Tuesday, 25 March 2014

“लोग सम्मान के लिए लड़ते हैं, जायज संतति साबित होने के लिए लड़ते हैं। लेकिन मैं दुनिया को बताना चाहता हूं कि मैं मिस्टर एनडी तिवारी की नाजायज औलाद हूं…” रोहित शेखर



यह उस युवक के संघर्ष की दास्तान है जिसे उसे जन्म देने वाला पिता अपना नाम नहीं देना चाहता था। उसे उसकी पहचान से वंचित रखना चाहता था। आम तौर पर ऐसे मामलों में लोग शर्मिन्दगी के कारण चुप लगा जाते हैं और ताउम्र एक गलत पहचान के साथ जीते हैं। मगर रोहित ने शर्मिदगी को परे ढकेलते हुए अपनी पहचान की लंबी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की। ओपन पत्रिका की रिपोर्टर सोहिनी चट्टोपाध्याय से उन्होंने कभी अपनी बात साझा की थी जिसे सोहिनी ने एक आलेख का रूप दिया था। इस आलेख को पढ़ कर हम रोहित के संघर्ष को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। रोहित के यह विचार उस समय के हैं जब तक कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आया था। एनडी तिवारी ने उन्हें अपना बेटा स्वीकार नहीं किया था और उनका संघर्ष जारी था। आप सब के लिए प्रस्तुत हैं इस लम्बे आलेख के कुछ महत्वपूर्ण अंश..”


"जब मैं बड़ा हो रहा था, मैं त्रिशूल फिल्म को बार-बार देखता था। उस फिल्म में अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार से कहते थे, तुम मेरे नाजायज बाप हो। उनका यह डायलॉग मुझे काफी प्रभावित करता। लेकिन जब मैंने यह जाना कि मिस्टर तिवारी मेरे जैविक पिता हैं और मिस्टर शर्मा जो मेरे स्कूल में मेरे पिता के रूप में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग अटेंड करते हैं मेरे जैविक पिता नहीं है, मुझे लगने लगा कि यह फिल्म मेरी कहानी बता रही है। इस बात ने मेरे अंदर इस जुनून को पैदा किया कि में मिस्टर तिवारी को बताऊं कि आप मेरे नाजायज बाप हैं।

मैं उनसे बहुत जुड़ाव महसूस नहीं करता था। हालांकि मैं उनसे 14 साल की उम्र से ही लगातार मिला करता था। हर तीन महीने में हम उनसे मिलने जाया करते थे। मां मुझे स्कूल से ले लेती थीं और हम उनके दिल्ली वाले मकान पर जाते थे। उन दिनों वे अपने राजनीतिक कैरियर के शीर्ष पर थे। या तो वे मुख्यमंत्री होते या केंद्र में कैबिनेट मंत्री। उनके बंगले पर जबरदस्त सुरक्षा होती, सैकड़ों लोग उनसे मिलने के लिए इंतजार करते रहते। मगर हमें आने जाने में कोई रोक नहीं होती। वहां का स्टाफ मुझसे बड़े प्यार से व्यवहार करता। मैं चकित हो जाता कि ऐसा क्यों है। मुझे स्पेशल ट्रीटमेंट क्यों मिल रहा है। हमारे लिए यह इन्सान क्या है..? यह मेरी बर्थडे पार्टी में क्यों आता है, मुझे इतने उपहार क्यों देता है..?

एक बार हम लोग उनसे मिलने लखनऊ गये थे। उस वक्त वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। तब मैंने उनके स्टेट एयरक्राफ्ट में उड़ने की फरमाइश की। मैंने उनकी गोद में बैठ कर एयरक्राफ्ट में पूरी दिल्ली का चक्कर लगाया था।

नानी ने मुझे बताया था


मैं गौर करता कि उनसे मुलाकात के बाद मेरी मां रोती हुई वापस होती। जब-जब उनसे मुलाकात होती उसके कुछ दिन बाद मेरी मां को अस्थमा का दौरा आ जाता। ज्यादातर वो और मेरी मां अकेले में बातें करते और उनमें तीखी बहस होती। उस वक्त मिस्टर तिवारी मुझे बाहर खेलने के लिए भेज देते, अपने स्टाफ के साथ। उसी दौरान मैंने महसूस करना शुरू कर दिया कि बेडरूम एक निजी क्षेत्र है और लिविंग रूम सार्वजनिक।

