Tuesday, 25 March 2014

नहीं छूटता विदेशी धरती का मोह... अपनों का साथ नहीं होने का मलाल ज़रूर है पर सुशासन और बेहतर आर्थिक स्थिति प्रवासी भारतीयों को देश का रास्ता नहीं पकड़ने देती....


अब लौटना आसान नहीं...

प्रवासी भारतीयों को बेहतर ज़िंदगी की चाह गैर मुल्क में ले आई, अधिकतर यहां से जाना नहीं चाहते और कुछ यहां रहना नहीं चाहते। पर देश इन्हें और ये देश को भूले नहीं हैं..  

जरा सा समय निकाल इन आंकडों को देखें:-

ये संख्याएं हमें बताती हैं कि देश की जनसंख्या का काफी बड़ा हिस्सा देश से किनारा कर चुका है। हालांकि ये आंकड़े एक शोध का परिणाम हैं, और मुझे नहीं पता कि ये कितने सही हैं। पर हां, यह मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि ये वास्तविक आंकड़ों से कम ही होंगे। इनमें जमर्नी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि का जिक्र जो नहीं है। लेकिन फिर भी देश से पलायन की ताजा स्थिति को भांपने के लिए ये एक अच्छा डेटाबेस है।

मैं आपको बता दूं कि हम बात कर रहे हैं किसी न किसी कारण से भारत छोड़ कर किसी अन्य मुल्क में जा बसे अर्द्ध भारतियों की। अर्द्ध इसलिए, क्योंकि वो भारत में पैदा होकर उसका हिस्सा तो हैं, पर उनकी प्राथमिकताएं और आवश्यकताएं उन्हे किसी दूसरे देश में पनपने को मजबूर कर रही हैं।

यह सवाल कि लोग आखिर देश छोड़ क्यों रहे हैं...?, मन में हम सभी इसका जवाब जानते हैं, पर फिर भी ये सवाल बेहद अहम और आम है। कुछ समय पहले एक बड़ी शोध संस्था ने इस मुद्दे पर बेहद पड़ताल की और लोगों के देश छोड़ने के कारणों को चार तरह से समझायाः-
आर्थिक – सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण कारण। अपनी पसंद के क्षेत्र में भविष्य सुरक्षित करने के लिए और आर्थिक रूप से सुदृढ़ जीवन जीने के लिए विदेश जाने वाले लोगों का प्रतिशत सबसे ज्यादा है।
 
सामाजिक - बेहतर जीवन स्तर के लिए या अपने दोस्तों या परिवार के साथ के लिए। भारतीय समाज में इसे एक शान की बात समझा जाता है कि किसी परिवार का बच्चा विदेश में है, इसलिए भी लोग कई बार बसने के लिए ना सही कम से कम एक बार काम करने के लिए वहां ज़रूर जाना चाहतै हैं।

राजनीतिक -  राजनीतिक अत्याचार या लड़ाई के कारण।

पर्यावरण स्थिति/ गरीबी - सूखा, बाढ़ या गरीबी या किसी अन्य कारण से सब कुछ खत्म हो गया हो, तो एक नए जीवन के आरंभ के लिए। इसमें अधिकतर मजदूर वर्ग के लोग हैं जो किसी तरह अपनी वीज़ा और पासपोर्ट बनवा कर विदेशों खासकर खाड़ी देशों में जाते हैं और वहां रहकर भारत में रह रहे अपने परिवार का निर्वाह करते हैं।  

ये कुछ कारण हैं जिनके आधार पर मोटे शब्दों में पलायन को बांट दिया गया है। लेकिन अगर हम परिभाषाओं के जंजाल से हटकर मानवीय भावना के साथ इसे समझने का प्रयास करें और आज के भारत पर गौर करें तो अपने परिवार और जीवन को बेहतर दिशा देने के लिए देश से कूच कर जाना कोई ग़लत या स्वार्थी निर्णय नही लगता। असीम संसाधनों के हमारे भारत देश में अपने दिशानिर्देशों के साथ जीवन यापन के बेहद सीमित अवसर हैं। अवसरवादियों ने रोजगार और शिक्षा को परिवार प्रभुसत्ता में इस प्रकार मिला लिया है कि आम इंसान की मेहनत, लगन और बुद्धिमत्ता भी उसे तरक्की का एक पायदान नहीं दे सकते। देश के कुछ बड़े परिवारों को छोड़ दें तो लगभग हर घर में प्रतिभा परेशान हाल समय गुजार रही है। अब ऐसी स्थिति में अगर युवा अच्छे अवसरों के लिए देश से पलायन करते हैं तो इसमें कोई बुराई नही।

