पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय
मातृभाषा दिवस के अवसर पर हमने हरियाणा के तीन ऐसे खिलाड़ियों से बात की जो
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। फर्श से उठकर अर्श पर पहुंचे हरियाणवी खिलाड़ियों को लेकर और लोगों की तरह हम
खबरनवीसों में भी अक्सर यह धारणा रहती है कि इनकी अंग्रेज़ी अच्छी नहीं होती और
कुछ ‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म का असर कि हमने
इनसे इसी मुद्दे पर बात करने की ठानी। इनसे पूछा कि आज के ज़माने में जब
हिन्दुस्तान में अंग्रेज़ी को इतना ज्यादा मान और महत्व दिया जाता है, हर जगह
खिलाड़ियों से अंग्रेज़ी में ही सवाल-जवाब किए जाते हैं, अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं
में भी अंग्रेजी में ही घोषणाएं की जाती हैं, तो ऐसे में क्या उन्हें भी कभी अच्छी
अंग्रेज़ी नहीं आने के कारण परेशानी या शर्म का सामना करना पड़ा...? क्या वो कभी अन्य साथी
खिलाड़ियों को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते देख कर हीन भावना से ग्रसित हुए हैं?...
सोचा तो यह था कि दुखती रग
पर हाथ रखा है, ट्रैजिक से जवाब मिलेंगे और उस पर एक ट्रैजिक सी स्टोरी बनाकर
पाठकों को परोसेंगे। लेकिन जब इनसे बात की तो पता चला कि यह अवधारणा सिरे से गलत
है। इन खिलाड़ियों ने विशुद्ध देशी अंदाज़ में इतने रोचक जबाव दिए कि हम लाजवाब हो
गए... और तब पता चला कि हिंदी-अंग्रेजी का इश्यू बनाना उन लोगों का काम है जिनके
पास कुछ हासिल करने के लिए नहीं होता सिर्फ एटीट्यूड होता है,.. ना कि उन लोगों का
जिनके पास उपलब्धियां होती हैं...
सुमन कुंदु मलिक- (हरियाणा, पानीपत से, अंतरराष्ट्रीय कुश्ती पहलवान, 9 बार भारत केसरी अवॉर्ड
विजेता, 2010 कॉंमनवेल्थ गेम्स में 63 किलो फ्रीस्टाइल कुश्ती वर्ग में कांस्य पदक
विजेता)
सुमन ने हंसते हुए रोचक सा
जवाब दिया..-“जी नहीं हमें तो कभी अंग्रेजी के कारण ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। हम जब भी टीम
के साथ बाहर जाते हैं तो हमारे साथ हमारे कोच होते हैं जो पहले से हमें सब बता
देते हैं। और अगर आप रूस, जापान या कोरिया जैसे देशों में जाओ तो आपको पता चलेगा
कि इन लोगों तो बिल्कुल भी अंग्रेज़ी नहीं आती, कनाडा या यूएस के खिलाड़ियों को तो
फिर भी अंग्रेज़ी आती है पर और जगह के खिलाड़ी तो बिल्कुल ही नहीं बोल पाते। लेकिन
इसकी वजह से इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। मजे से अपनी भाषा में बात करते हैं। तो
फिर हमें क्यों फर्क पड़ेगा। भई हम तो फिर भी इनसे बहुत बेहतर है, टूटी-फूटी
अंग्रेज़ी में बात कर ही लेते हैं और अपनी बात औरों को समझा भी देते हैं।“
“2010 में पटियाला में कैम्प लगा था तब जापान से एक टीम हमें
प्रशिक्षण देने आई थी। वो लोग सिर्फ जापानी बोलते थे और हम क्या कह रहे हैं,
उन्हें समझ ही नहीं आता था। लेकिन हम उनकी बातें, इशारे सब समझ जाते थे और जब उनको
अपनी बात समझानी होती थी तो किसी तरह उन्हें घेर कर अपनी बात भी समझा ही देते थे।
हम भारतीय बहुत स्मार्ट होते हैं, भाषा आएं ना आएं हमें जो कहना होता है कह देते
हैं, और जो समझना होता है समझ लेते हैं। फिर अपनी भाषा बोलने के भी कई फायदे हैं। जैसे
कई बार तो ऐसा होता है कि अगर हमें किसी पर गुस्सा आता है, तो हिन्दी में उसके
