आम आदमी के
साक्षात्कारों की कड़ी में इस बार हम आपके लिए लेकर आएं हैं पंचकुला, हरियाणा के
निवासी युवा रोहित मण्डरवाल का साक्षात्कार जो नौसेना की एक्जीक्यूटिव शाखा में सब
लेफ्टिनेंट हैं और फिलहाल एझिमला, केरल में नियुक्त हैं। 23 साल के रोहित एक बेहद
मेधावी छात्र रहे हैं। चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से 78 फीसदी अंकों के साथ बीटेक
उत्तीर्ण करने के बाद रोहित का सात मल्टीनेशनल कंपनियों में कैम्पस साक्षात्कार के
जरिए चयन हुआ। लेकिन रोहित ने नौसेना में जाकर देशसेवा करने को प्राथमिकता दी।
रोहित उन युवाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सफल है, मेधावी हैं, काबिल हैं और
जोश से भरे हुए हैं, जो देशसेवा को सर्वोपरि मानते हैं और जिनके लिए जिंदगी केवल
काटने का नहीं बल्कि उसे बेहतर तरीके से और अपनी शर्तों पर जीने का नाम है। हमने
रोहित की पढ़ाई, रुचियों से लेकर नौसेना जैसा जोखिम भरा प्रॉफेशन चुनने के बारे
में बातें की और उन्होंने बेहद बेबाकी और सरल तरीके से अपनी बातें रखीं। आप भी पढ़िए
जोश और आंखो में सपने संजोए इस युवा नेवी ऑफिसर के विचार-
अपनी रुचियों के
बारे में कुछ बताईए।
मेरी इंजीनियरिंग
में बहुत रुचि है। मुझे यह विषय बेहद पसंद हैं। बीटेक करने के बाद कैम्पस सलेक्शन
में ही मेरा सात कंपनियों में सलेक्शन हो गया था जिनमें माइक्रोसॉफ्ट और विप्रो
जैसी कंपनियां भी थी। मैंने कार्डिफ यूनिवर्सिटी, लंदन में रिसर्च के लिए भी आवेदन
किया हुआ था जिसमें मेरा रीसर्च टॉपिक था- डेटा इन्ट्रूजन। वो लोग मेरे रीसर्च
टॉपिक और मेरी सबजेक्ट नॉलेज से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने मुझे सीधे ग्रेजूएशन
के बाद ही रीसर्च स्कॉलर बनाने के लिए सिलेक्ट कर लिया था जो बहुत कम मामलों में
होता है।
तो फिर आप रीसर्च
छोड़कर नेवी में कैसे पहुंच गए?
दरअसल नेवी हमेशा से
ही मेरी पसंद रही है। मेरे काफी रिश्तेदार सेना में रहे हैं और हैं भी। तो इसको
लेकर हमेशा ही उत्साहित रहा। मैंने एसएसबी का एक्ज़ाम दिया था। जब उसमें पास हो
गया और मेरा सलेक्शन नेवी में हो गया तो बस मैं सबकुछ भूल गया और मैंने नेवी जॉइन
करने का फैसला कर लिया।
लेकिन यहां आपको
अपने फेवरेट विषय में कुछ करने का मौका तो मिला ही नहीं होगा। आपकी रीसर्च तो रह
गई?
ऐसा नहीं है। नेवी
में भी रीसर्च करने के लिए काफी कुछ है। यह मेरी रुचि का क्षेत्र है तो मैं हर जगह
अपने लिए मौके ढूंढ लेता हूं। यहां मैंने अकैडमी के कम्प्यूटर पर काफी काम किया।
पहले हमारे यहां क्विज़ वगैरह कम्प्यूटर पर नहीं होते थे लेकिन मैंने जावा में एक
प्रोग्राम बनाया और अब क्विज़ कम्प्यूटर पर होते हैं। स्कोरबोर्ड वगैरह भी मैंने
विकसित किया। फिर अब मैं नेवी की एक्ज़ीक्यूटिव ब्रांच में हूं। जो प्रशासकीय शाखा
है। यहां मुझे सबमैरीन को हैंडल करने का अवसर मिलेगा। जिसे मैं और बेहतर करने के
लिए अपनी तरफ से कुछ इंजीनियरिंग एक्सपेरिमेन्ट्स और रीसर्च कर सकता हूं। तो मौके
तो यहां भी हैं।
लेकिन नेवी ही
क्यों। आप थलसेना या वायुसेना को भी तो चुन सकते थे?