एक बार जब मैं 11 या 12 साल का था मेरी नानी ने मुझे बताया कि मिस्टर तिवारी मेरे असली पिता हैं। मैं उनकी बात सुनकर हंस पड़ा। जब मैंने अपनी मां से यह बताया तो उन्होंने कहा कि यह सच है। इसी कारण मिस्टर तिवारी से उनकी बहस होती है। वे उन पर दवाब डाल रही हैं कि वे मुझे अपना बेटा स्वीकार करें। लेकिन वे कहते हैं उनकी पत्नी इस बात के लिए तैयार नहीं है।

मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे

नारायण दत्त तिवारी तब मेरी मां के नजदीक आये जब वह मेरे नाना, प्रोफेसर शेर सिंह से मिलने उनके पास आया करते थे। यह सत्तर का दशक था। मेरे नाना उस वक्त केंद्रीय मंत्री थे और वे हरियाणा राज्य के संस्थापकों में से एक थे। मेरे नाना उनके लिए गुरु सरीखे थे। मेरी मां का वैवाहिक संबंध सुखद नहीं रहा और वे उस दौरान नाना के साथ रहा करती थीं। हालांकि मिस्टर बीपी शर्मा मेरे लिए अच्छे पिता साबित हुए मगर वे मेरी मां के लिए अच्छे पति नहीं थे। मेरे नाना इस बात को समझते थे। मिस्टर तिवारी को भी इस बात का अहसास था। उन्होंने मेरी मां से कहा कि उनकी शादी भी असफल साबित हुई है। वे उस दौरान पचास के लपेटे में थे। उन्होंने मेरी मां से कहा कि वे उनसे एक बच्चा चाहते हैं, क्योंकि उनकी बीवी उन्हें यह सुख दे पाने में सक्षम नहीं है। उन्होंने मेरी मां से वादा किया कि जैसे ही उनका तलाक हो जाता है वे उनसे शादी कर लेंगे। मेरे नाना ने उन पर भरोसा किया और मेरी मां भी सहमत हो गयीं।

जब मेरा जन्म हुआ तो मां ने मुझे रोहित शेखर नाम दिया, उन्हें भरोसा था कि मिस्टर तिवारी मुझे पुत्र के रूप में स्वीकार कर लेंगे। मगर जब बर्थ सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने की बारी आयी तो मिस्टर तिवारी ने यह बहाना बनाया कि इससे उनके राजनीतिक कैरियर पर नकारात्मक असर पड़ेगा। आखिरकार बीपी शर्मा को उस पर हस्ताक्षर करने पड़े।

मैं एक गुस्सैल और संशयग्रस्त किशोर था और कई बार अपनी मां पर बरस पड़ता था कि उन्होंने मेरा जीवन बरबाद कर दिया। 1993 में मिस्टर तिवारी की पत्नी गुजर गयीं और मेरी मां ने सोच अब अंतत: वे मुझे अपनी पहचान दे देंगे। लेकिन तब मिस्टर तिवारी ने हमसे सारे नाते तोड़ लिये।
आखिरकार रोहित को जीत हासिल हुई, एनडी तिवारी अब उन्हें अपना बेटा मान चुके हैं

मैं कह सकता हूं कि उन दिनों मेरी जिंदगी नरक में गुजर रही थी। मुझे पढ़ने में और सोने में परेशानी होती थी। मैं गुस्से से भरा था और खुद को अपमानित महसूस करता था। उस दौरान मैं कालेज में था, मैं डिप्रेशन और नींद ना आने की बीमारी से पीड़ित था। मैं किसी तरह क्लास जाता और पढ़ाई करता।

2002 से 2005 के बीच हम कई बार मिले। मुझे हमेशा होटल में ठहराया जाता था। कमरे में जब हम लोग अकेले होते थे तो वे हमेशा अपनी प्लेट से खाने के लिए मुझे प्रोत्साहित करते थे। कहते थे - यह तो हमारा बेटा है, अपना रास्ता खुद बनायेगा। मगर कमरे से बाहर वे बिल्कुल अलग इनसान होते थे। एक सुबह वे अपने समर्थकों से मुलाकात कर रहे थे, उस वक्त मैंने उनके कमरे में जाने की कोशिश की तो उनके अंगरक्षकों ने मुझे यह कहते हुए रोक दिया कि नहीं साहब इस वक्त नहीं। एक बार मेन गेट के बाहर मैं खड़ा था आसपास कई दूसरे लोग भी उनके इंतजार में खड़े थे। वे जब बाहर आये तो उन्होंने मुझसे निगाहें तक नहीं मिलायी।

