Wednesday, 12 March 2014

पड़ताल


पूरे विश्व में बढ़ रहा है संस्कृत का महत्व, ब्रिटेन, अमेरिका, जापान समेत बहुत से देशों में स्कूल पाठ्यक्रम का हिस्सा बनी संस्कृत, विदेशी बच्चे भारतीय धर्म ग्रंथों को पढ़ने के लिए सीख रहे हैं संस्कृत...

 

यूके स्थित गुरूकुल जहां बच्चे संस्कृत सीख रहे हैं। 

संस्कृत - शायद स्कूल के बच्चों को डराने के लिए ये शब्द ही काफी है, लेकिन फिर भी अगर कहीं वंदे मातरम् का स्वर सुनाई दे जाए,तो हम बिना सोचे समझे उसमें सुर मिला सकते हैं:-

वंदे मातरम् ।
सुजलाम् सुफलाम्,मलयज् शीतलाम्
सस्यश्यामलम्,मातरम् ।
वंदे मातरम् ।

क्या ये इस बात का प्रमाण नही है कि हम विश्व की महानतम संस्कृति आर्य का हिस्सा हैं? क्या इससे ये पता नही चलता कि चाहे हम देश के किसी भी कोने से संबंधित हों, चाहे दुनिया के किसी भी छोर पर बैठे हों - वंदे मातरम् का स्वर हम सभी को एक रस, एक भाषा और एक ही प्रकार के आनंद से भिगो देता है। सही कहूं तो वंदे मातरम् एक मात्र ऐसी रचना है जो संस्कृत में लिखी होने के बाद भी न केवल आसानी में हमारी जुबान पर रच जाती है बल्कि हमारे देश की आधारीय भाषा संस्कृत से हमें आज भी जोड़े हुए हैं।

संस्कृत (संस्कृतम्) भारत की एक शास्त्रीय भाषा। इसे देववाणी या सुरभारती भी कहा जाता है। यह दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है। संस्कृत हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार की हिन्द-ईरानी शाखा की हिन्द-आर्य उपशाखा में शामिल है। ये आदिम-हिन्द-यूरोपीय भाषा से बहुत अधिक मिलती जुलती है।

आज के समय में भारत में बोली जाने वाली भाषाएं जैसे हिन्दी, उर्दू, कश्मीरी, उड़िया, बांग्ला, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, नेपाली, आदि का जन्म संस्कृत से ही हुआ है। इनकी अधिकांश शब्दावली या तो संस्कृत से ली गयी है या संस्कृत से प्रभावित है। संस्कृत से उपजी इन भाषाओं में यूरोपीय बंजारों की रोमानी भाषा भी शामिल है।
हिन्दू धर्म से संबंधित लगभग सभी धर्मग्रन्थ संस्कृत में लिखे गये हैं। इतना ही नही बौद्ध धर्म (विशेषकर माह्यान) और जैन धर्म के भी कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गये हैं। आज भी हिन्दू धर्म के अधिकतर यज्ञ और पूजा संस्कृत में ही होती हैं।

संस्कृत को सभी उच्च भाषाओं की जननी माना जाता है। फ़ोर्ब्स पत्रिका जुलाई 1987 की रिपोर्ट पर यकीन करें तो संस्कृत की सर्वाधिक शुद्धता के कारण यह कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए एक उपयुक्त भाषा है।

भारतीय संविधान की धारा 343, धारा 348 (2) तथा 351 का सारांश है कि देवनागरी लिपि में लिखी और मूलत: संस्कृत से अपनी पारिभाषिक शब्दावली को लेने वाली हिन्दी राजभाषा है। वर्ष 2010 में उत्तरांचल की तात्कालिक बीजेपी सरकार ने राज्य में बड़ी संख्या में मत और विचारों पर शोध करने के बाद संस्कृत को राज्य की दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया। हांलाकि हिंदी का स्थान पहला है लेकिन संस्कृत को राजभाषा का स्थान देने का उत्तरांचल पहला राज्य हैं।  

हिन्दुस्तान में भी लौट रही है गुरुकुल की परंपरा

एक आशा की बात यह भी है कि आज भारतवर्ष संस्कृत भाषा के संसार में फिर से उदय कर रहा है। धीरे-धीरे संस्कृत फिर से मुख्य धारा में आने का प्रयास कर रही है। विश्वविद्यालयों में जहां संस्कृत स्नातकों की संख्या बढ़ रही है वहीं आरंभिक शिक्षालयों में भी संस्कृत का घर बनने लगा है। उत्तर एवं दक्षिण भारत के कई राज्यों में तो संस्कृत को आधार बना कर पाठ्यक्रम को पढ़ाया जा रहा है। विकास और प्रगति की होड़ में शामिल होने के लिए अंग्रेजी से पिछड़ चुकी हमार मूल भाषा संस्कृत प्रसार की दौड़ में रफ्तार पकड़ रही है। आज बच्चे नर्सरी कक्षा से ही संस्कृत के गायत्री मंत्र सीख रहे हैं जिससे उन्हें संस्कृत का परिचय मिल रहा है। इसे हम संस्कृत अध्ययन की दिशा में एक छोटा सा ही सही पर महत्वपूर्ण पड़ाव मान सकते हैं। 
 
पिछले कुछ समय में संस्कृत दुनियाभर के स्कूलों और विश्वविद्यालयों का हिस्सा तेज़ी से बन रही है या बन चुकी है। इससे भी आश्चर्य की बात ये है कि इन स्थानों पर भारतीय मूल के छात्रों से अधिक विदेशी मूल के छात्र संस्कृत सीखने और उसमें महारथ हांसिल करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। दुनिया के कई बड़े देशों जैसे ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, चीन, रोम, न्यूज़ीलैंड, आयरलैंड, जर्मनी आदि में संस्कृत को मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल किया गया है और इसके पढ़ने और पढ़ाने वाले दोनों ही संस्कृत भाषा में गहन रुचि और जानकारी रखते हैं।

संस्कृत भाषा में रुचि के चलते कई लोग विदेश में आरंभिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद संस्कृत में विद्वान बनने के लिए भारत में लम्बा समय भी व्यतीत करते हैं।
दुनिया चाहे जैसे भी बदले पर हमारे देश में संस्कृत का स्थान कभी नही बदल सकता। इसका प्रमाण है देश के बच्चों और बड़ों के बीच संस्कृत की बढ़ती लोकप्रियता। अगर कल तक अंग्रेजी के बड़े स्कूल बच्चों की मंज़िल थे, तो आज संस्कृत के विद्यालय कई लोगों के लिए फैशन स्टेटस बन रहे हैं। कई परिवारों के लिए गुरुकुल वैदिक और पारम्परिक शिक्षा का केंद्र है, जहां उनके बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ जीवन के नियमों का पालन करना भी सीखते हैं।

संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष की हजारों पुश्तों के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं। पता नहीं कि संसार के किसी देश में इतने काल तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं..., शायद नहीं है। इसलिए अपनी संस्कृत को पहचानिए, अपनी संस्कृति को पहचानिए और इसे आत्मसात कीजिए वरना कहीं ऐसा न हो कि संस्कृत पर भी विदेशी पेटेंट हो जाए और यह पश्चिम के रास्ते हमारे देश में आए...।


निधि रावत, 
ऑस्ट्रेलिया संवाददाता

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