है। इस रिपोर्ट में उन चार तरह के चर्चों की विवेचना है जो संयुक्त रूप से भारत में चर्च की रूपरेखा तैयार करते हैं। इनमें शामिल हैं- केरल का सीरियाई ईसाई समुदाय, गोवा में जड़े जमा रहा पेड्रोआडो चर्च (Padroado), मध्य भारत के ट्राइबल चर्च, और उत्तर पूर्व के दलित चर्च।
-वास्तविकता में चर्च मास कन्वर्जन के लिए बिजनिस प्लान्स तैयार करते हैं और कई बार पास्टर्स हर एक धर्मांतरण पर मिलने वाले डॉलर्स से ही अपनी आजीविका चलाते हैं।
-इस किताब के अनुसार भारत में मिशनरीज़ लोगों का धर्मातंरण करने के लिए युक्तियों का सहारा ले रही हैं। उदाहरण के तौर पर- कबाईली और ग्रामीण इलाकों में मिशनरीज़ यहीं पसंदीदा उपाय अपनाती हैं.. कि हिन्दुओं के भगवान की पत्थर की मूर्ति तो पानी में डालने पर डूब जाती है जबकि एक लकड़ी का क्रॉस तैरता रहता है। इस प्रदर्शन के बाद मिशनरीज़ कहती हैं कि जब तुम्हारा भगवान खुद को नहीं बचा सकता तो वो तुम्हें कैसे बचाएगा..?
हिन्द प्रहरी संवाददाता

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