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| हार्वर्ड विश्वविद्याल के संस्कृत विभाग के शिक्षक माइकल विटजैल |
जब
मैंने बतौर हिंद प्रहरी संवाददाता हार्वर्ड विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के
विभागाध्यक्ष माइकल विटजैल से बात करने के लिए उनसे ईमेल के जरिए सम्पर्क साधा तो
बहुत जल्दी जवाब मिला। विटजैल संस्कृत के बारे में बात करने और इसके बारे में अपने
अनुभवों को साझा करने के लिए काफी उत्साहित दिखे। उन्होंने मुझसे अपने प्रश्नों की
सूची भेजने को कहा और जिसे भेजने के बाद उनके जो जवाब मिले उन्हें आपके सामने रख
रही हूं। मुझे उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि जिस तरह इन जवाबों को पढ़ने के बाद
मुझे जहां इस बात पर बेहद गर्व हुआ कि मैं उस भारत में जन्मी हूं जहां से संस्कृत
जैसी भाषा जन्मी वहीं इस बात का अफसोस भी हुआ कि भारतीय संस्कृति -संस्कृत को देश
ने वो पहचान नहीं दी जिसकी संस्कृत हकदार है। पढ़िए क्या कहते हैं माइकल विटजैल..
विश्वविख्यात हार्वर्ड विश्वविद्यालय के
संस्कृत विभाग के शिक्षक माइकल विटजैल बताते हैं कि हाई स्कूल की पढ़ाई करने के
समय से ही उनकी रुचि संस्कृत में थी जिसके चलते वो नेपाल गए। वहां लम्बे समय तक रहते
हुए उन्होंने इंडोलोजी में महारथ हासिल की और उन्हें इस भाषा से बेहद प्यार है।
इस
सवाल के जवाब में कि क्या भारतीय बच्चे भी संस्कृत सीखने में रुचि रखते हैं, माइकल
ने बताया कि ‘‘भारत मूल के बच्चे भी संस्कृत से जुड़े पाठ्यक्रमों में
प्रवेश लेते तो हैं लेकिन अगर कोर्स का हिस्सा बने गैर-भारतीय
बच्चों से उनकी तुलना की जाए तो उनका आंकड़ा बेहद मामूली है। जबकि विदेशी मूल के
बच्चे ज्यादातर हिंदी और संस्कृत में लिखे गए ग्रंथों को पढ़ने की चाहत में
संस्कृत पाठ्यक्रम का हिस्सा बन रहे हैं।“
अन्य
देशों में संस्कृत का क्या स्थान हैं, इस प्रश्न पर उनका जवाब था कि
“जहां तक अन्य देशों की बात हैं तो वर्ष 1816
से ही जमर्नी में संस्कृत भाषा का रुतबा पारंपरिक भाषा के तौर पर है। जमर्नी के
अलावा फ्रांस, ब्रिटेन और कई अन्य यूरोपियन
देशों में भी संस्कृत भाषा में शिक्षा की बेहद मजबूत परंपरा है।”
विजटैल
के अनुसार “अगर एशियाई
मूल के देशों की बात करें तो संस्कृत में लिखे बौद्ध ग्रंथों को पढ़ने की चाह में
जापान में भी संस्कृत भाषा शिक्षा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बन गई है और मुख्य
पारंपरिक भाषा में परिवर्तित होती जा रही है।”
विश्वभर
में संस्कृत के चाहने वालों की संख्या में हो रही बढ़ोत्तरी के बावजूद माइकल को डर
है कि कहीं संस्कृत अपने खुद के देश भारत में इतिहास बन कर न रह जाए। उनकी मानें
तो स्कूलों और विश्वविद्यालयों से आगे संस्कृत का भविष्य धूमिल होता दिखता है।
संस्कृत के सांस्कृतिक और विदुषी पंडितों की संख्या में भी तेजी से गिराव हो रहा
है। पिछली कुछ जनगणना को देखें तो 20,000 में से मात्र कुछ 15 लोग
ये बताते हैं कि ‘‘संस्कृत उनकी
मात्र भाषा थी”।
माइकल
मानते हैं कि यह बहुत ज़रूरी है कि संस्कृत को उसका सही दर्जा दिया जाए और बच्चों
को संस्कृत सीखने के लिए उत्साहित किया जाए क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण भाषा है और
अपने अन्दर सभ्यता का आधार ही नहीं, मानव का विकास भी समेटे हुए हैं।
निधि रावत

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