एक-दो बार मैं उनको कह चुका था कि मैं पूरी गंभीरता से इस मसले को अदालत में ले जाने का मन बना चुका हूं। मगर वे हमेशा सोचते कि मैं ऐसा नहीं करूंगा। मैं अपने और अपनी मां के लिए यह पहचान हासिल करना चाहता था। क्योंकि हमनें इस दर्द को सहा था।

मैं दिसंबर 2005 में उनसे आखिरी बार मिला। वे किसी काम के सिलसिले में दिल्ली आये थे और मानसिंह रोड स्थित ताज होटल में ठहरे थे। मैं, मेरी मां और मेरी नानी उनसे मिलने गये थे, मगर उन्होंने हमारी तरफ देखा तक नहीं। एक घंटे से अधिक समय तक इंतजार करने के बाद हमने एक चिट में उनके लिए संदेश भिजवाया। मगर जब वे बाहर आये तो हमें दिखाते हुए उस चिट को गोला बनाकर बाहर फेंक दिया। यही वह वक्त था जब मैंने फैसला कर लिया।

हार्ट अटैक, सेरेब्रल स्ट्रोक और मुकद्मा

मेरे वकील और मैंने खूब रिसर्च की। वकील नर्वस था क्योंकि यह अनोखा मुकदमा था। इसके अलावा मिस्टर तिवारी पावरफुल आदमी थे। मैं भी डरा हुआ था। मुझे इस बात का भी डर था कि कहीं मेरे केस को पब्लिसिटी स्टंट मानकर खारिज न कर दिया जाए। इसके अलावा रात को आने वाले फोन कॉल की मुसीबत अलग थी। पिछले एक दशक से हमें इस तरह के धमकी भरे फोन आते रहते थे कि मुझे टुकड़े-टुकड़े कर देंगे और गटर में फेक देंगे। मिस्टर तिवारी हमेशा इस मामले से अपना कनेक्शन होने की बात से मुकर जाते, कहते जरूर हमारा कोई दुश्मन होगा।

5 जुलाई 2007 को मुझे दिल का दौरा पड़ा। मैं घर में बैठकर विंबलडन के मुकाबले देख रहा था कि मुङो पीठ में जबरदस्त दर्द का अहसास हुआ। मुझे देखने घर आये डॉक्टर को यह समझ नहीं आया कि मुझे हार्ट अटैक आया है। उन्होंने मुझे कोई दर्द निवारक दवा दे दी। मैं अपना काम करता रहा। सितंबर 2007 तक हमलोग मुकदमा दायर करने के लिए तैयार थे।

12 सितंबर की रात मुझे मस्तिष्क आघात आ गया, क्योंकि पिछले हार्ट अटैक ने मेरे हार्ट में दो थक्के छोड़ दिये थे। 13 सितंबर को मैं अस्पताल के बिस्तर पर अचेत पड़ा था उसी दौरान मेरे वकील ने मुकदमा दायर किया। जब मेरी मेडिकल रिपोर्ट आयी तो उसमें हार्ट अटैक और सेरेब्रल स्ट्रोक का कारण तनाव बताया गया था। इसके बाद मैंने योग, ध्यान करना और हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक सीखना शुरू कर दिया। मैं धीरे-धीरे ठीक हो रहा था, लेकिन मेरा बायां पैर ठीक से काम नहीं रहा था।

अप्रैल 2008 में मैंने दुबारा दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया। 25 नवंबर 2008 को कोर्ट ने मिस्टर तिवारी के नाम से सम्मन जारी कर दिया। वे अब ऐसे पहले गवर्नर बन गये थे जिनके नाम कोर्ट का समन जारी हुआ हो। मिस्टर तिवारी ने इस आदेश का इस आधार पर विरोध किया कि गवर्नर के रूप में उन्हें कोर्ट में हाजिर होने से छूट मिलनी चाहिये। नवंबर 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने मुकदमे को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया, मगर मैंने उस आदेश को चुनोती देने का फैसला किया।