आरंभ के दौर में अच्छी शिक्षा को विदेश जाने का आधार माना जाता था। उच्च शिक्षा और बड़े विश्वविद्यालयों से उपाधि हासिल करने के लिए मां-बाप अपने बच्चों को ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देशों में पढ़ने भेजा करते थे। लेकिन धीरे-धीरे जब विदेशों में भारत की तुलना में कई अधिक व्यवस्थित और उन्नतिशील जीवन सुव्यवस्था से लोगों का सामना हुआ, तो उन्होने विदेशों को अपनी मंजिल बना लिया। आज दुनिया भर में सबसे चर्चित, शक्तिशाली और व्यवस्थित देश अमेरिका भारतीय प्रतिभा की सर्वोच्च पसंद है। अमेरिका के व्यवसायिक वर्गो में सबसे अधिक डॉक्टर, इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, एकाउंटेंट, वकील या वैज्ञानिक भारत में जन्म लेने वाले वो युवा हैं जिन्हें अपने देश में पहचान और सम्मान की कमी ने विदेशों की राह दिखाई और आज वे अलग-अलग देशों में भारत के लिए नाम कमा रहे हैं। अगर भारत में सही अवसरों और उचित सम्मान की कमी न होती तो आज दुनियाभर में बिखरे भारतवासी भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा होते जो कि आज अपने प्रियजनों को भेजे गए डॉलरों या किसी छोटे से निवेश की सूरत में मामूली से अंश दान के साथ दुनियाभर के कई बड़े देशों की मजबूत अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। हमने जब विदेश में बसे भारतीयों से बात की तो कुछ हद तक वो कारण समझ आए जो उन्हें वहां ले गए और साथ ही हमने जाने उनके मलाल और इच्छाएं भी....



 भारतीय अर्थव्यवस्था की खामियों की वजह से लिया विदेश का रास्ता...


अगर बात भारत से बाहर के देशों में किस्मत आजमाने वालों की हो रही है, तो उस कटघरे में मैं खुद भी एक सवालिया निशान हूं। मैं भी अपने देश से 6482 मील दूर सिडनी में आकर इस मुद्दे की विवेचना कर रही हूं।
पर इसे मैं तो अपनी किस्मत ही कहूंगी। मेरा भारत से ऑस्ट्रेलिया आने का प्रमुख और एकमात्र कारण मेरे पतिदेव हेमंत रावत हैं। जो कि आधे दशक से अधिक समय सिडनी में गुजार चुके हैं। और जब अपना चंडीगढ़ छोड़कर यहां ऑस्ट्रेलिया बस चुके अपने पतिदेव के सामने यह सवाल मैंने रखा वो और उनके दोस्त यहां आए क्यों, तो जवाब में सीधा सा सवाल था... वॉट डू यू एक्सपेक्ट फ्रॉम अस..? 25-26 साल के हो रहे थे हम और इंडिया में कुछ नही रखा था, पांच हजार से पच्चीस हजार तक पहुंचने में ही एक दशक से ज्यादा का समय लग जाता और जब तक पहुंचते तब तक महंगाई कहीं की कहीं पहुंच चुकी होती... और भारतीय अर्थव्यवस्था को कोसने वाला लैक्चर शुरू हो गया। पर भावार्थ मेरे पल्ले पड़ चुका था, कि तरक्की की सीढ़ी चढ़ती रोजमर्रा की मंहगाई और गर्त के अंधेरे में जाते रोजगारों के अवसरों ने मेरे घर पर भी मार की थी।

यहां जीवन बहुत आसान है, पर अपनों के बिना जीना बहुत मुश्किल है...

