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| गुरुकुल में संस्कृत सीखते विदेशी बच्चे |
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संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई शक नहीं है।
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नासा
ने संस्कृत को कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि यानि आर्टिफीशियल इंटैलीजेंस के लिये सबसे उपयुक्त
भाषा माना है।
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शोध
से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण
शक्ति बढ़ती है।
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संस्कृत
विश्व की सबसे ज्यादा 'पूर्ण' (perfect) और
तर्कसम्मत भाषा है।
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यह एक
वैज्ञानिक तथ्य है कि संस्कृत लिखने से अंगुलिया और बोलने से जीभ का लचीलापन बढ़ता
है।
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संस्कृत
का अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ सीखने में में सहायता मिलती है।
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संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वनि या कहिए उच्चारण से उत्पन्न
आवाज़ के कारण प्रमस्तिष्कीय (Cerebral) क्षमता में वृद्धि करती है।
जिससे सीखने की क्षमता, स्मरणशक्ति और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती
है। यही कारण है कि पहले बच्चों की शिक्षा शुरू कराने से पहले विद्यारम्भ संस्कार
करवाया जाता था जिसमें बच्चों को मंत्र लिखने के साथ ही उन्हें संस्कृत के मंत्रों
का जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था।
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संस्कृत से छात्रों की मोटर स्किल्स भी विकसित होती है।
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इसके सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण यह सर्वश्रेष्ठ भाषा मानी जाती है। इसे देवभाषा भी कहा
जाता है।
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संस्कृत
केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है। इसलिए इसका नाम संस्कृत है।
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केवल
संस्कृत ही एकमात्र भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया
गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि
पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि
पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में
समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।
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विश्व
की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं।
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द्विवचन - सभी भाषाओं में एक
वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।
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सन्धि - संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि।
संस्कृत में जब दो शब्द निकट आते हैं तो वहां सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल
जाता है।
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संस्कृत
वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने
की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द
विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता
है। जैसे - अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनों
ही ठीक हैं।
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संस्कृत भाषामें साहित्य की रचना कम से कम
छह हजार वर्षों से लगातार होती आ रही है। भारत के चार प्रमुख वेद और धर्मग्रंथ
संस्कृत में हैं।
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संसारके किसी देशमें इतने समय तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करनेवाली और कोई
भाषा है ही नहीं |
निधि रावत

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