23 अक्तूबर 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने संतति (जैविक पिता) और वारिस (कानूनी पिता) को परिभाषित करते हुए मेरे पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया और मिस्टर तिवारी से डीएनए टेस्ट करवाने के लिए कहा गया। अदालत ने ब्लड टेस्ट के मामले में शीघ्रता बरतने का निर्देश दिया यह कहते हुए कि कहीं मामले का महत्वपूर्ण सुराग हमेशा के लिए खत्म न हो जाये। अदालत का इशारा मिस्टर तिवारी की बढ़ती उम्र की तरफ था, उस वक्त वे 86 साल के हो चुके थे। मगर आठ से दस बार कहे जाने पर भी मिस्टर तिवारी ने अपना सैंपल नहीं दिया।

 मुकदमे की सुनवायी बड़ी त्रसाद थी। मुझे अक्सर बास्टर्ड, पब्लिसिटी स्टंट करने वाला और ब्लैक मेलर कहा जाता और मेरी मां को हृदयहीन महिला कह कर पुकारा जाता।

27 अप्रैल 2012 को दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि मिस्टर तिवारी को ब्लड सैंपल देना ही होगा। उस आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि अगर मिस्टर तिवारी सैंपल देने से मुकरते हैं तो समुचित मात्रा में पुलिस बल का इस्तेमाल करते हुए सैंपल हासिल करने की छूट दी गयी थी।

29 मई 2012 को मैंने 2005 के बाद पहली बार मिस्टर तिवारी को देखा जब मैं अपनी मां, अपने वकील और कोर्ट द्वारा तय किए गये अधिकारी के साथ उनके घर गया था। उन्होंने मुझसे पूछा, और बेटा, तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मैंने कहा, आपकी कृपा की बदौलत मैंने अपनी पढ़ाई को होल्ड पर रख दिया है और अदालत के चक्कर काट रहा हूं। जब मैंने अपने वकील को उनकी दीवार पर टंगी नेहरू जी की तस्वीर दिखायी तो उन्होंने अपने गार्ड से कहा, देखो बेटा क्या बोल रहा है, उसे यह तसवीर पसंद आयी है। उसको यह भेंट कर देना। मैंने तत्काल कहा, आपसे बहुत सारे भेंट मिले हैं, बस ब्लड सैंपल भेंट कर दीजिये।

उन्होंने बड़ी आसानी से ब्लड सैंपल दे दिये। जब हमने सैंपल पर साइन कर दिये तो वे मेरी मां की तरफ मुड़े। उन्होंने कहा, बहुत दिनों से तुम्हारी आवाज नहीं सुनी। राग दुर्गा सुना दो। मेरी मां यह सुनकर सन्न रह गयी। वह बोली, तुम फिर मुझे भ्रमित कर रहे हो। साइन करो और हमें जाने दो।

जब टेस्ट के नतीजे आयेंगे, मैं अपना नाम बदल कर रोहित शेखर तिवारी सिंह करने की याचिका दायर करूंगा। सिंह मेरे हीरो, मेरे नाना प्रोफेसर शेर सिंह के नाम से होगा। फिर मैं भरन-पोषण की मांग करूंगा जो मिस्टर तिवारी ने सालों से नहीं चुकाया है। पहले मैं भरन-पोषण के बारे में नहीं सोचता था मगर मुकदमे के दौरान उनके एरोगेंस ने मुझे अपना विचार बदलने के लिए मजबूर किया। मैं उन्हें हर चीज अदा करने के लिए मजबूर करूंगा।"


पुण्यमित्र

प्रस्तुत ब्लॉग पुण्यमित्र के ब्लॉग हज़ारो ख्वाहिशें ऐसीसे लिया गया है जिसमें पुण्य ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एनडी तिवारी के नाजायज़ बेटे शेखर के संघर्ष की दास्तान बयां की है। पटना दैनिक प्रभात खबर से जुड़े पुण्यमित्र एक जाने-माने पत्रकार हैं और अपनी सटीक बयानी के लिए जाने जाते हैं।







https://www.facebook.com/hindpraharichandigarh

No comments:

Post a Comment