जी हां बिल्कुल।
लेकिन नेवी का महत्व बहुत ज्यादा है। केवल रक्षा के संबंध में ही नहीं बल्कि
कूटनीतिक मामलों में भी नेवी की भूमिका बहुत अहम् है। आप जानती हैं कि चीन, भारत
से जो अच्छे और दोस्ताना संबंध रखना चाहता है, उसकी क्या वजह है। दरअसल चीन के
पेट्रोलियम पदार्थों का आयात अंगोला से जलमार्ग के द्वारा होता है। यह रास्ता हिंद
महासागर से होकर गुज़रता है जो भारतीय नौसेना के प्रभुत्व का क्षेत्र है इसलिए चीन
के सामान को वहां से गुज़रने के लिए भारतीय नौसेना की मदद चाहिए ही चाहिए। अगर कल
को चीन के हमसे अच्छे संबंध नहीं रहे तो क्यों भारतीय नौसेना चीन की मदद करेगी...? नौसेना का सामरिक महत्व बहुत ज्यादा है, इसलिए
यहां काम करने का रोमांच भी ज्यादा है। बस इसलिए नौसेना को चुना।
काफी समय से नेवी
में लगातार हादसों की जो खबरें आ रही हैं उसके बाद तो यह एक जोखिम भरा क्षेत्र बन
गया है। जहां युद्ध के बिना भी देश में ही पनडुब्बियों पर धमाकों या उनके डूबने के
हादसे होते रहते हैं और युवा ऑफिसरों की जानें चली जाती हैं। ऐसे में क्या आपको
नेवी जॉइन करते समय डर नहीं लगा। क्योंकि आप जिस शाखा में हैं उसमें रहते हुए आपको
भी सबमैरीन्स पर जाना ही होगा।
नहीं, बिल्कुल नहीं।
नेवी को लेकर डर तो कभी भी नहीं था। हां यह ज़रूर है कि सुरक्षा को ध्यान में रखना
ज़रूरी है। क्योंकि जब मैं सबमैरीन पर जाऊंगा तो मेरे ऊपर केवल मेरी ही नहीं, मेरे
साथियों और मेरे साथ काम करने वाले अन्य सभी लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी होगी।
मेरा नंबर तो बहुत बाद में आता है, सबसे पहले मुझे उन लोगों की जान की परवाह करनी
है जो मेरे साथ गए हैं। इसलिए सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है। लेकिन इसके लिए हमारी
नौसेना में लगातार प्रयास चल रहे हैं। काफी सारी पनडुब्बियां रीफिटिंग के लिए गई
हुईं हैं। बहुत सारी चीज़ों को ठीक किए जाने के प्रयास चल रहे हैं। तो मुझे लगता
है कि आगे यह परेशानी नहीं आएगी। और दूसरे अगर मुझे मालूम है कि किसी वैसल में कोई
खराबी है या बीच समुद्र में जाकर वो परेशानी का सबब बन सकती है तो अपने साथियों की
जान जोखिम में डालने से बेहतर मुझे यह लगेगा कि मैं अपने वरिष्ठ ऑफिसर्स को इससे
अवगत कराऊं और उस वैसल की रिफिटिंग के लिए बात करूं। तो मैं ऐसा करने की कोशिश
करूंगा। क्योंकि अगर एक भी सबमरीन हादसा होता है तो केवल देश के सैनिकों की जानें ही
नहीं जाती, देश को आर्थिक नुकसान भी होता है, नौसेना की छवि भी खराब होती है। इसलिए
मैं कोशिश करूंगा ऐसा ना हो।
लेकिन कई बार ऐसा
