Wednesday, 12 March 2014

प्रेम हो तो ऐसा हो...

 ब्रेन कैंसर पीड़ित शिखा के लिए तीन महीने पहले डॉक्टरों ने साफ कहा था कि वो केवल 10-15 दिन की मेहमान हैं, लेकिन दीपक ने हिम्मत नहीं हारी.... दवाएं बदली, दुआएं मांगी, प्यार और विश्वास के साथ कोशिश करते रहे.. और अब शिखा ना केवल सलामत हैं बल्कि उनकी हालत में दिन-प्रतिदिन सुधार हो रहा है...

  



प्यार हम सभी को होता है. हम सभी ज़िन्दगी में कभी न कभी इसके गहरे हल्के रंगों से रूबरू होते हैं। लेकिन कुछ लोग इस एहसास को हर मापदंड, हर परिभाषा से ऊपर ले जाकर एक तपस्या, एक जूनून की तरह खुद में आत्मसात कर लेते हैं और मिसाल बन जाते हैं दुनिया के लिए। आपके लिए उत्तर प्रदेश राज्य के फैज़ाबाद शहर में रहने वाले एक ऐसे ही दम्पति की सच्ची कहानी, जहां दुःख और कष्ट का हर रंग इनके प्यार, विश्वास और जिंदादिली के आगे फीका पड़ गया। हमारी कहानी के माध्यम से अगर उनका यह संघर्ष अमानवीय होते इस समाज की चेतना पर चोट कर सके तो उनका संघर्ष सार्थक हो जाएगा।

 अपने घर से उस जोड़े के घर तक का मेरा सफ़र मुश्किल से दस मिनट का रहा होगा। पर उस छोटे से समय में मन अनेक ऊँची-नीची अनुभूतियों में गोते लगा रहा था। भावनाओं और कल्पनाओं के उस सागर में भाव-विभोर मैं यह सोच पाने में असमर्थ थी कि अगले कुछ पलों में होने वाली मुलाकात कैसी होगी। लेकिन जब दरवाज़े पर ही आपके होंठ मुस्कुरा उठें तो उस घर के अन्दर बसने वाली खिलखिलाहट का अंदाज़ा अपने आप लग जाता है। दीवार पर लगा काग़ज़ी नोटिस और उस पर छोटी-छोटी मासूम सी लिखावट में चप्पल बाहर ही उतारने का अनुरोध मन को प्रसन्न कर गया और फिर मैं उन दोनों से मिली।

दीपक और शिखा,  दोनों ने अपने प्यार के लिए न सिर्फ समाज की रुढ़िवादी सोच और परम्पराओं से टक्कर ली बल्कि कैंसर जैसी बीमारी से भी अथक लड़ाई लड़ी और उस पर जीत भी हासिल की। यह दोनों बैंगलोर में फार्मेसी की पढ़ाई के दौरान एक दूसरे से मिले थे। कॉलेज की जान पहचान दोस्ती में बदली और दोस्ती प्यार में। हालाँकि शिखा के जीवन में कैंसर ने उससे पहले ही हलचल मचानी शुरू कर दी थी। बैंगलोर आने से पहले, शिखा ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ चुकी थीं। शिखा और दीपक का प्यार परवान चढ़ता उससे पहले ही कैंसर ने उनकी ज़िन्दगी को झकझोर कर रख दिया। कैंसर उनके शरीर में अपनी पैठ बना चुका था। वो पल शिखा के लिए सबसे दर्दनाक और कठिन पल थे।
एक तरफ दीपक से उनके रिश्ते को घरवालों का भारी विरोध झेलना पड़ा तो दूसरी तरफ, कैंसर से जूझता उनका शरीर। मन और शरीर, दोनों के घाव गहरे होते जा रहे थे। विरोध दीपक के भी घर में खूब हुआ। यहां तक कि दीपक को अपने घरवालों की तरफ से बहिष्कार भी झेलना पड़ा। पर दोनों मन के मज़बूत थे। घरवालों की बेइज़्ज़ती किये बिना अपने प्यार की लड़ाई उन्होंने अपने ही तरीके से लड़ी।

दीपक ये भली भांति समझते थे कि दोनों में से एक के परिवार का साथ और आशीर्वाद उनके लिए कितनी अहमियत रखता है। शिखा के लिए दीपक की तरफ से यह एक कड़ी शर्त थी कि अगर कोई भी परिवार राज़ी नहीं हुआ तो वे अपने घरवालों की इच्छा को ध्यान में रखते हुए उनके हिसाब से शादी कर लेंगे क्योंकि प्यार सिर्फ पाना ही नहीं, त्याग भी है। शिखा ने यह शर्त स्वीकार की। दीपक के परिवार का रवैया कट्टर था। कोई उम्मीद की किरण नहीं थी। आखिरी आस थी शिखा का परिवार। उधर शिखा पर कैंसर की गिरफ़्त मज़बूत होती जा रही थी।

