![]() |
| लेफ्टिनेंट कमांडर कपीश मुवाल |
![]() |
| लेफि्टनेंट मनोरंजन कुमार |
26 फरवरी 2014 को सिंधुरत्न हादसे में लेफ्टिनेंट कमांडर कपीश मुवाल की मृत्यू के बाद उनके 12 मार्च 2014 को उनके भाई मनीष सिंह मुवाल अपने ब्लॉग (http://themuwals.blogspot.in/) ‘दिस फायर बर्न्स’ पर एक ब्लॉग लिखा है जिसमें उन्होंने नौसेना पनडुब्बियों में आए दिन हो रही दुर्घटनाओं में जवानों की मौत और रक्षा मंत्रालय की उदासीनता पर कुछ सवाल उठाए हैं और साथ ही अपना दर्द भी बयान किया है। प्रस्तुत हैं इस ब्लॉग के कुछ अंश
"लेफ्टिनेंट कमांडर कपीश मुवाल- एक आदर्श बेटा, बढ़िया छात्र, शानदार एथलीट, स्वोर्ड ऑफ ऑनर का विजेता, नेवल इंजीनियरिंग कॉलेज ट्वेंटिएथ इम्मॉर्टल्स का सदस्य, लेकिन सबसे बढ़कर भारतीय नौसेना का एक अधिकारी। आज एक शहीद- जिसने सर्वोच्च बलिदान के विचार को जीवंत कर दिया...
"लेफ्टिनेंट कमांडर कपीश मुवाल- एक आदर्श बेटा, बढ़िया छात्र, शानदार एथलीट, स्वोर्ड ऑफ ऑनर का विजेता, नेवल इंजीनियरिंग कॉलेज ट्वेंटिएथ इम्मॉर्टल्स का सदस्य, लेकिन सबसे बढ़कर भारतीय नौसेना का एक अधिकारी। आज एक शहीद- जिसने सर्वोच्च बलिदान के विचार को जीवंत कर दिया...
दो बहादुर अधिकारियों- लेफ्टिनेंट कमांडर कपीश मुवाल और लेफ्टिनेंट मनोरंजन कुमार ने बिना परिणाम की परवाह किए अपनी जान दे दी- क्योंकि उन्हें यह करना ही था। उनके इस कदम से ना केवल पनडुब्बी नष्ट होने से बच गई बल्कि उन 92 लोगों की जान भी सुरक्षित रही जो उस दिन पनडुब्बी पर मौजूद थे। किलो क्लास सबमैरीन में बचाव वाहन नहीं होता, इसलिए अगर पानी के अन्दर कोई दुर्घटना घटती है, तो बचने के मौके बहुत कम हैं। ऐसे में इन बहादुर लोगों ने क्या किया..., यह सुनिश्चित किया कि वह दुर्घटना किसी बहुत बड़े हादसे का रूप ना ले ले।
यह तो कोई नहीं जानता कि 26 फरवरी 2014 की सुबह आईएनएस सिंधुरत्ना में दरअसल क्या हुआ था लेकिन कुछ तथ्य झुठलाए नहीं जा सकते। भारतीय नौसेना की हर एक पनडुब्बी (और बहुत से दूसरे जहाज भी) की तरह आईएनएस सिंधुरत्न भी उधार की जिंदगी जी रही है। और ऊपर से स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई भी बहुत कम है। लेकिन देश को तो हर कीमत पर बचाना है- तो ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई रक्षा जवान इन जलयानों को चलाने से मना कर दे। एक सिपाही का कर्तव्य है कमांड्स मानना और देश की रक्षा करना। मेरे पिता हमेशा कहते हैं कि ‘अपना कर्तव्य निभाओ, परिणाम के बारे में मत सोचो’ और मेरे भाई ने बिल्कुल यहीं किया।
कुछ लोग ऐसा कह सकते हैं कि हमारे पास, हमारे समुद्र की रक्षा के लिए समुचित पनडुब्बियां हैं। यह सच भी होता अगर हमारे पास उपलब्ध सारे जलयान सही और लड़ाई के लिए फिट होते। पर दुख की बात है, कि हम पर खराब हुए जहाज को सही करने के लिए उन दूसरे जहाजों से पुर्जें निकालने के लिए दवाब डाला जाता है जिनकी मरम्मत चल रही होती है। अगर हमारे पास 4 जहाज़ हैं, तो हम दो जहाजों को चलाने लायक बनाने के लिए बाकी दो को क्यों तोड़ते हैं? वो सभी चलने लायक अवस्था में क्यों नहीं हो सकते। एक बड़े न्यूज़ चैनल की रिपोर्ट के बाद, अब यह कोई छिपी हुई बात नहीं है- कि नौसेना, स्पेयर पार्ट्स को एक जहाज से हटाकर दूसरे जहाज में प्रयोग करने के लिए मजबूर है।