चालीस साल पहले भारतीय न्यायपालिका से जुड़े उत्तर प्रदेश राज्य में अलीगढ़ के रहने वाले जीके बंसल को, भारत सरकार ने एक साल तक पढ़ाई करने के लिए अमेरिका भेजा था। उस दिन को आज भी याद करते हुए बंसल जी एक ही बात कहते हैं यहां आकर गलती कर दी। यहां पैसा है, समानता है, इज्ज़त भी चलो मिल ही जाती है, पर अपनापन और प्यार कभी इस देश से नहीं हो पाया।

उनसे पूछने पर कि अगर ऐसा था तो वो शुरुआत में ही वापस क्यों नही चले गए - वो एक लम्बी सांस लेकर कहते हैं। जब मैं यहां आया था तब 25 साल का था, उस उम्र में काम करने का जोश होता है, परिवार और बच्चों को एक आसान और आरामदायक जीवन देने की प्राथमिकता होती है…, और यहां अमेरिका में पैसे कमाना जरा सा भी मुश्किल नहीं है, यहां का कानून आपको एक सुरक्षित वातावरण देता है, ऐसा जिसका अनुभव भारत में रहते कभी नही लिया जा सकता। यहां उंच-नीच, भेद-भाव कोई नही मानता। सुबह कचरा उठाने वाले को आप शाम को देखेंगे तो पहचान नही पायेंगे। उसके पास सब कुछ है। यहां बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा है, रोज़गार के अनगिनत अवसर हैं, तरक्की के आम और सीधे रास्ते हैं। भारत की तरह यहां आम जीवन में भ्रष्टाचार नही है।

कमी केवल इस बात की है कि यहां जीवन आसान होते हुए भी अपने लोगों के बिना जीना बेहद मुश्किल है। ऐसा नही कि यहां हिंदुस्तानियों की कमी हैयहां तो बस समय की कमी है। उन्हें इस बात का भी बेहद अफसोस है कि उनके माता पिता ने कभी भी भारत छोड़कर उनके साथ रहने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन इस बात की तसल्ली भी है कि वो आज इस स्थिति में हैं कि अक्सर भारत जाकर अपनी यादों को ताज़ा करते रहते हैं उनका मानना है कि यहां पैसा ज़रूर है लेकिन वो सामाजिक और पारिवारिक मूल्य नहीं जो भारत में होते हैं। इसलिए उन्होंने अपने परिवार में भारतीय बहुएं लाने का फैसला किया है। उनके दो बेटे हैं। एक बेटे के लिए वो भारतीय बहू ला चुके हैं और दूसरे बेटे के लिए भी भारतीय बहू की तलाश है। 

ऑस्ट्रेलिया नहीं आता तो आज भी अच्छे भविष्य का सपना लिए इधर-उधर ठोकरें खा रहा होता...
जी.के बंसल जी को लगता है कि भारत छोड़ कर उनसे गलती हुई है। पर पिछले पांच सालों से ऑस्ट्रेलिया में बस चुके नवप्रीत चोपड़ा को लगता है कि अगर उन्होने उस समय भारत से पलायन नही किया होता तो शायद आज भी वो अच्छे भविष्य की कामना करते किसी अच्छे अवसर की तलाश में भटक रहे होते। हालांकि पहले-पहल ऑस्ट्रेलिया आकर उन्हें कई तरह के कामों में अपना हाथ आजमाना पड़ा, पर आज की स्थिति उन्हें एक जिम्मेदार और परिवार को संभालने वाले बेटे का दर्जा देती है। जिसे वो 
भारत में रह कर कर पाते या नहीं, यह संशय की बात है।