अस्पताल में दिन-ब-दिन गहराते दर्द और प्यार के खिलाफ अपने परिवार से जूझती शिखा की स्थिति शब्दों में बयां करना मुश्किल है। दीपक ने भले ही अपने कलेजे को कड़ा करने का भरसक प्रयास किया हो पर अपने साथी को जीवन और मौत की जंग में भला वो कैसे अकेले छोड़ देते। अपने मन से मजबूर, दीपक सबकी निगाह बचाकर अस्पताल के चक्कर लगाते रहे। दूर से ही शिखा की एक झलक मिल जाती और दीपक खुद को समझा कर लौट जाते। पर यह सब शिखा के घरवालों से ज्यादा दिन छुप न सका। कुछ मौके ऐसे भी आये जब शिखा के पिता और भाई के हाथों दीपक ने पिटाई भी बर्दाश्त की। हर तरह की यातना झेली, लेकिन प्यार ने उनके मन में घर बना लिया था, पक्का वाला घर।

सौभाग्य से शिखा का ऑपरेशन सफल रहा और वो इस घातक बीमारी को मात देकर एक आम जीवन जीने लगीं। दीपक और शिखा को एक दूसरे से दूर रखने का जब कोई भी प्रयास काम न आया तो आनन-फानन में शिखा का रिश्ता किसी और से पक्का कर दिया गया। ज़हर का घूँट पीकर शिखा सगाई के लिए भी तैयार हो गयीं। दीपक से अपने रिश्ते को दिल के कोने में सहेजकर उन्होंने ज़िन्दगी नए सिरे से जीने का फैसला किया।

लेकिन शादी तय होने के बाद शिखा ने खुद को एक ऐसे रिश्ते में बंधा पाया जो प्यार की जगह खालीपन से भरा था। कोई भावनाएं नहीं, आत्मीयता नहीं। लड़के के घरवालों ने रिश्ता तय करते समय, शिखा को इंसान के तौर पर नहीं एक सामान के तौर पर देखा। एक ऐसा सामान जिसकी बोली मिलने वाले दहेज़ के रूप में लगायी गयी। बकौल शिखा, वो दुनियादारी के कड़वे खेल को समझती हैं। शादी के बाद वो कुछ ही दिन जिंदा रहतीं और फिर दहेज़ का सारा पैसा भी उनके सुसराल वालों को मिलता। अपने होने वाले ससुराल की इस घटिया सोच को वो समझती थीं।

फिर भी बाप और माँ का दिल रखने की खातिर, उन्होंने सब सहन करने की कसम खा ली। बस शिखा की एक शर्त थी। उन्हें दहेज़ के पैसे का आधा हिस्सा अपने नाम चाहिए था, ताकि अपनी तबियत बिगड़ने पर उन्हें किसी से कुछ मांगना न पड़े। ये बात उनके सुसराल वालों को नागवार गुजरी। शिखा याद करते हुए कहती हैं कि उनके पिता तो उसके बाद भी जिद पर अड़े रहे क्योंकि उन्हें किसी और जाति में अपनी बेटी का विवाह मंज़ूर न था। पर आखिरकार शिखा की माँ ने अपनी बेटी की अनकही फरियाद को सुना, उसके उन आंसुओं को जान लिया जो शिखा ने अन्दर ही पी लिए थे। शिखा के माता-पिता को समझ आने लगा कि, शिखा के लिए दीपक से बेहतर वर वो नहीं ढूंढ पाएंगे जो बिना किसी लालच और बिना किसी शर्त के उनकी मौत से जूझती बेटी को अपनाने के लिए तैयार था।

सादे से समारोह में दोनों का विवाह संपन्न हुआ, जिसमें सिर्फ शिखा के परिवार ने शिरकत की। दीपक के घर में उनकी पांच चचेरी बहनों के विवाह में कोई अड़चन न आये, इसलिए उनके परिवार ने जात-बिरादरी वालों के डर से दीपक से हर रिश्ता तोड़ लिया। बहुत सी ख़ुशी और थोड़े से बुझे मन से दोनों ने अपना अलग संसार बसाया। दोनों बेहद खुश थे।