जब आईएनएस सिंधुरत्न पनडुब्बी की बैटरियां और ज्यादा प्रयोग नहीं की जा सकती थी, तब आईएनएस सिन्धुकेसरी से प्रयोग की जा चुकी बैटरियां निकाली गईं (क्योंकि तब उसकी मरम्मत चल रही थी) और सिंधुरत्न में लगा दी गईं। कल जब सिंधुरत्न की मरम्मत चल रही होगी, इसके पुर्जों को किसी और जहाज को चलाने के लिए प्रयोग किया जाएगा। इस तरह से पुर्जों को एक जहाज से निकालकर दूसरे जहाज में लगाना बन्द होना चाहिए। इस समय हम 50 से 60 फीसदी कार्य क्षमता के साथ काम कर रहे हैं। इसमें जल्द सुधार आवश्यक है। और यह सुधार एक ही तरीके से किया जा सकता है- कि दिए गए बजट को सही तरीके से स्पेयर पार्ट्स खरीदने में लगाया जाए।
मैं बताता हूं कि पनडुब्बी कितनी महत्वपूर्ण है- अगर भारत पर समुद्र के अंदर से कोई दुश्मन डीजल या परमाण्विक पनडुब्बी के साथ हमला कर दे तब पानी की सतह पर चलने वाला जहाज कितना प्रभावी होगा? एक एयरक्राफ्ट कैरियर और उसके तेज़ जहाज कितने प्रभावी होंगे? इसका जवाब है—बिल्कुल नहीं के बराबर। पानी के अंदर से होने वाले हमलों से अपने महान देश को बचाने के लिए हमारी पनडुब्बियों का हर समय क्रियाशील अवस्था में रहना बहुत ज़रूरी है।
हिन्द महासागर बहुत विशाल है और हमारा समुद्री सीमाक्षेत्र भी। बल्कि सच यह है, हम ही पूरी दुनिया में हम अकेले राष्ट्र है जिनके नाम के ऊपर एक पूरे महासागर का नाम रखा गया है। आज भारत के पास 13 पनडुब्बियां हैं। पर क्या यह हमारे समुद्र की रक्षा करने के लिए पर्याप्त हैं? कुछ लोग अभी भी हां कह सकते हैं, लेकिन मैं आपको यह भी बता दूं- कि कभी भी ऐसा नहीं होता जबकि यह 13 की 13 पनडुब्बियां सही और सुचारू स्थिति में हों। फिर इस संख्या का क्या फायदा?
यह तो कमीशन्ड रिपोर्ट्स ही बता सकती हैं कि आईएनएस सिंधुरत्न में क्या खराबियां हुईं- मैं इस बारे में बात नहीं कर सकता। यहां मेरे से कहीं ज्यादा क्वालिफाइड लोग हैं जो इस मामले पर बेहतर ढंग से बात कर सकते हैं। मैं तो केवल इतना ही कह सकता हूं कि क्रू सदस्यों को यह मालूम होने के बावजूद कि पनडुब्बी में खराबियां हैं, उन्होंने कभी उस पर जाने के लिए ‘ना’ नहीं कहा।
इस महान देश की सशस्त्र सेनाओं के पास रक्षा उपकरण नहीं है और य़ह बात सब जानते हैं। गोला-बारुद, हथियार, जलयान, वायुयान और सबसे बढ़कर स्पेयर पार्ट्स की कमी ने हमारी सेनाओं को अपाहिज बना दिया है। लेकिन जो लोग इस स्थिति में सुधार कर सकते हैं, उन्हें हमारी सेनाओं की यह बिगड़ी हालत समझने में कितना समय लगेगा? इससे पहले कि वो इन दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सारे ज़रूरी कदम उठाएं, और कितने लोगों को बलि देनी होगी?