वास्तव में ऑस्ट्रेलिया की सरकार हर मायने से साथ देने वाली है। यहां भेद-भाव, रंग-भेद जैसी कोई बात नही है। सबके लिए नियम कानून एक हैं। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि सरकार की नीतियां हर तरह से सरल और फायदा देने वाली हैं। तभी यहां के लोग भी बेहद सरल और सहज स्वभाव के हैं। किसी पर कोई दबाव नही।उससे भी महत्वपूर्ण महंगाई ज्यादा होते हुए भी यहां रहने वाला व्यक्ति इतनी आमदनी रखता है कि वो भारत के दो घर चला ले। नवप्रीत बताते हैं कि ऐसा नहीं कि सभी लोग यहां कुछ समय बिताने के बाद यहीं रहना चाहते हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें सुनहरे भविष्य के सपने घुमाते ही रहते हैं। जैसे कि उनके मित्र रघु जो कि पहले तो चंडीगढ़ से सिडनी आए और आज कल अमेरिका जाने का जुगाड़ लगा रहे हैंरघु को लगता है कि अमेरिका जाकर उनकी जिंदगी और बेहतर हो जाएगी और वो अपनी मनमर्जी के क्षेत्र में आगे भी बढ़ सकेंगे। लेकिन भारत वापस जाने का ख्याल किसी को नही आता। बावजूद इसके कि वो भारत में गुजरा अपना समय हमेशा याद करते हैं।

 नवप्रीत और उनकी पत्नी रुपेंद्र कौर अपने परिवार को बेहद चाहते हैं और उन्हें साथ रहता देखना चाहते हैं। नवप्रीत बताते हैं कि जिस दिन उन्हें परमानेंट रेजिडेंसी प्राप्त हुई उसी दिन से वो अपने माता पिता को अपने पास बुलाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनकी उम्र अधिक होने के कारण उन्हें वीजा नही मिल पा रहा है। रुपेंद्र कौर आजकल अपने दो महीने के बेटे रुहान की सेवा में लगी हैंवो अपने शुरूआती दिनों को याद करके कहती हैं कि काम तो मैं चंड़ीगढ़ में भी किया करती थी, पर यहां काम करने का वातावरण एकदम नया और आरामदायक हैबॉस होते हुए भी कोई किसी पर दबाव नही बना सकता और आपकी मेहनत का जो फल मिलता है वो प्रोत्साहक है और जोश के साथ हर दिन मेहनत करने के लिए प्रेरित करता है।

रुपेंद्र भारत में रहते हुए अपने परिवार को चलाने के लिए अर्थपूर्ण अंशदान का ख्याल भी नही कर सकती थीं और यहां वो नवप्रीत और अपने बेटे की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए हर प्रकार से सक्षम हैं। अभी रुहान छोटा है पर थोड़े समय बाद वो एक बार फिर नौकरी करना चाहती हैं।


लेकिन मयूर की मंजिल केवल भारत है...

हेमंत और नवप्रीत दोनों ही ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता ले चुके हैं, दोनों ही भारत में छूटे अपने परिवारों से बेहद प्यार करते हैं, और चाहते हैं कि सब साथ मिलकर रहें। लेकिन इसके लिए वापस भारत जाकर बसना उन्हे कहीं से भी सही उपाय नही लगता। दोनों का एकमत सवाल है वापस जाकर हम करेंगे क्या? यहां हम बस चुके हैं और यहां रहकर अपने परिवार और संबंधियों को सहयोग करने के लिए हमारे पास ज्यादा सुविधाजनक अवसर है।
पर कुछ सकारात्मक सोच वाले लोग भी मौजूद हैं जो ऐसा नहीं मानते और अपने हिन्दुस्तान लौटकर आना चाहते हैं। चंडीगढ़ से दुबई में काम के लिए रहने आए मयूर आचार्य कहते हैं कि चाहे जो हो उनकी मंजिल उनका देश भारत ही है। कुछ सालों पहले मयूर पढ़ाई के सिलसिले में ऑस्ट्रेलिया आए लेकिन उनकी माने तो यहां आने के पहले हफ्ते में ही उन्होंने मन बना लिया था कि वो भारत में ही रहना चाहते हैं।

