Friday, 21 March 2014

फेसबुक या ‘फेंक’बुक


चुनावी मौसम में फेसबुक बना राजनीतिक पार्टियों की बहस का अखाड़ा, लोग अपने पसंदीदा नेता को आगे रखने के लिए विरोधी उम्मीदवारों की छीछालेदर पर उतरे। अभद्र भाषा, गालियों, व्ययंग-बाणों से और अद्भुत गूगल खोजों का हो रहा है भरपूर इस्तमाल...


निधि रावत,
ऑस्ट्रेलिया संवाददाता  


पहले वो फेस बुक पर दोस्त बने, आजकल दुश्मन हैं।
किसी जमाने में फेसबुक, ट्विटर, वाट्सअपॅ को नये दोस्त बनाने के लिए या अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए एक जरिया माना गया था। पर पिछले कुछ समय से चुनाव के हो-हल्ले के दौरान राजनीतिक पार्टियों ने सोशल नेटवर्किंग साईट्स को प्रचार का माध्यम क्या बनाया, लोगों ने इसे बहस का अखाड़ा ही बना डाला है। हालत यह है कि अगर आप विचारों की अभिव्यक्ति के जायज़ या नाजायज़ होने के अंतर को अंकित करना चाहते हैं, तो कुछ खास नहीं करना है बस फेसबुक के दो दोस्तों के वाकपट्ट युद्ध नुमा पोस्ट ले लीजिए और यकीन जानें इससे अच्छा उदाहरण आपको राजनीतिक पार्टियों के सम्मेलनों की तीखी नोक-झोंक में भी नही मिलेगा। मुश्किल यह है, कि यह तो तय हो गया कि इन सोशल नेटवर्किंग साईट्स को प्रचार का माध्यम बनायेंगे और दूर गांव तक पहुंचेंगे पर यह तय नही हुआ कि प्रचार किस का करेंगे। अपनी पार्टी के उज्जवल भविष्य और सकारात्मक सोच का या अन्य दलों के दलदलीय इतिहास और भूल-चूक का? फेंकने पर उतरे हुए कार्यकर्ता और समर्थक जनता के चलते आजकल फेसबुक फेंकबुक बना हुआ है। लोग खूब फेंक रहे हैं, और लोग ही खूब लपक भी रहे हैं। और कुछ तो जो लपका है, उसे और धारदार बनाकर फिर से फेंकने में जुटे हैं..।

अपने पसंदीदा नेताओं के लिए दोस्तों से दुश्मनी निभा रहे हैं लोग
खैर राजनैतिक दलों की सोच चाहे जो भी हो पर आम लोगों की खास टिप्पणियों ने कई विचारों और भावनाओं को आहत करने का कोई तरीका शेष नही छोड़ा है। एक दूसरे के प्रिय नेता के प्रति दुष्प्रचार से आहत लोग किसी भी तरह से बहस को छोड़ना नहीं चाहते और धीरे-धीरे एक छोटी सी पहल बढ़ते-बढ़ते टीका- टिप्पणियों और आरोपों का एक बड़ा पहाड़ बन जाता है। एक दूसरे के विचारों की चोट से परेशान लोग एक दूसरे को बैन कर देते हैं और इस तरह कुछ समय पहले शुरू हुई उनकी दोस्ती वैचारिक मतभेद के आधार पर समाप्त हो जाती है।