सामने ही अपना गुस्सा निकाल लेते हैं, ऐसे कह देते हैं कि.. ठहर जा तुझे तो हम अभी
उठा कर पटक देंगे....., क्योंकि हमें मालूम है सामने वाले की भाषा अलग है और वो
हमारी बात नहीं समझ पाएगा। जब हमारी भाषा इतनी बढ़िया है तो हमें अंग्रेजी के पीछे
भागने की क्या ज़रूरत।“
मनोज कुमार- (अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज, हरियाणा के कैथल जिले से, कॉमनवैल्थ गेम्स 2010 में
स्वर्ण पदक विजेता)
इस बारे में जब हमने बॉक्सर
मनोज कुमार से बात की तो वो तुरंत बोले- “नहीं मैडम जी हमें तो आजतक
ऐसी कोई परेशानी नहीं हुई। हम तो खिलाड़ी है, देश के लिए खेलते हैं। और वैसे भी
हमें बॉक्सिंग की टर्मिनोलॉजी की तो बहुत अच्छी समझ है। इसलिए किसी दूसरे देश में
जब खेलने जाते हैं तो वहां जो भी घोषणा होती है वो सब एक बार में समझ में आ जाता
है। हमारी बॉक्सिंग में वेट कंट्रोल बहुत ज़रूरी है तो हमारा ध्यान पूरी तरह से इस
पर रहता है ना कि इस पर कि अंग्रेजी में जवाब दें या हिंदी में। हमें यह मालूम है
कि कोई कमांड मिली है तो कैसे फॉलो करनी है बस बाकी अपने हरियाणवी यार दोस्त होते
हैं, मिलकर बैठते हैं, बातें करते हैं। अंग्रेज़ी की कमी तो कभी महसूस ही नहीं
होती। बल्कि बाहर कहीं अपने यार दोस्त भी साथ हों तो हम हिन्दी भी ना बोलते,
हरियाणवी बोलते हैं।“
“वैसे भी हमारे खेल में दो चीज़े महत्वपूर्ण हैं, एक तो आपको
मुक्केबाजी अच्छे से आनी चाहिए ताकि आप बहुत अच्छा प्रदर्शन करों और दूसरा अपना
राष्ट्रगान आना चाहिए जो हमें जीतने के बाद सबके सामने गाना है। उसके बाद तो
अंग्रेजी हिन्दी के कोई मायने नहीं रह जाते। आप एक बार जीत जाओ उसके बाद तो आपसे
बात करने के लिए लोग हिन्दी भी सीखते हैं।“
अमित कुमार दहिया- (हरियाणा के सोनीपत से, देश के सबसे कम उम्र के रेसलर,
लंदन ओलंपिक के लिए चयनित, वर्ल्ड रेसलिंग चेम्पियनशिप, बुडापेस्ट में रजत पदक
विजेता)
देश के सबसे युवा पहलवान,
21 साल के अमित कुमार दहिया से जब हमने इस बारे में पूछा तो उनका भी कुछ ऐसा ही
जवाब था- “देखिए जी मैं तो खिलाड़ी हूं। मेरा ध्यान सिर्फ खेल पर रहता है, इस पर कभी
नहीं कि मुझे अंग्रेजी आनी चाहिए या नहीं। जब मैं अच्छा खेलूंगा तो लोग सिर्फ उसकी
बात करेंगे और मुझे याद रखेंगे। इस बात के लिए थोड़े ही याद रखेंगे कि अंग्रेज़ी
अच्छी है या नहीं। मेरा चुनाव भी तो खेल की वजह से हुआ है। ना तो अंग्रेजी बोलने
से मैं जीत जाऊंगा और ना ही हिन्दी बोलने से हार जाऊंगा। उसका फैसला तो मेरे खेल
से ही होना है। और वैसे भी अंर्तराष्ट्रीय ईवेन्ट्स में जाकर इतना तो हम सभी समझ
चुके हैं, कि क्या कहा जा रहा है, कैसे कहा जा रहा है, क्या करना है। बस अपने खेल
के बारे में हमें जानना और समझना है, इसके आगे ध्यान ही नहीं जाता। आप जब
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने जाओ तो पता चलता है कि वहां बहुत से ऐसे देशों के
खिलाड़ी होते हैं जिन्हें ज़रा सी भी अंग्रेज़ी नहीं आती, वो सिर्फ अपनी मातृभाषा
बोलते हैं और समझते हैं। यहां सबको खेलने से मतलब होता है ना कि अंग्रेज़ी हिन्दी
से फिर हम क्यों अपनी हरियाणवी छोड़कर अंग्रेजी के पीछे भागे...?”
दिल्ली से चित्रलेखा
अग्रवाल



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