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि इन सेनाओं को व्यापार की तरह चलाया जा रहा है। सेनाओं के बजट में कटौती के कारण हमारे बहादुर सिपाही लगातार परेशानी और नुकसान से रूबरू हो रहे हैं। यह कटौती आपातकाल जैसी परिस्थितियां पैदा कर रही है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए।
देश के नौसेना डॉकयार्डों में, नौसेना के लिए सबसे महत्वपूर्ण मरम्मत सुविधाएं होती हैं। लेकिन इस समय रक्षा जवानों और समर्पित स्थायी तकनीकी असैनिक स्टाफ से कहीं ज्यादा संख्या में, सिविल ठेकेदार नौसेना डॉकयार्ड में काम कर रहे हैं। क्या यहीं जहाजों के खराब रखरखाव का कारण है या यह सबकुछ इन सिविल ठेकेदारों और हमारे नौसेना जवानों के बीच संवाद की कमी के कारण हो रहा है? शायद इनमें से एक भी कारण सही ना हो, लेकिन अगर ऐसा है तो इन खराबियों और असफलताओं के पीछे असल में क्या वजह है?
7 मार्च, 2014, शुक्रवार को हुई एक अन्य दुर्घटना में, आईएनएस कोलकाता में कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस लीक होने के कारण हमने एक और अच्छे अधिकारी, कमांडर कुंतल वाधवा को खो दिया। ठीक एक दिन बाद 8 मार्च, 2014, शनिवार को आईएनएस अरिहन्त पर हुई एक दुर्घटना में एक ठेका मजदूर मारा गया। यह दुर्घटनाएं इस बात का संकेत हो सकती हैं कि नौसेना तैयार नहीं है। लेकिन क्या यह केवल नौसेना की ही गलती है... नहीं। नौसेना को तैयार करना रक्षा सचिव की जिम्मेदारी है।
एक रक्षा सचिव का काम रक्षा मंत्रालय और सेनाओं के बीच एक पुल की तरह काम करने का है। फिलहाल इस पद पर एक असैनिक व्यक्ति है। और एक असैनिक के पास यह पद होना कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं करता। यह पद अक्रियाशीलता और शून्य उत्तरदायित्व का प्रतीक बन चुका है। इसे ठीक किया जाना चाहिए। अगर हमें इस पद की ज़रूरत है, तो इस पर एक पूर्व सैन्य अधिकारी क्यों नहीं हो सकता? कम से कम रक्षा सचिव को यह पता तो रहेगा कि सेनाओं की हालत क्या है और वो इसे सुधारने की दिशा में प्रयास करेगा।
पूर्व नौसेना चीफ- रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश ने- एक अग्रणी समाचार पत्र के ज़रिए इस पद के महत्व पर प्रकाश डाला था और इस पद की क्रियाशीलता और उत्तरदायित्व बढ़ाने के लिए कुछ सुझाव भी दिए थे। लेकिन इसका क्या असर हुआ, देखना बाकी है। यह वाकई दुख की बात है कि किस तरह वो सभी लोग जिनकी राय महत्वपूर्ण होती है, या तो चुप रहते हैं और या अगर बोलते हैं तो उनकी राय कोई नहीं सुनता। शासन करने वाले लोगों का चूंकि सेनाओं से कोई संबंध नहीं होता, वो या तो खराब निर्णय लेते हैं या फिर कोई निर्णय ले ही नहीं पाते।
रक्षा मंत्रालय चलाने वाला व्यक्ति रक्षा सेनाओं की चिंताओं का जवाब देने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। लेकिन दुख की बात है, उसकी जिम्मेदारी नहीं मानी गई। अगर मैं किसी टीम का सर्वोपरि हूं तो यह मेरी जिम्मेदारी है कि मेरी टीम अच्छे से अच्छे वातावरण में काम करे। अगर मैं यह नहीं कर सकता तो मुझे उनका नेता बनना छोड़ देना चाहिए।
मेरे पिताजी 41 साल नौसेना में रह चुके हैं। वह हमें उस समय के बारे में बताते हैं जब मंत्री तक वर्दी से डरते थे। अगर कोई सेना का जवान किसी परेशानी की बात उठाता था तो उस पर तुरंत काम किया जाता था। लेकिन अब यह इज़्जत खत्म हो चुकी है। आज स्थिति इतनी खराब है, कि अगर एक सैन्य अधिकारी को फाइल भेजनी है, तो एक क्लर्क भी यह कह देता है कि यह काम आज नहीं हो सकता, मुझे दो-तीन दिनों का समय लगेगा। ऐसा कैसे हो गया?