इतना ही नही कुछ ही समय में मयूर भारत वापस भी चले गए और वहां उन्हें बैंगलौर में एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छी तनख्वाह पर नौकरी भी मिल गई लेकिन एक अच्छी आर्किटेक्ट होने के बावजूद उनकी पत्नी भावना को भारत में कोई खास कामयाबी नही मिल पा रही थी। अपने लिए कामयाबी की राह तलाशती भावना को आखिर में दुबई स्थित बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से पढ़ाने का आमंत्रण मिला और यह उनके मन माफिक था। तब भावना ने दुबई में पढ़ाने का फैसला लिया और मयूर ने अपनी कंपनी की दुबई स्थित शाखा में अपना तबादला करा लिया। लेकिन अभी भी वापस भारत आकर बसने के बारे में मयूर के मन में कोई संशय नही है। उसका मानना है कि उम्र के चालीसवें पड़ाव तक ही वो काम करेगा और उसके बाद अपने घर, अपने लोगों के बीच चंडीगढ़ आकर रहना ही उनके लिए एकमात्र लक्ष्य है। क्योंकि भारत आखिर उनका घर है। और वो अपना घर नही छोड़ना चाहते हैं।

कुछ लोगो की बातों से ही हम उन तमाम लोगों की धारणाओं को समझ सकते हैं, जो किसी न किसी कारण से अपने प्रियजनों, अपने घर, अपने देश से दूर हैं। अब इसका दोष चाहे हम भारत में विकास के कम होते मौकों को दें या तरक्की और पहचान के साथ बेहतर जिंदगी के सपने साकार करने वाले विकसित देशों के आकर्षण को..., सच तो ये है कि भारत में रह रहे परिवार अपने बच्चों के दूसरे देश में सफल जीवन को देखकर तसल्ली कर रहे हैं तो घर छोड़कर विदेश में घर बना चुके बच्चे अपने परिवारों और बच्चों को बेहतर और आरामदायक जिंदगी देने में कामयाब होने की तसल्ली कर रहे हैं।

पर मां-बाप के लिए आसान नहीं...

बच्चों की बहुत याद आती है...

हेमंत के पिताजी भावुक हो जाते हैं और बताते हैं, कि बच्चों की याद तो बहुत आती है। जिस वक्त हेमंत ने ऑस्ट्रेलिया जाने का फैसला किया मैंने उसे बहुत समझाया था लेकिन उसकी कैरियर की फिक्र भी गलत नहीं थी। पर क्या करें मां-बाप हैं, बच्चों से दूर रहना आसान नहीं। मिसेज रावत बताती हैं, बच्चे घर से दूर हैं तो अब घर सूना हो गया है। यह सोच के ज़रूर अच्छा लगता है कि बच्चे अच्छे से रह रहे हैं। पर तीज- त्यौहार पर या किसी पारिवारिक फंक्शन के मौके पर जब सबको बहू-बच्चों के साथ देखती हैं, तो अपने बहू-बेटे की भी बहुत याद आती है। रावत जी तो अभी भी यहीं चाहते हैं कि बच्चे यहीं आकर बस जाएं।


हम तो इसके लिए तैयार थे..

दूसरी तरफ मयूर के पिताजी माधव आचार्य जी यथार्थवादी नज़रिए से बात करते हैं। वो कहते हैं कि मेरा बेटा और बहू दोनों ही इतने क्वालिफाइड हैं, ऐसे में वो अगर अपने लिए नए शिखर खोजना चाहते हैं तो उनका स्वागत है। वैसे भी चंडीगढ़ में करियर के इतने मौके नहीं। जब उन्हें सफलता मिल रही है तो मुझे तो बेहद खुशी होती है। आचार्य जी साफ कहते हैं कि - मैंने अपने बच्चे को कोई पारिवारिक व्यापार तो सौंपा नहीं है कि वो यहीं रहकर उस विरासत को आगे बढ़ाए। वो खुद अपने पैरों पर खड़ा हुआ है और आज सफल है। फिर हमने उसके बचपन से ही खुद को इसके लिए तैयार किया था कि वो सुनहरे भविष्य के लिए हमसे दूर कहीं रास्ता चुन सकता है। आचार्य जी कहते हैं कि उनके बेटे को भारत से प्यार है और वो सिर्फ कुछ सालों के लिए बाहर हैं, फिर वो यहीं लौट आएगा। बेटे की खुशी में ही उनकी खुशी है। उन्हें बेटे और बहू पर गर्व है और वो साफ कहते हैं कि इतनी दूरी होते हुए भी हम पास है। अगर कल को उन्हें मयूर की ज़रूरत हो तो वो तुरन्त चला आएगा।  


निधि रावत, 
ऑस्ट्रेलिया संवाददाता

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