होता है जब आपको सबकुछ जानते हुए भी, उसी वैसल पर जाना पड़ता है जो खतरनाक है,
परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं। कोई सुरक्षा का मामला हो सकता है, तब आप क्या
करेंगे।
देखिए नौसेना की
नौकरी मेरे लिए नौकरी नहीं बल्कि जीने का तरीका है, जिंदगी का मकसद है जहां हमें
साल के 365 दिन और चौबीसों घंटे देश की सेवा के लिए तैयार रहना पड़ता है। हमारा
उद्देश्य यहीं है, हम निस्वार्थ सेवा करने में यकीन रखते हैं। तो कल को ऐसी
परिस्थिति अगर आती है तो मैं हमेशा तैयार हूं। मैंने देश की रक्षा के लिए ही
नौसेना जॉइन की है। और अगर सब लोग नौसेना की दुर्घटनाओं से डर कर पीछे हटने लगे तो
नौसेना का तो अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। किसी ना किसी को तो यह करना ही
पड़ेगा ना। और मैं कभी भी अपना कर्तव्य निभाने से नहीं चूकूंगा। और मैं ही क्या
हमारी नौसेना में एक भी इंसान ऐसा नहीं जो ज़रूरत पड़ने पर पीछे हट जाए।
लेकिन इतने समय से
स्कॉर्पीन डील भी तो अटकी हुई है। नौसेना उन्हीं पुरानी पनडुब्बियों से काम चला
रहा है।
नहीं ऐसा नहीं है।
स्कॉर्पीन डील हो चुकी है। 2016 तक वो स्कॉर्पीन पनडुब्बियां हमें मिल भी जाएंगी।
बात यह है कि उनमें तॉरपीडो नहीं है और आधुनिक सोनार सिस्टम नहीं है जो यूएस
प्रयोग करता है। हमारी अधिकतर पनडुब्बियां भी रूस रीफिटिंग के लिए गई हुईं हैं।
नौसेना की ऐसी हालत
की वजह आप किसे मानते हैं?
देखिए दरअसल नौसेना
में हायरआर्की बहुत ज्यादा होती है। अगर मान लीजिए कि अभी मुझे किसी चीज़ की
ज़रूरत है तो मैं यहां से फाइल आगे बढ़ाऊंगा, उसके बाद वो हायरआर्की के सारे
अफसरों से होती हुई मंत्रालय तक पहुंचेगी और फिर फंड सैंक्शन होगा। फंड आते-आते
इतना समय लग जाता है कि बहुत सी परेशानियां सुलझ नहीं पाती। लगातार देरी होती जाती
है। यहीं वजह है कि कई बार तो लोग यह सोचते है कि अगर मैं अभी बैटरी की डिमांड
करूंगा तो उसकी फाइल आगे बढ़ते-बढ़ते और फंड आते-आते तो काफी वक्त लग जाएगा, इससे
बेहतर इसी पुरानी बैटरी को ठीक करके काम चला लूं। इसलिए ऐसी परेशानी होती है। पर
अब तो हालात काफी सुधर रहे हैं। निकट भविष्य में उम्मीद है कि सबकुछ अच्छा होगा।
आप अपनी तरफ से कुछ
कहना चाहेंगे?
मैं अपनी तरफ से
यहीं कहना चाहूंगा कि इन हालातों पर चिंता करने की नहीं बल्कि इनका हल ढूंढने की
ज़रूरत है। हमें फंड की ज़रूरत है। एक बार हमें फंड सही समय पर मिलने लगेगा तो
बहुत सारी परेशानियां खतम हो जाएंगी।
चित्रलेखा अग्रवाल


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