तीखे शब्दों, तू-तड़ाक की भाषा और खुली चुनौतियों से रंगी फेसबुक की दीवारें
यह सच है कि हम किसी न किसी भावना से, किसी न किसी दल या व्यक्ति का समर्थन करते हैं, और दिल से चाहते हैं कि हार जीत की इस घड़ी में सभी हमारे पसंदीदा दल या व्यक्ति के समर्थक हों। पर अपनी इस सकारात्मक भावना कि अभिव्यक्ति दूसरों के सामने रखते समय हमारे शब्द बेहद तीखे और नकारात्मक क्यों होने लगे हैं। हम जिस दल या व्यक्ति को अपने उम्मीदवार का प्रत्यक्ष रुप से सबसे ताकतवर विपक्ष समझते हैं उसके लिए हमारे शब्द तू-तड़ाक से बढ़कर गाली समेटे अभद्र वाक्य बनने लगते हैं।
अभी हाल का ही एक कमेंट देख लें, आम आदमी पार्टी के पेज पर एक मोहतरमा लिखती हैं कि ‘‘पहले एमपी बनकर दिखा दें मोदी, फिर पीएम का सपना देखें”, सोचने वाली बात है पिछले साल जब आम आदमी पार्टी का कोई अस्तित्व नही था तो क्या मैडम मोदी के गुण बखान करने से वंचित रही होंगी। लेकिन आज उनको आम आदमी पार्टी अपने ज्यादा करीब लग रही है, तो वो खुली चुनौती पोस्ट करने से नही हिचकिचा रहीं, लेकिन खुदाया कल अगर मोदी देश के प्रधानमंत्री बन ही गए, तो ये अपनी ही चुनौती के जाल में उलझी नही महसूस करेंगी क्या?
पिछले कुछ समय से जोश में आकर कई लोगों ने कई तरह कि फब्तियां और ताने एक दूसरे की तरफ उछाले हैं,कल जब चुनावी शोर थम जाएगा तो क्या ये अपनी स्थिति को फेयर प्लेयर के तौर पर वापस स्थापित कर पायेंगे।
भई मुझे तो लगता था कि सोशल नेटवर्किंग साईट्स का हिस्सा होने के नाते मुझे हर पार्टी के कार्यकर्ताओं से, पार्टी द्वारा किए गए अच्छे और सामाजिक कार्यों की जानकारी मिल जाएगी पर यहां तो हर दिन एक नई जंग है। अगर खबर हो कि मोदी ने केजरीवाल को मिलने का समय नहीं दिया तो वो तय करती है कि उस पूरा दिन और आने वाले कई दिनों तक किस प्रकार के आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला चलेगा।

एक दूसरे के उम्मीदवारों को नीचा दिखाने के लिए गूगल की मदद से की जा रहीं हैं दुर्लभ खोजें, गलत अफवाहों और डॉक्टर्ड तस्वीरों का बाज़ार भी गर्म
एक और बात जो बेहद अहम है - ऐसा माना जाता है कि राजनैतिक दल चुनाव के समय एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कई मौकों और मुद्दों को जमा करके रखते हैं। पर फेसबुक और वाट्सअपॅ के जरिए दुष्प्रचार करने वालों ने यह साबित कर दिया है कि राजनीति में लोगों ने कोरी घास ही काटी है, और आम जनता का गड़े मुद्दों, मौकों, बयानों, परिणामों और स्थितियों पर शोध कई अधिक गहरा और सटीक है। लोग सोशल नेटवर्किंग साइट पर डालने के लिए गूगल बाबा की जय बोलकर ऐसे-ऐसे तथ्य लेकर आते हैं, ऐसी ऐसी खोजें की जाती हैं, कि शायद राजनैतिक दलों और पत्रकारों का सर भी चक्कर खा जाता होगा कि कहां जाकर डूब मरेंये सवाल, ये मुद्दे, ये पल आखिर उनकी पहुंच में आने से कैसे चूक गए। यह तो हुई चुनाव की बात...। पर जब चुनाव के बाद आम जनता को होश आयेगा तो उसे खुद समझ आएगा कि विचारों की अभिव्यक्ति के जुनून ने उसके कई दोस्तों को उससे दूर कर दिया है।
चुनाव के अलावा भी सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर कई ऐसे बुद्धिजीवी मौजूद हैं जो विवादास्पद बयानों और उक्तियों का इस्तेमाल करके अपनी गर्दन दूसरे के हाथों सौंप देते हैं। लिखते समय उनकी क्रांतिकारी सोच के बेलगाम घोड़े उन्हें इतनी दूर ले जाते हैं कि आम लोगों की आहत होती भावना को देख पाना, समझ पाना उनका दिलचस्पी का विषय नहीं रहता। वो तो बस अपनी बात लिख कर मन को शांत करना चाहते हैं, बाकी दुनिया माने, न माने..., तो जाए तेल लेने। उन्हें तो बस यह बताना है कि वो अलग सोच रखते हैं, फिर चाहे उसकी ऐवज में कोई उनके सोशल नेटवर्किंग एकाउंट को ब्लॉक कर दे, अनॅफ्रैंड कर दे या उनकी रिपोर्ट ही कर दे।
ऐसा नही कि सोशल नेटवर्किंग पर केवल अलग विचारधारा के लोग ही टकराते हैं। कई बार हमें अच्छे दोस्त भी मिलते हैं। पर इस खास समय चुनाव की गर्मी ने ऐसे लोगों की धर पकड़ तेज कर दी है, जिन्हें दो चार बाते सुनाकर मन को शांति मिल सके। बहरहाल मुझे उम्मीद है कि आने वाले कुछ समय के बाद माहौल फिर से पहले जैसा हो जाएगा, और किसी को भी रोज-रोज की बहस में पड़ने की जरुरत नही पड़ेगी।  


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