आज ऐसा वक्त आ गया है जब हमारी सशस्त्र सेनाएं बूढ़े शेरों की तरह हो गईं हैं। संसाधनों की कमी के कारण उनके दांत कुंद हो गए हैं। हमारे पास संख्या (सैनिक) हैं लेकिन वो दिन चले गए जब संख्या से जंग जीती जाती थी। आज लड़ाई शस्त्रों से लड़ी जाती है और जीती जाती है।
मेरे दोस्त कहते हैं कि अगर ऐसे ही हादसे यूएस, यूके या अगर चीन में भी हुए होते तो जिम्मेदार लोगों की खैर नहीं थी। यह सुनकर खराब लगता है। मुझे लगता है कि मेरे महान देश ने शहीदों की जिदंगी को मूल्य देना छोड़ दिया है। यह रवैया कि- जो होना था वो हो चुका, यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण हैं लेकिन अब हमें आगे बढ़ना चाहिए..., हमें धीमे ज़हर की तरह मार रहा है।
आज इतने बड़े नुकसान के बाद, मुझे भगवान की याद नहीं आ रही, मुझे शैतान की याद आ रही है। हमारे अधिकतर स्वार्थी नेताओं के खोखले आदर्श और उनकी उदासीनता ने इस शैतान को मजबूत बना दिया है। यह शैतान हमें धीरे-धीरे खा रहा है और सबसे बुरी बात यह है कि हमने इसका अभ्यस्त होना शुरू कर दिया है।
न्याय सिर्फ बुरे व्यक्ति को मारना नहीं है, असल न्याय उस विचार को मारना है जिससे बुराई जन्म लेती है। मैं न्याय मांगता हूं। मैं जानता हूं कि मेरा भाई इस बार वापस घर नहीं आएगा। उसने बिना किसी सोच के अपनी जिंदगी दे दी। लेकिन यह परिस्थिति बदल सकती थी अगर सही सुरक्षा इंतज़ाम किए गए होते।
कल इन्हीं परिस्थितियों के कारण और भाई, और बेटे अपनी जानें देंगे। और चूंकि वो सम्मानीय सिपाही हैं वो ऐसा करेंगे। यह सर्वोच्च बलिदान है जब आप अपनी ज़िंदगी सिर्फ इसलिए दे देते हैं, ताकि और लोग ज़िंदा रहें। लेकिन क्या हम इसे रोक नहीं सकते।
जानता हूं कि इस बात को सही तरीके से उन लोगों के दिमाग में पहुंचाना बहुत मुश्किल है जिनके लिए यह सबसे ज्यादा महत्व रखती हैं। लेकिन मैं अपनी तरफ से इन चिंताओं को उन तक पहुंचाने की पूरी कोशिश करूंगा। बस वक्त की बात है.. दिस फायर बर्न्स..."


No comments:
Post a Comment