लेकिन शादी के कुछ ही समय बाद एक बहुत बड़ा दुःख उनकी परीक्षा लेने आ पहुंचा। शिखा को ब्रेन कैंसर हो गया था। तमाम दुखों के बावजूद दीपक ने अपने मन को हारने नहीं दिया, खुद को टूटने नहीं दिया और शिखा का मनोबल बनाये रखा। आंधी चाहे जितनी बड़ी हो हर दिए की लौ बुझा सकने की ताब नहीं रखती। दीपक ने अपनी नौकरी के साथ साथ शिखा के इलाज का बीड़ा उठाया। कई अस्पतालों के चक्कर काटे। बहुत जगह इलाज कराया। पैसे की कमी और घरवालों के साथ के बिना ही दोनों इस बुरे समय की पीड़ा से जूझते रहे। दीपक पूरे दिन काम करके घर आते, खाना बनाते, शिखा का खयाल रखते, दवाईयां देते और उन्हें वक्त पर कीमोथेरेपी के लिए भी ले जाते, हर तरह की सावधानी बरतते जो शिखा के इलाज के लिए ज़रूरी थी। पर कैंसर को हराना आसान नहीं था। मौत शिखा को अपनी ओर खींच रही थी और दीपक का प्यार उन्हें ज़िन्दगी से अलग नहीं होने दे रहा था। 

देश के लगभग सारे बड़े और नामी अस्पतालों से दवा और कीमोथेरेपी के कई सेशन्स के बाद, डॉक्टरों ने जवाब दे दिया। इस हद पर आकर और ज्यादा कीमोथेरेपी करने की भी अब कोई सम्भावना नहीं रह गयी थी। डॉक्टरों ने साफ़ शब्दों में कह दिया शिखा अब कुछ ही दिनों की महमान है। पर लगता था जैसे दीपक ने हठ धर लिया था कि वो शिखा को ज़िन्दगी से दूर जाने नहीं देगा। अंग्रेजी दवाओं की लगभग हर किस्म आजमाने के बाद, दीपक को एक आखिरी उम्मीद दिखी.. आयुर्वेद।

हर तरफ से मायूस होने के बाद इस दीपक ने आखिर में आयुर्वेद का दरवाज़ा खटखटाया कि उसे भी आज़मा लिया जाए। और सारी निराशाओं को जैसे निराधार बताते हुए, भारत की इस प्राचीनतम विधि ने कैंसर की जड़ों को हिला दिया। साल भर तक अंग्रेजी दवाओं और थेरेपी का दंश झेलने के बाद भी जो शिखा कुछ ही दिनों की मेहमान बची थी, वो आखिरकार दीपक के प्यार और रामदेव की आयुर्वेदिक औषधियों के चलते आखिरकार ज़िदंगी की तरफ मुड़ने लगी। दो महीने के भीतर दवाओं ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया था।

दीपक ने भी अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। ऑफिस में मिलने वाले प्रमोशन को नम्रता से अस्वीकार कर उन्होंने डिमोशन लेकर जूनियर पद पर रहने का फैसला लिया ताकि शिखा की देखभाल अच्छे से हो सके। 

बाहर से मिली दवाइयों के अलावा घर में ही उन्होंने तुलसी, जौ और गेंहू की पौध उगा ली। नियम से उनका रस बनाकर देना, काम से लौटकर खाना बनाना और घर के बाकी कामों की ज़िम्मेदारियां दीपक ने बखूबी निभाई। शिखा भी अपने शरीर की कमजोरियों और पीड़ा को दरकिनार करते हिम्मत से दीपक का साथ निभाती रहीं। घर के ऊपरी कामों के अलावा, उन्होंने अपनी कई रुचियों को उभारा और निखारा। अपने घर की दीवारों को शिखा ने अपने हाथों से बनाई पेंटिंग्स से सजाया है।


शिखा साफ कहती हैं कि उनकी तबियत में इस सुधार के पीछे दीपक की घोर तपस्या है। दोनों इसका श्रेय भगवान में अपनी श्रद्धा को भी देते हैं। पिछले ही महीने दोनों ने वैष्णो देवी की यात्रा तय की। बेहद बीमार होने के बावजूद दृढ़ इच्छा-शक्ति की धनी शिखा ने सारी चढ़ाई स्वयं पैदल की। 8 घंटे की पैदल यात्रा भले ही 24 घंटे में पूरी हुई हो पर इस नामुमकिन सी उपलब्धि का उत्साह कुछ अलग ही था दोनों के लिए। दर्शन के बाद कश्मीर की बर्फीली वादियों का लुत्फ़ उठाया। सच ! उनकी इस जीवन्तता की कहानी उन्ही के मुंह से सुनकर मैं निःशब्द रह गई। कई बार आँखें और मन दोनों छलछला उठे। अपनी सारी परेशानियाँ बहुत छोटी लगने लगीं। यह इन दोनों का एक दूसरे के प्रति अटूट विश्वास ही तो है जो अभी तक दोनों को साथ बांधे हुए हैं और दीपक का प्यार है जो शिखा को मौत के मुंह से वापस खींच लाया। 

जया वर्मा
उत्तर प्रदेश संवाददाता

1 comment:

  1. plz don't share because it's heart a lot due to personal information

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